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Gिफ्ट निफ्टी में मामूली गिरावट के बीच सोमवार को भारतीय शेयर बाजार की सपाट शुरुआत के संकेत हैं। कच्चे तेल की कीमत, पश्चिम एशिया तनाव और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर बाजार की नजर रहेगी।
भारतीय शेयर बाजार के लिए सोमवार, 21 सितंबर का कारोबारी सत्र वैश्विक स्तर पर मिले-जुले संकेतों के बीच शुरू होने की उम्मीद है। GIFT Nifty में मामूली गिरावट घरेलू बाजार के सपाट शुरुआत के संकेत दे रही है। सुबह 7:55 बजे GIFT Nifty 23,340.5 के स्तर पर कारोबार कर रहा था, जो पिछले स्तर से 20.5 अंक यानी 0.09 प्रतिशत नीचे था। यह संकेत देता है कि सोमवार को Nifty 50 और अन्य प्रमुख सूचकांकों में शुरुआती कारोबार के दौरान बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव के बजाय सीमित गतिविधि देखने को मिल सकती है। निवेशकों की नजर हालांकि कच्चे तेल की कीमतों, West Asia में जारी भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक बॉन्ड यील्ड पर बनी रहेगी।
GIFT Nifty से क्या मिल रहे हैं संकेत?
पिछले कारोबारी सत्र में Nifty 50 23,346 के स्तर पर बंद हुआ था। इसके मुकाबले GIFT Nifty का 23,340.5 के आसपास कारोबार करना घरेलू शेयर बाजार में लगभग सपाट शुरुआत की ओर इशारा कर रहा है। Enrich Money के CEO Ponmudi R के मुताबिक, भारतीय इक्विटी बाजार सोमवार को सपाट खुल सकते हैं और GIFT Nifty 23,300 के ऊपर बना हुआ है। बाजार की शुरुआती दिशा तय करने में घरेलू संकेतों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों की चाल भी महत्वपूर्ण होगी।
हालांकि शुरुआती संकेत बहुत कमजोर नहीं हैं, लेकिन निवेशकों के सामने कई जोखिम मौजूद हैं। खासकर कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। इसके अलावा West Asia में तनाव बढ़ने की स्थिति में ऊर्जा कीमतों और वैश्विक बाजारों में अचानक अस्थिरता देखने को मिल सकती है।
एशियाई बाजारों में तेजी
सोमवार के शुरुआती कारोबार में ज्यादातर एशियाई बाजारों से सकारात्मक संकेत मिले। दक्षिण कोरिया का KOSPI इंडेक्स 1 प्रतिशत से ज्यादा मजबूत हुआ। जापान को छोड़कर एशिया-प्रशांत क्षेत्र के शेयरों का MSCI इंडेक्स भी करीब 0.8 प्रतिशत ऊपर रहा। जापान का Nikkei सोमवार को बाजार अवकाश के कारण बंद रहा, हालांकि उसके वायदा कारोबार में करीब 0.5 प्रतिशत की बढ़त देखने को मिली।
अमेरिकी शेयर बाजार के वायदा कारोबार में भी मजबूती दिखाई दी। S&P 500 Futures करीब 0.4 प्रतिशत और Nasdaq Futures लगभग 0.6 प्रतिशत ऊपर रहे। यूरोपीय बाजारों के वायदा संकेत भी सकारात्मक रहे। ऐसे में वैश्विक बाजारों का शुरुआती रुख भारतीय इक्विटी के लिए कुछ राहत देने वाला हो सकता है, हालांकि घरेलू बाजार पर तेल और भू-राजनीतिक घटनाक्रम का प्रभाव बना रह सकता है।
कच्चे तेल की कीमतें बनीं बड़ी चिंता
भारतीय शेयर बाजार के लिए सोमवार को कच्चे तेल की कीमत सबसे महत्वपूर्ण संकेतकों में से एक हो सकती है। WTI क्रूड करीब 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है, जबकि Brent क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर है। पिछले सत्र में Brent की कीमत 2.1 प्रतिशत गिरकर 101.63 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी क्रूड 2.1 प्रतिशत की गिरावट के साथ 98.15 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया था।
हालिया गिरावट के बावजूद तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर हैं। इससे भारत के आयात बिल, महंगाई और कंपनियों की लागत पर असर पड़ने की चिंता बनी हुई है। यदि West Asia में तनाव और बढ़ता है तथा कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो कीमतों में दोबारा तेजी आ सकती है।
US-Iran तनाव पर बाजार की नजर
भू-राजनीतिक मोर्चे पर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव निवेशकों के लिए अहम बना हुआ है। ईरान ने आगे किसी सैन्य कार्रवाई की स्थिति में अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। इससे क्षेत्र में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, यदि तनाव दोबारा बढ़ता है तो इसका सीधा असर कच्चे तेल, करेंसी और वैश्विक शेयर बाजारों पर पड़ सकता है। ऐसे में निवेशक West Asia से जुड़ी हर महत्वपूर्ण खबर पर नजर रखेंगे।
रूस के तेल पर अमेरिकी टैरिफ भी अहम
रूस से तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों पर अमेरिकी टैरिफ से जुड़े संभावित कदम भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत ने पहले ही ऐसे उपायों को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। यदि रूसी तेल की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होती है, तो ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है।
इसका असर उभरते बाजारों की धारणा पर भी पड़ सकता है। निवेशकों के लिए अब केवल शेयर बाजार की कंपनियों के नतीजे ही नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा नीति से जुड़े फैसले भी महत्वपूर्ण हो गए हैं।
Fed की नीति और बॉन्ड यील्ड पर नजर
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति भी वैश्विक बाजारों के लिए एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है। हाल के सप्ताहों में अमेरिका की दो वर्षीय ट्रेजरी यील्ड में तेज बढ़ोतरी हुई है। बाजार में अक्टूबर में एक और दर बढ़ोतरी की संभावना को लेकर भी चर्चा बढ़ी है।
अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें और बॉन्ड यील्ड उभरते बाजारों से विदेशी निवेश के प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं। इसका असर भारतीय रुपये और शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है। इसलिए घरेलू निवेशकों की नजर अमेरिकी बॉन्ड बाजार और फेड की आगे की नीति पर बनी रहेगी।