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पुणे फेस्टिवल 2026 के उद्घाटन में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने शिवाजी महाराज, लोकमान्य तिलक और डॉ. अंबेडकर के योगदान को याद किया और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर जोर दिया।
पुणे में आयोजित 38वें पुणे फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने छत्रपति शिवाजी महाराज, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और डॉ. भीमराव अंबेडकर को श्रद्धापूर्वक नमन किया। उन्होंने कहा कि इन महान व्यक्तित्वों के योगदान ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ देश की एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्री गणेश कला क्रीड़ा रंगमंच में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने पुणे को साहस, सामाजिक न्याय, समानता और देशभक्ति के आदर्शों को आगे बढ़ाने वाली भूमि बताया। उन्होंने कहा कि पुणे की पहचान केवल शिक्षा और उद्योग के केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत से भी जुड़ी हुई है।
गणेश पूजा से होती है शुभ कार्य की शुरुआत
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने गणेश उत्सव और पुणे फेस्टिवल के संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से करने की परंपरा है। उन्होंने कहा कि गणेश चतुर्थी के उत्सव के बीच आयोजित होने वाला पुणे फेस्टिवल देश की सांस्कृतिक विविधता और परंपराओं का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। उनके अनुसार, यह आयोजन संगीत, नृत्य, नाटक, साहित्य, खेल और पर्यटन जैसे विभिन्न क्षेत्रों को एक मंच पर लाता है और लोगों को भारत की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ता है।
शिवाजी महाराज के योगदान को किया याद
सीपी राधाकृष्णन ने 17वीं सदी के मराठा शासक छत्रपति शिवाजी महाराज के योगदान को याद करते हुए कहा कि उनके संघर्ष और त्याग को भुलाया नहीं जाना चाहिए। उन्होंने शिवाजी महाराज के दक्षिण भारत अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके अभियानों ने दक्षिण भारत में हिंदू परंपराओं और तमिल साहित्य के संरक्षण में भूमिका निभाई। उपराष्ट्रपति ने विशेष रूप से वेल्लोर किले और तंजावुर से जुड़े शिवाजी महाराज के अभियान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि शिवाजी महाराज का जीवन साहस, नेतृत्व और सांस्कृतिक संरक्षण की प्रेरणा देता है।
लोकमान्य तिलक के स्वतंत्रता आंदोलन को किया याद
उपराष्ट्रपति ने स्वतंत्रता संग्राम में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के योगदान को भी याद किया। उन्होंने तिलक के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वतंत्रता को उन्होंने भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार बताया था। राधाकृष्णन ने कहा कि लोकमान्य तिलक ने देश में राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता की भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुणे को तिलक की कर्मभूमि से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि शहर की ऐतिहासिक विरासत आज भी लोगों को देशभक्ति और सामाजिक जागरूकता की प्रेरणा देती है।
डॉ. अंबेडकर और संविधान का किया उल्लेख
उपराष्ट्रपति ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के योगदान को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत की एकता को बनाए रखने में संविधान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पुणे के ऐतिहासिक सामाजिक आंदोलनों और 1932 के पूना पैक्ट का उल्लेख करते हुए उन्होंने सामाजिक न्याय और समानता के आदर्शों को याद किया। उन्होंने कहा कि पुणे ने महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर जैसे प्रमुख नेताओं के विचार-विमर्श और सामाजिक बदलाव से जुड़े महत्वपूर्ण अध्यायों को देखा है। उनके मुताबिक, सामाजिक न्याय और समानता की भावना भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की महत्वपूर्ण आधारशिला है।
पुणे की शिक्षा और रक्षा क्षेत्र में भी बड़ी भूमिका
सीपी राधाकृष्णन ने पुणे को देश के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में शामिल बताते हुए कहा कि यहां के शिक्षण संस्थान और पुस्तकालय बौद्धिक विमर्श के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग जैसी संस्थाओं का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, ये संस्थान राष्ट्रीय महत्व के हैं और सशस्त्र बलों के लिए आवश्यक मानव संसाधन तैयार करने में योगदान देते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा, उद्योग, आईटी, ऑटोमोबाइल, खेल, पर्यटन और बागवानी जैसे क्षेत्रों में भी पुणे ने अपनी अलग पहचान बनाई है।
विविधता और एकता का संदेश देता है पुणे फेस्टिवल
उपराष्ट्रपति ने बताया कि गणेश चतुर्थी समारोह और पुणे फेस्टिवल के उद्घाटन कार्यक्रम में 21 देशों के छात्रों की भागीदारी भारत की विविध संस्कृति के प्रति वैश्विक रुचि को दर्शाती है। उन्होंने अलग-अलग धर्मों और परंपराओं के प्रति सम्मान को भारत की सांस्कृतिक भावना का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उनके अनुसार, एक-दूसरे की आस्था और परंपराओं का सम्मान करना सामाजिक सद्भाव को मजबूत करता है। उन्होंने पुणे फेस्टिवल को भारत की सांस्कृतिक विविधता और एकता का प्रतिनिधित्व करने वाला आयोजन बताया।
‘विकास भी, विरासत भी’ पर दिया जोर
राधाकृष्णन ने कहा कि भारत की प्रगति को केवल बुनियादी ढांचे, तकनीक या सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए। किसी देश की वास्तविक प्रगति में उसकी सभ्यतागत विरासत, भाषाओं, परंपराओं और कला रूपों का संरक्षण भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने ‘विकास भी, विरासत भी’ के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक शहरों का निर्माण करते समय उनकी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखना जरूरी है।
38 साल से संस्कृति को मंच दे रहा पुणे फेस्टिवल
12 दिनों तक चलने वाला पुणे फेस्टिवल 14 सितंबर को गणेशोत्सव के बीच शुरू हुआ था और इसका औपचारिक उद्घाटन 18 सितंबर को किया गया। इस वर्ष यह महोत्सव 25 सितंबर तक चलेगा। आयोजन की करीब चार दशक की यात्रा में संगीत, नृत्य, नाटक, साहित्य, खेल और पर्यटन को बढ़ावा देने वाले कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। इस वर्ष का पुणे फेस्टिवल इसके संस्थापक अध्यक्ष और पूर्व पुणे सांसद सुरेश कलमाड़ी की स्मृति को समर्पित किया गया है, जिनका जनवरी 2026 में निधन हुआ था। समारोह में महाराष्ट्र के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा, उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार, राज्य सरकार के मंत्री चंद्रकांत पाटिल, आशीष शेलार और अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे। उपराष्ट्रपति ने पुणे फेस्टिवल की निरंतरता और सांस्कृतिक योगदान के लिए आयोजकों को बधाई दी।