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बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ तय गाइडलाइंस के उल्लंघन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित हाई कोर्ट जाने का निर्देश दिया।
देशभर में चर्चा का विषय बने ‘बुलडोजर एक्शन’ के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और नया रुख अपनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने उन सभी अवमानना याचिकाओं (Contempt Petitions) पर विचार करने से साफ तौर पर इनकार कर दिया है, जिनमें विभिन्न राज्य सरकारों पर बुलडोजर कार्रवाई से जुड़े अदालती दिशा-निर्देशों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। न्यायालय ने दो टूक शब्दों में कहा कि इस प्रकार की स्थानीय और तथ्यात्मक शिकायतों को देश की शीर्ष अदालत के बजाय संबंधित राज्यों के हाई कोर्ट (उच्च न्यायालय) के समक्ष उठाया जाना चाहिए। इस फैसले के बाद अब बुलडोजर जस्टिस से जुड़ी कानूनी लड़ाइयों का केंद्र राज्यों के हाई कोर्ट बनने जा रहे हैं।
प्रत्येक दावे पर निर्णय देना सुप्रीम कोर्ट के लिए संभव नहीं: बेंच
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली विशेष बेंच कर रही थी। बेंच ने सभी पक्षों की दलीलें और याचिकाओं में दिए गए विवरणों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट किया कि इन सभी अवमानना याचिकाओं में अलग-अलग और बेहद जटिल तथ्यात्मक विवाद शामिल हैं।
न्यायालय ने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई तोड़-फोड़ की कार्रवाइयों के पीछे के जमीनी तथ्य, परिस्थितियां और स्थानीय नियम भिन्न हैं। ऐसे में प्रत्येक व्यक्तिगत दावे और मामले की तह तक जाकर सुप्रीम कोर्ट के लिए फैसला सुनाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की व्यापकता को देखते हुए सभी अवमानना याचिकाओं को संबंधित राज्यों के हाई कोर्ट में विचार करने के लिए स्थानांतरित करने (भेजने) का औपचारिक आदेश जारी कर दिया।
राज्य सरकारों पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के उल्लंघन का आरोप
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने विभिन्न राज्य सरकारों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए एडवोकेट अनस तनवीर ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2024 में बुलडोजर कार्रवाई को लेकर बेहद सख्त और स्पष्ट गाइडलाइंस जारी किए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर कुछ राज्यों द्वारा उनका खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है।
उन्होंने कुछ ऐसे चौंकाने वाले उदाहरणों का भी जिक्र किया जहां स्थानीय हाई कोर्ट्स को यह तक पता नहीं था कि इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट का कोई ऐतिहासिक फैसला आ चुका है। वकीलों का आरोप था कि कई राज्यों में प्राचीन स्मारकों, धार्मिक पूजा-स्थलों और नागरिकों की निजी संपत्तियों के खिलाफ बिना उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए रात-ओ-रात बुलडोजर चला दिया गया, जो कि न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आता है।
अदालतों में सीनियर एडवोकेट्स की दलीलें: “बुलडोजर एक्शन महज एक दंडात्मक कार्रवाई”
इस मामले में याचिकाकर्ताओं की पैरवी कर रहे देश के कई नामचीन वरिष्ठ वकीलों ने कोर्ट के सामने तीखे तर्क रखे। गुजरात के सोमनाथ में कुछ मस्जिदों और धार्मिक ढांचों को कथित तौर पर अवैध बताकर गिराए जाने के मामले में पेश हुए सीनियर एडवोकेट हुज़ेफ़ा अहमदी ने कहा कि कोर्ट को इन “गंभीर उल्लंघनों” पर मूकदर्शक नहीं बने रहना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि यदि उन्हें केवल 15 मिनट का समय दिया जाए, तो वे अदालत के सामने यह साबित कर सकते हैं कि अधिकारियों ने जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की धज्जियां उड़ाई हैं।
वहीं, महाराष्ट्र के एक मामले का हवाला देते हुए वरिष्ठ वकील चंद्र उदय सिंह ने एक और गंभीर पहलू की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि अक्सर देखा गया है कि स्थानीय राजनेताओं द्वारा सार्वजनिक मंचों से किसी आरोपी के घर पर बुलडोजर चलाने की घोषणा की जाती है और उसके तुरंत बाद प्रशासनिक अमला कार्रवाई कर देता है। उन्होंने दलील दी कि यह कार्रवाइयां अतिक्रमण हटाने के लिए नहीं, बल्कि साफ तौर पर नागरिकों को कानून से इतर जाकर “सज़ा देने” (Punitive Action) के उद्देश्य से की जा रही हैं, जो पूरी तरह से असंवैधानिक है।
झारखंड के धनबाद में हालिया एक्शन और भविष्य की राह
देश में बुलडोजर जस्टिस का मुद्दा कितना गरमाया हुआ है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में झारखंड के धनबाद में कुख्यात गैंगस्टर प्रिंस खान के घर पर भी इसी तरह की भारी-भरकम बुलडोजर कार्रवाई को अंजाम दिया गया। ऐसे मामलों को लेकर लगातार यह बहस चल रही है कि क्या प्रशासन बिना नोटिस दिए या कानूनी औपचारिकताएं पूरी किए किसी की संपत्ति को ध्वस्त कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस नए आदेश के बाद अब गेंद राज्यों के उच्च न्यायालयों के पाले में चली गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि स्थानीय परिस्थितियों और राजस्व रिकॉर्ड्स की बेहतर समझ हाई कोर्ट के पास होती है, इसलिए वे इन मामलों की अधिक सटीकता से त्वरित जांच कर सकेंगे। अब याचिकाकर्ताओं को इंसाफ के लिए अपने-अपने राज्यों के उच्च न्यायालयों का रुख करना होगा।