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नेपाल में ग्लेशियर झील टूटने से हुई तबाही के बीच IIT मंडी की स्टडी ने हिमाचल की 9-12 ग्लेशियर झीलों को गंभीर खतरे वाली श्रेणी में बताया है।
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ और उससे हुई भारी तबाही को एक सप्ताह बीत चुका है, लेकिन मलबे के बीच अब भी लोगों की तलाश जारी है। राहत और बचाव दल युद्धस्तर पर अभियान चला रहे हैं। इस प्राकृतिक आपदा ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और उनसे बनी झीलों को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। ग्लेशियर झील के टूटने से आई बाढ़ ने नेपाल में बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान किया है। इसी बीच आईआईटी मंडी की एक स्टडी में हिमाचल प्रदेश की ग्लेशियर झीलों को लेकर चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। करीब 200 ग्लेशियर झीलों के अध्ययन में 9 से 12 झीलों को ऐसी स्थिति में पाया गया है, जिन्हें गंभीर या क्रिटिकल श्रेणी में रखा जा सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ रही है और इसके चलते इन झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है। यदि भविष्य में इनमें से कोई झील टूटती है, तो बड़े पैमाने पर अचानक बाढ़ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की स्थिति पैदा हो सकती है।
हिमाचल की ग्लेशियर झीलों का बढ़ रहा आकार
आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर और संस्थापक चेयरपर्सन डेरिक्स पी. शुक्ला के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियरों से बनी कई झीलों का क्षेत्रफल पिछले एक दशक में 30 से 60 प्रतिशत तक बढ़ा है। झीलों का लगातार फैलना भविष्य के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है। ग्लेशियरों के पिघलने से झीलों में पानी की मात्रा बढ़ती है और इससे उनकी सीमाएं भी विस्तृत होती जाती हैं। ऐसी परिस्थितियों में यदि प्राकृतिक रूप से बनी झील की दीवार कमजोर होती है या अचानक टूट जाती है, तो बड़ी मात्रा में पानी बेहद तेज गति से नीचे की ओर आ सकता है। इससे नदी घाटियों और निचले इलाकों में भारी तबाही की आशंका रहती है।
पर्यटन और प्रदूषण भी बढ़ा रहे खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के पीछे केवल बढ़ता तापमान ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती मानवीय गतिविधियां भी चिंता का विषय हैं। डेरिक्स पी. शुक्ला के मुताबिक, पहाड़ी इलाकों में पर्यटन बढ़ने के साथ वाहनों की आवाजाही और प्रदूषण भी बढ़ा है। वाहनों और अन्य गतिविधियों से निकलने वाला कार्बन तथा धूल ग्लेशियरों की सतह पर जमा हो जाती है। इससे बर्फ की सतह पर काली परत बनती है, जो सूर्य की ऊर्जा को अधिक मात्रा में अवशोषित करती है। परिणामस्वरूप बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
हिमालयी क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों में सड़क, सुरंग और अन्य कनेक्टिविटी परियोजनाओं का तेजी से विस्तार हुआ है। इससे दूरदराज के इलाकों तक पहुंच आसान हुई है और पर्यटन भी बढ़ा है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में विकास कार्यों को पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाने की जरूरत है।
पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से भी बढ़ सकता है खतरा
हिमालयी क्षेत्र में पर्माफ्रॉस्ट की मौजूदगी भी वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण विषय है। पर्माफ्रॉस्ट जमीन के नीचे मौजूद मिट्टी, चट्टान या अन्य सामग्री की वह परत होती है जो लंबे समय तक जमी रहती है। तापमान बढ़ने पर जब यह परत पिघलने लगती है तो जमीन की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इससे पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ग्लेशियरों के पिघलने, झीलों के विस्तार और पहाड़ी जमीन की अस्थिरता का आपस में संबंध है। यही वजह है कि हिमालयी क्षेत्र में किसी एक प्राकृतिक बदलाव को अलग-अलग करके देखना मुश्किल है। एक जगह ग्लेशियर टूटने या भूस्खलन से पानी का प्रवाह अचानक बदल सकता है और इससे नीचे बसे क्षेत्रों में गंभीर संकट पैदा हो सकता है।
NDMA ने चार झीलों को बताया संवेदनशील
नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी यानी NDMA ने हिमाचल प्रदेश में चार ग्लेशियर झीलों की पहचान की है, जिन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत बताई गई है। इनमें घेपन झील, वासुकी झील, काशांग झील और बास्पा के पास स्थित एक झील शामिल है। वहीं, आईआईटी मंडी के अध्ययन में 9 से 12 झीलों को गंभीर स्थिति वाली श्रेणी में रखा गया है।
शुक्ला के अनुसार, शोध के दौरान राज्य में 2,000 से अधिक झीलों और कई ग्लेशियरों का अध्ययन किया गया। आम लोगों की सुरक्षा के लिहाज से घेपन झील, योचे और काली कुंड जैसी झीलों को लेकर विशेष चिंता जताई गई है, क्योंकि इनमें लगातार बदलाव हो रहे हैं और इनका आकार बढ़ रहा है। वासुकी झील का आकार भी बदल रहा है, हालांकि उसके नीचे कई किलोमीटर तक बड़ी आबादी नहीं होने के कारण इससे जुड़ा जोखिम तुलनात्मक रूप से कम बताया गया है।
26 अगस्त को नेपाल में कैसे आई तबाही?
नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने ग्लेशियल झीलों के खतरे को एक बार फिर दुनिया के सामने ला दिया। वैज्ञानिकों की एक थ्योरी के मुताबिक, ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर ल्हेंदे खोला नदी में गिरा, जिसके बाद वहां पानी जमा होकर एक कृत्रिम झील जैसी स्थिति बनी। बाद में इस झील के टूटने से पानी का तेज बहाव भोटेकोशी नदी की ओर चला गया। भोटेकोशी, ल्हेंदे खोला की सहायक नदी है और चीन से नेपाल की दिशा में बहती है। अचानक बढ़े जलप्रवाह ने नदी के आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचा दी।
सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश जारी
नेपाल में आपदा के बाद हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे कर्मचारियों को निकालने का अभियान अब भी जारी है। राहत एवं बचाव दल मलबे और कीचड़ के बीच लोगों की तलाश कर रहे हैं। कई सुरंगों में मिट्टी इतनी अधिक भर गई है कि अंदर खाली जगह तक नहीं बची है। ड्रोन के जरिए भी सुरंगों और प्रभावित क्षेत्रों की निगरानी की जा रही है।
नेपाल की इस त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों की निगरानी और आपदा प्रबंधन की जरूरत को और गंभीर बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते संवेदनशील झीलों की पहचान, नियमित निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और जोखिम वाले इलाकों में नियंत्रित विकास से भविष्य में होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।