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संसदीय समिति (JPC) ने 130वें संविधान संशोधन विधेयक 2025 पर अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट को टाल दिया है। इस बिल के तहत जेल में बंद रहने पर पीएम, सीएम या मंत्रियों को पद से निलंबित करने का प्रावधान है।
संसद के आगामी मानसून सत्र से ठीक पहले एक बड़े और अप्रत्याशित घटनाक्रम में, ‘संविधान (एक सौ तीसवां संशोधन) विधेयक, 2025’ और दो अन्य संबंधित विधेयकों की समीक्षा कर रही संसदीय समिति (JPC) ने अपनी मसौदा (ड्राफ्ट) रिपोर्ट को अपनाने का फैसला टाल दिया है। समिति ने इस संवेदनशील विधेयक पर सर्वसम्मति से और अधिक विचार-विमर्श और विभिन्न हितधारकों (Stakeholders) के साथ व्यापक परामर्श करने का निर्णय लिया है।
इस संसदीय समिति की अध्यक्ष और भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी ने पत्रकारों को बताया कि फिलहाल समिति ने इस रिपोर्ट को “लंबित” रखने का फैसला किया है। यह विधेयक देश की राजनीति और संवैधानिक व्यवस्था के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके कानून बनने के बाद कोई भी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री जेल में रहते हुए सरकार नहीं चला सकेगा।
क्या है 130वां संविधान संशोधन विधेयक, 2025?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अगस्त 2025 में इस ऐतिहासिक विधेयक को लोकसभा में पेश किया था। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक जीवन में गिरते नैतिक स्तर को सुधारना और राजनीति में शुचिता व ईमानदारी लाना है।
- विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या केंद्र व राज्य सरकार का कोई मंत्री गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तार होता है या 30 दिनों तक हिरासत में रहता है, तो उसे उसके पद से हटाने या निलंबित करने का कानूनी ढांचा तैयार किया जाएगा।
गृह मंत्री ने बिल पेश करते हुए कहा था कि संविधान निर्माताओं ने कभी यह कल्पना नहीं की होगी कि भविष्य में ऐसे राजनेता भी होंगे जो नैतिक आधार पर गिरफ्तार होने से पहले इस्तीफा देने से इनकार कर देंगे। हाल के वर्षों में देश में ऐसी अनोखी परिस्थितियाँ देखी गई हैं जहाँ मुख्यमंत्री या मंत्रियों ने जेल से ही सरकार चलाने का प्रयास किया, जो कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है।
30 दिनों की समय-सीमा और निलंबन का प्रावधान
विधेयक में जेल में बंद राजनेताओं के लिए एक विशेष प्रावधान शामिल है। इसके तहत आरोपी नेता को गिरफ्तारी के बाद अदालत से जमानत लेने के लिए 30 दिनों का समय मिलेगा।
- हटाने या स्वतः निलंबन की प्रक्रिया: यदि कोई नेता 30 दिनों के भीतर जमानत हासिल करने में विफल रहता है, तो 31वें दिन केंद्र में प्रधानमंत्री या राज्यों में मुख्यमंत्री उन्हें उनके पद से हटा देंगे।
- कानूनी अयोग्यता: यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो वे स्वतः ही अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए कानूनी रूप से अयोग्य (Disqualified) हो जाएंगे।
- वापसी का क्लॉज: हालांकि, इसमें एक ‘ऑटोमैटिक रिवर्सल क्लॉज’ भी प्रस्तावित है, जिसके तहत यदि कानूनी प्रक्रिया के बाद संबंधित नेता को जमानत मिल जाती है, तो वह अपने पद पर वापस लौट सकता है।
संसदीय समिति की बैठक में क्या हुआ?
समिति की बैठक के एजेंडे में ड्राफ्ट रिपोर्ट को स्वीकार करना शामिल था, लेकिन चर्चा के दौरान आम सहमति बनी कि इस पर और विमर्श की जरूरत है। सूत्रों के मुताबिक, ड्राफ्ट रिपोर्ट में कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें रखी गई थीं:
- ‘निलंबन’ शब्द का उपयोग: रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि पद से “हटाने या समाप्त होने” (Removal/Cease) के बजाय “निलंबन” (Suspension) शब्दावली का उपयोग किया जाना चाहिए।
- गंभीर अपराध की परिभाषा: “गंभीर आपराधिक मामलों” को स्पष्ट करते हुए सिफारिश की गई कि इसके तहत ऐसे अपराधों को रखा जाए जिनमें 5 वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो।
- फास्ट-ट्रैक अदालतें: मुकदमों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष या फास्ट-ट्रैक अदालतों के गठन की बात कही गई थी।
बैठक के दौरान जब इन सिफारिशों पर मतदान (Voting) चल रहा था, तभी मतभेदों को देखते हुए इसे टालने का फैसला किया गया। इसके बाद एआईएमआईएम (AIMIM) नेता असदुद्दीन ओवैसी और एनसीपी (शरद पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने समिति द्वारा और विचार-विमर्श के फैसले का स्वागत करते हुए अपने असहमति नोट (Dissent Notes) वापस ले लिए।
विपक्ष का विरोध और संवैधानिक आपत्तियां
मुख्य विपक्षी दल इस संविधान संशोधन विधेयक का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। विपक्षी सदस्यों का तर्क है कि इस कानून का दुरुपयोग राजनीतिक द्वेष के लिए किया जा सकता है।
विपक्ष के एक सदस्य ने ‘निलंबन’ प्रावधान की खामियों को उजागर करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया में कार्रवाई की शुरुआत (Trigger) कार्यपालिका (Executive) यानी सरकार की तरफ से होगी, जबकि राहत न्यायपालिका (Judiciary) से मिलेगी। विपक्ष की मांग है कि किसी भी नेता के खिलाफ ऐसी दंडात्मक या निलंबन की कार्रवाई की शुरुआत भी कार्यपालिका के बजाय न्यायपालिका के आदेश के माध्यम से ही होनी चाहिए।
राजनीतिक गलियारों में अटकलें और अन्य संबंधित बिल
इस विधेयक के साथ ही समिति ‘जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025’ और ‘केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक, 2025’ पर भी विचार कर रही है, जिन पर गृह मंत्रालय के अधिकारियों के विचार सुने गए हैं।
राजनीतिक हलकों में यह अटकलें तेज थीं कि सरकार इस विधेयक को मानसून सत्र में पारित कराने की तैयारी में थी। इसके अलावा, महिला आरक्षण से जुड़े परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) को लेकर भी चर्चाएं गर्म हैं, जिसे शीतकालीन सत्र में दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण पराजित होना पड़ा था। अब जेपीसी द्वारा रिपोर्ट को लंबित रखने के बाद, इस मानसून सत्र में 130वें संविधान संशोधन विधेयक के पारित होने की संभावना फिलहाल टल गई है।