परिसीमन बिल को लेकर किरेन रिजिजू ने कहा कि इसे संसद में कब पेश करना है, इसका फैसला पार्टी नेतृत्व करेगा। महिला आरक्षण और 543 सीटों को लेकर बहस तेज है।
संसद में परिसीमन बिल लाने को लेकर चल रही अटकलों के बीच केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मंगलवार को स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि सरकार ने परिसीमन विधेयक को संसद में पेश करने के लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं की है। मीडिया में इस संबंध में लगातार खबरें और कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन रिजिजू ने कहा कि विधेयक कब लाया जाएगा, इसका फैसला पार्टी नेतृत्व व्यापक विचार-विमर्श के बाद करेगा। उनके बयान के बाद फिलहाल उन अटकलों पर विराम लगता दिख रहा है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि सरकार जल्द ही परिसीमन से संबंधित विधेयक संसद में पेश कर सकती है।
विधेयक कब आएगा, नेतृत्व करेगा फैसला
एएनआई से बातचीत में किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार ने कभी यह नहीं कहा कि परिसीमन विधेयक किसी निश्चित तारीख या समय पर संसद में लाया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि विधायी कार्यों का कार्यक्रम तय करना नेतृत्व के अधिकार क्षेत्र में आता है। उनके मुताबिक, किसी भी महत्वपूर्ण विधेयक को संसद में लाने से पहले व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श किया जाता है और उसके बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाता है। ऐसे में परिसीमन विधेयक को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चाओं के बीच सरकार ने फिलहाल अपनी स्थिति को खुला रखा है।
महिला आरक्षण से जुड़ा है पूरा विवाद
परिसीमन को लेकर मौजूदा राजनीतिक बहस का एक बड़ा हिस्सा महिला आरक्षण के क्रियान्वयन से जुड़ा हुआ है। संसद द्वारा पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। हालांकि, इसके प्रभावी क्रियान्वयन को परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया से जोड़ा गया है। इसी मुद्दे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार मतभेद देखने को मिल रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण को परिसीमन की प्रक्रिया से अलग करके मौजूदा 543 सदस्यीय लोकसभा में ही लागू किया जाना चाहिए।
जयराम रमेश ने सरकार पर साधा निशाना
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने परिसीमन के मुद्दे पर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने दावा किया कि सरकार को अप्रैल में उस समय बड़ा राजनीतिक झटका लगा, जब वह संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सकी। जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि सरकार अब विपक्ष पर जिम्मेदारी डालने और राजनीतिक नैरेटिव को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की मांग स्पष्ट है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण तुरंत दिया जाना चाहिए।
कांग्रेस की मांग क्या है?
जयराम रमेश ने कहा कि कांग्रेस महिला आरक्षण के सिद्धांत का समर्थन करती है, लेकिन इसे परिसीमन के साथ जोड़ने के खिलाफ है। उनके अनुसार, 543 सदस्यीय लोकसभा में एक-तिहाई आरक्षण का मतलब 182 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना होगा। कांग्रेस का कहना है कि यदि इसके लिए किसी तरह के कानूनी या संवैधानिक संशोधन की जरूरत है तो वह किया जाए, लेकिन महिलाओं को आरक्षण देने में देरी नहीं होनी चाहिए। विपक्ष का तर्क है कि परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने तक महिला आरक्षण को रोककर रखना उचित नहीं है।
सरकार और विपक्ष के बीच अलग-अलग रुख
परिसीमन को लेकर सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्षी इंडिया ब्लॉक की सोच अलग-अलग है। भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए परिसीमन को संवैधानिक आवश्यकता के तौर पर देखता है। उसका तर्क है कि नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्समायोजन जरूरी है और इसी प्रक्रिया के जरिए महिला आरक्षण को प्रभावी रूप से लागू किया जा सकता है। दूसरी ओर, कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का कहना है कि महिला आरक्षण को तत्काल मौजूदा लोकसभा सीटों पर लागू किया जाना चाहिए और परिसीमन को इससे अलग रखा जाना चाहिए।
850 सीटों तक बढ़ाने की चर्चा
परिसीमन को लेकर सामने आई चर्चाओं में लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने का मुद्दा भी प्रमुख है। प्रस्तावित परिसीमन व्यवस्था के तहत लोकसभा की सीटों को मौजूदा 543 से बढ़ाकर करीब 850 तक किए जाने की चर्चा रही है। हालांकि, सरकार की ओर से अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि ऐसा कोई विधेयक कब और किस स्वरूप में संसद में पेश किया जाएगा। सीटों की संख्या बढ़ने से संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व का संतुलन भी बदल सकता है, इसलिए यह विषय राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
दक्षिणी राज्यों की चिंता
दक्षिण भारत के कई राज्यों और छोटे राज्यों ने जनसंख्या आधारित सीटों के पुनर्वितरण को लेकर चिंता जताई है। उनका तर्क है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें परिसीमन के बाद राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान नहीं होना चाहिए। दक्षिणी राज्यों की मांग है कि ऐसा संतुलित फार्मूला तैयार किया जाए, जिससे आबादी के आधार पर प्रतिनिधित्व तय करने के साथ-साथ राज्यों के मौजूदा राजनीतिक हितों की भी रक्षा हो।
आगे क्या होगा?
किरेन रिजिजू के बयान से इतना स्पष्ट है कि परिसीमन विधेयक को संसद में पेश करने की कोई निश्चित तारीख फिलहाल घोषित नहीं की गई है। अब निगाहें सरकार और पार्टी नेतृत्व की अगली रणनीति पर रहेंगी। एक तरफ सरकार के सामने महिला आरक्षण को प्रभावी बनाने और भविष्य की जनगणना के अनुरूप प्रतिनिधित्व तय करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ विपक्ष परिसीमन और महिला आरक्षण को अलग-अलग मुद्दों के रूप में देखने की मांग कर रहा है। इसके अलावा दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को भी नजरअंदाज करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। ऐसे में परिसीमन का मुद्दा आने वाले समय में संसद और देश की राजनीति में एक बड़े संवैधानिक एवं राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना रह सकता है।