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दिल्ली में 13 अक्टूबर को वायु गुणवत्ता सूचकांक 157 दर्ज किया गया। जानिए PM2.5 प्रदूषण का फेफड़ों पर क्या असर पड़ सकता है और लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से कैंसर के जोखिम से क्या संबंध है।
दिल्ली में एक बार फिर धुंध और प्रदूषण का असर दिखाई देने लगा है। अगर आप हाल के दिनों में घर से बाहर निकले हैं, तो आपने आसमान में धुंध, गले में खराश या आंखों में जलन जैसी परेशानियां महसूस की होंगी। ऐसे में कई लोग बाहर निकलने से पहले एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी AQI की जांच कर रहे हैं। 13 अक्टूबर 2026 को दिल्ली का AQI 157 दर्ज किया गया। हालांकि, चिंता केवल आज की खराब हवा तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात को लेकर भी है कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से फेफड़ों पर क्या असर पड़ सकता है। वायु प्रदूषण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को समझना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इसका प्रभाव धीरे-धीरे सामने आ सकता है।
दिल्ली में AQI 157 का क्या मतलब है?
13 अक्टूबर 2026 को दोपहर 2:01 बजे दिल्ली का AQI 157 दर्ज किया गया। इस दौरान PM2.5 का स्तर 70 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और PM10 का स्तर 136 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर बताया गया। यहां यह समझना जरूरी है कि AQI की श्रेणियां इस्तेमाल किए जाने वाले पैमाने के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। अमेरिकी AQI पैमाने पर 157 को ‘अनहेल्दी’ यानी स्वास्थ्य के लिए अस्वस्थकर श्रेणी में रखा जाता है, जबकि भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के पैमाने पर 101 से 200 के बीच का AQI ‘मध्यम’ श्रेणी में आता है। इसलिए किसी भी AQI रिपोर्ट को समझते समय यह देखना जरूरी है कि उसमें किस पैमाने का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि, श्रेणी चाहे जो हो, प्रदूषित हवा को पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। खासकर तब, जब प्रदूषण का स्तर लंबे समय तक ऊंचा बना रहे।
PM2.5 क्या है और फेफड़ों के लिए क्यों खतरनाक है?
PM2.5 हवा में मौजूद बेहद छोटे कण होते हैं, जिनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। इनका आकार इतना छोटा होता है कि सांस के साथ ये श्वसन तंत्र के भीतर गहराई तक पहुंच सकते हैं। यही वजह है कि वायु प्रदूषण की चर्चा में PM2.5 को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके मुकाबले PM10 कण आकार में बड़े होते हैं, लेकिन ये भी सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। प्रदूषित हवा में मौजूद महीन कणों के संपर्क में आने से आंखों, नाक और गले में जलन, खांसी तथा सांस लेने में परेशानी हो सकती है। अस्थमा, फेफड़ों की पुरानी बीमारियों या हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों में इसके लक्षण अधिक गंभीर हो सकते हैं। स्वस्थ लोगों को भी प्रदूषण के दौरान असुविधा महसूस हो सकती है, खासकर जब वे लंबे समय तक बाहर रहते हैं।
क्या वायु प्रदूषण से बढ़ सकता है फेफड़ों के कैंसर का खतरा?
‘नेचर’ में प्रकाशित एक अध्ययन ने लंबे समय तक बारीक कणों वाले वायु प्रदूषण के संपर्क और फेफड़ों के कैंसर के बीच संबंध को लेकर चिंता बढ़ाई है। शोध में संकेत मिला कि PM2.5 के संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर के कुछ प्रकारों का जोखिम बढ़ने से संबंध हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग तीन वर्षों तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने और कुछ प्रकार के फेफड़ों के कैंसर के बीच संभावित संबंध सामने आया है। हालांकि, इस निष्कर्ष को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी अध्ययन में सामने आया संबंध अपने आप में यह साबित नहीं करता कि प्रदूषण के संपर्क में रहने वाले हर व्यक्ति को कैंसर होगा। कैंसर का जोखिम कई कारकों से प्रभावित होता है और किसी व्यक्ति का वास्तविक जोखिम उसकी परिस्थितियों पर निर्भर करता है। फिर भी, लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से जुड़े संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
धूम्रपान नहीं करने वालों के लिए भी क्यों अहम है यह शोध?
फेफड़ों के कैंसर को अक्सर धूम्रपान से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह बीमारी उन लोगों में भी हो सकती है जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। वायु प्रदूषण के संपर्क और फेफड़ों के कैंसर के बीच संभावित संबंध इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका असर केवल धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं हो सकता। शहरों में रहने वाले लोग रोजाना यातायात, निर्माण कार्यों, औद्योगिक गतिविधियों और अन्य स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषकों के संपर्क में आ सकते हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति में कैंसर होने का कारण केवल उसके शहर या वहां के AQI के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इस विषय पर शोध का उद्देश्य लंबे समय के जोखिमों को बेहतर तरीके से समझना और सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाना है।
प्रदूषण के दिनों में अपनी सेहत का ध्यान कैसे रखें?
जब हवा की गुणवत्ता खराब हो, तो बाहर की गतिविधियों की योजना बनाते समय स्थानीय AQI की जांच करना उपयोगी हो सकता है। प्रदूषण अधिक होने पर खुले में लंबे समय तक व्यायाम करने से बचें और जरूरत पड़ने पर बाहरी गतिविधियों को कम करें। अस्थमा या फेफड़ों की किसी पुरानी बीमारी से पीड़ित लोगों को अपने चिकित्सक की सलाह और निर्धारित दवाओं का पालन करना चाहिए। यदि प्रदूषण के दौरान लगातार खांसी, सांस लेने में कठिनाई या सीने में परेशानी महसूस हो, तो चिकित्सकीय सलाह लें। गंभीर सांस की तकलीफ होने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है।
दिल्ली में प्रदूषण की समस्या को केवल कुछ दिनों की धुंध के रूप में नहीं देखना चाहिए। PM2.5 जैसे महीन कणों के लंबे समय तक संपर्क से जुड़े संभावित जोखिम बताते हैं कि स्वच्छ हवा स्वास्थ्य के लिए कितनी जरूरी है। व्यक्तिगत सावधानियों के साथ-साथ प्रदूषण के स्रोतों को कम करने और हवा की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए सामूहिक प्रयास भी आवश्यक हैं।