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12th Fail के लिए नेशनल अवॉर्ड जीतने के बाद विक्रांत मैसी ने सिनेमा इंडस्ट्री के बदले नजरिए पर बात की। जानिए विदु विनोद चोपड़ा की सलाह और ‘टीवी एक्टर’ के टैग पर विक्रांत का छलका दर्द।
अभिनेता विक्रांत मैसी के लिए फिल्म ’12th Fail’ में निभाए गए उनके किरदार ने उनके करियर के समीकरणों को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। पिछले साल इस फिल्म में अपने शानदार और जीवंत अभिनय के लिए विक्रांत को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (National Film Award for Best Actor) से सम्मानित किया गया था। News18 को दिए अपने एक विशेष साक्षात्कार में विक्रांत ने स्वीकार किया कि इस बड़ी उपलब्धि के बाद फिल्म इंडस्ट्री का उनके प्रति नजरिया पूरी तरह से बदल गया है और लोग उन पर दांव लगाने के लिए तैयार हैं।
उन्होंने कहा, “बड़े-बड़े कमरों और बैठकों तक मेरी पहुँच निश्चित रूप से बढ़ी है। मैं इस बात से इंकार नहीं करूँगा, लेकिन जिंदगी की प्रकृति ही ऐसी है।” हालांकि, विक्रांत इस बात को लेकर किसी कड़वाहट (Bitter) में नहीं हैं कि पहले उन्हें वह हक नहीं मिल रहा था। उनका मानना है कि यह केवल फिल्म उद्योग का नियम नहीं है, बल्कि खेल, राजनीति और कॉरपोरेट जगत में भी ऐसा ही होता है। जब आप एक बेंचमार्क या मुकाम हासिल कर लेते हैं, तो पूरी दुनिया आपको अलग नजरिए से देखने लगती है।
विदु विनोद चोपड़ा ने दी थी साफ-गोई से भरी सलाह
’12th Fail’ ने भले ही विक्रांत के करियर का पासा पलट दिया हो, लेकिन इसकी शूटिंग के दौरान फिल्म के निर्देशक विदु विनोद चोपड़ा ने उन्हें दर्शकों की मानसिकता को लेकर एक बेहद खरी और ईमानदार सलाह दी थी। विक्रांत विदु विनोद चोपड़ा को अपना मेंटॉर (मार्गदर्शक) मानते हैं जिन्होंने पूरे सफर में उनका हाथ थामे रखा है।
उस वक्त का किस्सा याद करते हुए विक्रांत ने बताया:
“12th Fail के दौरान विदु विनोद चोपड़ा सर ने मुझसे बेहद ईमानदारी से बात की थी। उन्होंने कहा था, ‘कोई भी दर्शक अपने गाढ़े पसीने की कमाई तुम्हें थिएटर में देखने के लिए क्यों खर्च करेगा, जबकि वे तुम्हें आसानी से नेटफ्लिक्स पर देख सकते हैं? वे घर बैठकर तुम्हें मुफ्त में देख सकते हैं।’ लेकिन अब नेशनल अवॉर्ड के बाद स्थितियां पूरी तरह से बदल गई हैं।”
फिल्म ‘मुसाफिर कैफे’ (Musafir Cafe) की रिलीज का इंतजार कर रहे विक्रांत का मानना है कि अब उनके कंधों पर जवाबदेही बढ़ गई है। दर्शक उन पर पैसे खर्च कर रहे हैं, इसलिए वे उनकी उम्मीदों और पैसों की पूरी कीमत (Worth) चुकाना चाहते हैं।
टीवी से फिल्मों तक का सफर और उद्योग का पूर्वाग्रह
विक्रांत मैसी ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत लोकप्रिय टेलीविजन शो ‘धूम मचाओ धूम’ से की थी। लेकिन जैसा कि अक्सर देखा जाता है, टीवी से फिल्मों की तरफ रुख करने वाले कलाकारों के प्रति इंडस्ट्री में एक पूर्वाग्रह (Prejudice) बना रहता है। विक्रांत को भी इस स्टीरियोटाइप और दोहरे रवैये का सामना करना पड़ा था।
विक्रांत ने बताया कि टेलीविजन एक बहुत ही शक्तिशाली माध्यम है, लेकिन इसके बावजूद पेशेवर सिनेमा क्षेत्र में टीवी कलाकारों को कमतर या नीची नजर से देखने का चलन रहा है। हालांकि, अब ओटीटी (OTT) के आने के बाद टीवी, स्ट्रीमिंग और सिनेमा के बीच की सीमाएं धुंधली हो रही हैं और कलाकारों को उनके माध्यम के बजाय अभिनय के आधार पर सराहा जाने लगा है।
‘टीवी एक्टर’ का टैग पहुँचाता था ठेस: पूर्वाग्रह तोड़ने की कोशिश
साक्षात्कार के दौरान विक्रांत ने स्वीकार किया कि करियर के शुरुआती दिनों में जब लोग या उनके सीनियर्स उन्हें ‘टीवी एक्टर’ कहकर बुलाते थे, तो उन्हें यह बात बहुत आहत करती थी। उन्हें महसूस होता था कि यह नामकरण किसी सम्मान से नहीं बल्कि एक पूर्वाग्रह (Bias) से आ रहा है।
विक्रांत ने कहा:
“आज के दौर में आप किसी ऐसे अभिनेता को ‘टीवी एक्टर’ कहकर संबोधित नहीं करते जिसने अपना करियर टीवी से शुरू किया हो, जैसा कि पहले हुआ करता था। लेकिन जब कोई सीनियर मुझे टीवी एक्टर कहता था, तो मुझे बहुत बुरा लगता था। एक एक्टर सिर्फ एक एक्टर होता है, चाहे वह किसी भी प्लेटफॉर्म पर काम करे। इस टैग और पूर्वाग्रह को बदलने के लिए मैंने अपने करियर में बहुत मेहनत और कोशिशें की हैं।”
निष्कर्ष: मेहनत और लगन की जीत
‘लुटेरा’ और ‘सेक्टर 36’ जैसी फिल्मों में अपनी दमदार अदाकारी का लोहा मनवा चुके विक्रांत मैसी की यह कहानी बॉलीवुड में संघर्ष कर रहे हर उस कलाकार के लिए प्रेरणा है, जो रूढ़िवादिता और पूर्वाग्रहों को तोड़कर आगे बढ़ना चाहता है। अपनी कड़ी मेहनत और लगन के दम पर विक्रांत ने साबित कर दिया है कि यदि आपके पास प्रतिभा है, तो देर से ही सही लेकिन पूरी दुनिया आपकी काबिलियत को सलाम करती है।