तनाव का खानपान पर पड़ता है गहरा असर, कभी बढ़ जाती है मीठे की क्रेविंग तो कभी गायब हो जाती है भूख

तनाव का खानपान पर पड़ता है गहरा असर, कभी बढ़ जाती है मीठे की क्रेविंग तो कभी गायब हो जाती है भूख

 

तनाव और चिंता के कारण खानपान की आदतें बदल सकती हैं। जानिए क्यों कुछ लोग तनाव में ज्यादा खाने लगते हैं, जबकि कुछ की भूख गायब हो जाती है और इन आदतों को कैसे सुधारें।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव हमारी दिनचर्या का हिस्सा बनता जा रहा है। काम का दबाव, परिवार की जिम्मेदारियां, रिश्तों से जुड़ी परेशानियां और भविष्य की चिंता न केवल हमारे मूड को प्रभावित करती हैं, बल्कि खाने-पीने की आदतों में भी बदलाव ला सकती हैं। आपने भी कभी तनाव भरे दिन के बाद मीठा खाने की इच्छा महसूस की होगी या चिंता के कारण खाना खाने का मन नहीं किया होगा। कुछ लोग परेशान होने पर जरूरत से ज्यादा खाने लगते हैं, जबकि कुछ लोगों की भूख पूरी तरह गायब हो जाती है। कई बार इसके बाद मन में अपराधबोध भी होने लगता है और व्यक्ति अगले दिन से अपनी खानपान की आदतें सुधारने का संकल्प लेता है। लेकिन कुछ समय बाद वही व्यवहार दोबारा सामने आ जाता है। दरअसल, तनाव और खानपान के बीच गहरा संबंध है। इसे समझना जरूरी है, ताकि हम अपनी भूख, खाने की इच्छा और भावनाओं के बीच अंतर पहचान सकें और अपने स्वास्थ्य का बेहतर ध्यान रख सकें।

तनाव में कभी ज्यादा तो कभी कम क्यों लगती है भूख?

तनाव के दौरान शरीर और मस्तिष्क में कई तरह के बदलाव होते हैं। जब हम किसी परेशानी या दबाव का सामना करते हैं, तो शरीर तनाव से निपटने के लिए हार्मोन और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी प्रतिक्रियाएं सक्रिय करता है। इन बदलावों का असर भूख पर भी पड़ सकता है। कुछ लोगों को तनाव के समय भूख कम लगती है, क्योंकि उनका ध्यान चिंता पर केंद्रित हो जाता है और शरीर की सामान्य भूख के संकेत नजरअंदाज होने लगते हैं। वहीं, कुछ लोगों को बार-बार कुछ खाने की इच्छा होती है, खासकर मीठा या ज्यादा वसा और नमक वाले खाद्य पदार्थ। ऐसा इसलिए हो सकता है, क्योंकि खाना कुछ समय के लिए आराम या खुशी का एहसास देता है। हालांकि, हर व्यक्ति तनाव के प्रति एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं देता। किसी की भूख बढ़ सकती है, तो किसी की घट सकती है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि तनाव कितना है, कितने समय से बना हुआ है और व्यक्ति की दिनचर्या कैसी है।

तनाव में मीठा खाने की इच्छा क्यों बढ़ जाती है?

जब मन परेशान होता है, तो चॉकलेट, मिठाई, बिस्कुट या अन्य पसंदीदा खाद्य पदार्थ खाने का मन कर सकता है। ऐसे खाद्य पदार्थ खाने से कुछ समय के लिए अच्छा महसूस हो सकता है, इसलिए मस्तिष्क तनाव और खाने के बीच संबंध बनाने लगता है। धीरे-धीरे व्यक्ति परेशानी महसूस होते ही भोजन की ओर रुख कर सकता है, भले ही उसे वास्तव में भूख न लगी हो। इसे भावनात्मक खानपान यानी इमोशनल ईटिंग कहा जाता है। इसमें व्यक्ति शारीरिक भूख के बजाय उदासी, अकेलेपन, गुस्से, बेचैनी या तनाव से राहत पाने के लिए खाता है। कभी-कभार मनपसंद चीज खाना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। परेशानी तब बढ़ सकती है, जब भोजन तनाव से निपटने का एकमात्र तरीका बन जाए या व्यक्ति बार-बार जरूरत से ज्यादा खाने लगे। खाने के बाद अपराधबोध महसूस करना भी इस चक्र को और मुश्किल बना सकता है।

चिंता के कारण भूख गायब होना भी है तनाव का संकेत

तनाव का असर केवल ज्यादा खाने तक सीमित नहीं है। कई लोगों को चिंता के दौरान खाने का मन ही नहीं करता। उन्हें पेट भरा हुआ महसूस हो सकता है, भोजन देखकर इच्छा कम हो सकती है या खाने के बारे में सोचने का समय नहीं मिल पाता। अगर व्यक्ति लगातार भोजन छोड़ता रहता है, तो दिनभर थकान, कमजोरी, चिड़चिड़ापन और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी हो सकती है। लंबे समय तक पर्याप्त भोजन न मिलने से शरीर को जरूरी ऊर्जा और पोषक तत्व भी कम मिल सकते हैं। इसलिए तनाव के कारण भूख कम लगने को हमेशा मामूली बात समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि कई दिनों तक भूख प्रभावित रहे, वजन में अनचाहा बदलाव आए या रोजमर्रा के काम करना मुश्किल होने लगे, तो स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।

तनाव और खानपान का चक्र कैसे बन जाता है?

कई बार तनाव और खाने की आदतें एक-दूसरे को प्रभावित करने लगती हैं। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति काम के दबाव में भोजन छोड़ देता है। कुछ घंटों बाद उसे बहुत तेज भूख लगती है और वह जल्दी में ज्यादा खा लेता है। इसके बाद उसे लगता है कि उसने अपनी खानपान की योजना बिगाड़ दी, जिससे तनाव और अपराधबोध बढ़ सकता है। दूसरी ओर, कोई व्यक्ति तनाव में बार-बार मीठा खाता है और बाद में खुद को दोष देने लगता है। दोनों स्थितियों में भावनात्मक परेशानी खाने के व्यवहार को प्रभावित करती रहती है। इसे बदलने के लिए खुद को दोष देने के बजाय यह समझना जरूरी है कि खाने की इच्छा कब और किन परिस्थितियों में बढ़ती या घटती है। नियमित भोजन, पर्याप्त नींद और तनाव को संभालने के स्वस्थ तरीके इस चक्र को तोड़ने में मदद कर सकते हैं।

तनाव के दौरान खानपान को संतुलित रखने के लिए क्या करें?

तनाव के समय खानपान को बेहतर बनाने के लिए कुछ सरल आदतें अपनाई जा सकती हैं। सबसे पहले, भोजन का एक नियमित समय तय करने की कोशिश करें, ताकि व्यस्तता या चिंता के कारण बार-बार खाना न छूटे। यदि एक बार में ज्यादा खाना मुश्किल लगता है, तो थोड़ी मात्रा में नियमित अंतराल पर भोजन करना उपयोगी हो सकता है। अपने शरीर के संकेतों पर ध्यान दें और खुद से पूछें कि क्या आपको शारीरिक भूख लगी है या आप किसी भावना से राहत पाने के लिए खा रहे हैं। यदि मीठा खाने की इच्छा हो, तो खुद को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय संतुलित विकल्प चुनें और अपने भोजन में प्रोटीन, फाइबर तथा अन्य जरूरी पोषक तत्व शामिल करें। पर्याप्त पानी पीना, नियमित शारीरिक गतिविधि, गहरी सांस लेने का अभ्यास और अच्छी नींद भी तनाव को संभालने में सहायक हो सकते हैं। यदि तनाव लगातार बना हुआ है, तो किसी भरोसेमंद व्यक्ति या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना मददगार हो सकता है।

कब डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है?

यदि तनाव के कारण बार-बार जरूरत से ज्यादा खाना, लगातार भोजन छोड़ना, भूख में लंबे समय तक कमी या वजन में अनचाहा बदलाव हो रहा है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। अगर खाने को लेकर अपराधबोध, डर या नियंत्रण खोने की भावना बार-बार पैदा होती है, तो इसे केवल इच्छाशक्ति की कमी न समझें। ऐसे मामलों में डॉक्टर, पोषण विशेषज्ञ या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ सही सहायता दे सकते हैं। तनाव के कारण खानपान में बदलाव आना एक आम अनुभव हो सकता है, लेकिन इसका लंबे समय तक बने रहना शरीर और मन दोनों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए खुद को दोष देने के बजाय अपनी भावनाओं को समझना, नियमित भोजन करना और जरूरत पड़ने पर मदद लेना बेहतर कदम है।

 

 

 

 

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