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शिवलिंग पर तांबे या चांदी के लोटे से जल चढ़ाना सबसे शुभ माना जाता है। जानिए जलाभिषेक की सही दिशा, नियम और किन बर्तनों से बचना चाहिए।
भगवान शिव की पूजा-अर्चना में जल से अभिषेक (जलाभिषेक) का विशेष महत्व है। माना जाता है कि शिवलिंग पर श्रद्धापूर्वक केवल एक लोटा जल अर्पित करने से भी महादेव प्रसन्न होकर अपने भक्तों के सभी दुख और कष्ट हर लेते हैं। हालांकि, धार्मिक शास्त्रों और पुराणों में जलाभिषेक के कुछ निश्चित नियम और विधान बताए गए हैं। गलत धातु के बर्तन का उपयोग करने या गलत तरीके से जल अर्पित करने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
आइए विस्तार से जानते हैं कि शिवलिंग पर किस धातु के लोटे से जल चढ़ाना सबसे शुभ माना जाता है और जलाभिषेक से जुड़े मुख्य नियम क्या हैं।
शिवलिंग पर किस धातु के लोटे से जल चढ़ाना है सबसे शुभ?
शास्त्रों में विभिन्न धातुओं का अपना धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बताया गया है। शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए धातुओं का चयन इस प्रकार करना चाहिए:
1. तांबे का लोटा (सर्वोत्तम एवं सबसे शुभ)
शिवलिंग पर जल अर्पित करने के लिए तांबे (Copper) का लोटा सबसे उत्तम और पवित्र माना गया है। तांबे में प्राकृतिक रूप से सात्विक ऊर्जा होती है। मान्यता है कि तांबे के पात्र से जल चढ़ाने से घर में सुख-समृद्धि आती है और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।
- विशेष सावधानी: तांबे के पात्र से केवल जल ही अर्पित करना चाहिए। तांबे के लोटे से कभी भी दूध, दही या पंचामृत शिवलिंग पर न चढ़ाएं, क्योंकि तांबे के संपर्क में आते ही दूध विषाक्त (अशुद्ध) हो जाता है।
2. चांदी का पात्र
यदि आप दूध, दही, घी या पंचामृत से अभिषेक कर रहे हैं, तो चांदी (Silver) का पात्र सबसे शुभ माना जाता है। चांदी शीतलता प्रदान करती है। इससे भगवान शिव का अभिषेक करने से मानसिक शांति, तनाव से मुक्ति और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
3. पीतल और कांसे का लोटा
तांबा या चांदी उपलब्ध न होने पर पीतल (Brass) या कांसे (Bronze) के बर्तन का उपयोग किया जा सकता है। यह भी पूजा-पाठ के लिए शास्त्रसम्मत और शुभ माना जाता है।
4. सोने का लोटा
सोने (Gold) के बर्तन से जलाभिषेक करना अत्यंत दुर्लभ और वैभव प्रदान करने वाला माना जाता है, हालांकि सामान्य पूजा-विधान में तांबे और चांदी का उपयोग ही सर्वाधिक प्रचलित है।
इन बर्तनों का भूलकर भी न करें प्रयोग (वर्जित पात्र)
शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय निम्नलिखित सामग्रियों से बने पात्रों का प्रयोग सख्त वर्जित है:
- लोहा (Iron) और स्टील (Steel): शास्त्रों में पूजा-पाठ के लिए लोहे और स्टील को अशुद्ध माना गया है। ये धातुएं राहु-केतु से संबंधित मानी जाती हैं, इसलिए इनसे जलाभिषेक करने से पूजा का फल निष्फल हो जाता है।
- प्लास्टिक (Plastic) और कांच: प्लास्टिक या कांच के बर्तन अशुद्ध होते हैं और इनसे जल चढ़ाना अशुभ माना जाता है।
शिवलिंग पर जल अर्पित करने के 7 सही नियम
केवल सही पात्र का चुनाव करना ही काफी नहीं है, बल्कि जल अर्पित करने की विधि और दिशा का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है:
1. जल अर्पित करने की सही दिशा
जल अर्पित करते समय आपका मुख उत्तर दिशा (North) की ओर होना चाहिए। उत्तर दिशा को भगवान शिव का निवास स्थान (कैलाश पर्वत) और माता पार्वती का स्थान माना जाता है। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल चढ़ाने से बचें।
2. बैठकर या थोड़ा झुककर जल चढ़ाएं
शिवलिंग पर कभी भी बहुत खड़े होकर या अहंकार की मुद्रा में जल नहीं चढ़ाना चाहिए। हमेशा बैठकर या थोड़ा झुककर अत्यंत विनम्रता और श्रद्धाभाव से जलाभिषेक करें।
3. जल चढ़ाने की गति (धीमी और पतली धारा)
जल को हमेशा बहुत धीरे-धीरे और पतली धारा बनाकर अर्पित करना चाहिए। एकदम से पूरा जल शिवलिंग पर उड़ेल देना सही तरीका नहीं है। जितनी धीमी धारा होगी, भगवान शिव उतने ही प्रसन्न होते हैं और मन को भी एकाग्रता प्राप्त होती है।
4. जलधारी और शिव परिवार की पूजा का क्रम
शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग केवल भगवान शिव का स्वरूप नहीं है, बल्कि उसमें पूरा शिव परिवार समाहित है। जलाभिषेक करते समय इस क्रम का पालन करें:
- सबसे पहले जलधारी के दाएं ओर जल चढ़ाएं (श्री गणेश जी का स्थान)।
- फिर बाएं ओर जल चढ़ाएं (श्री कार्तिकेय जी का स्थान)।
- इसके बाद मध्य भाग में जल चढ़ाएं (माता अशोक सुंदरी का स्थान)।
- फिर गोल कटि भाग (हस्तकमल) पर जल अर्पित करें (माता पार्वती का स्थान)।
- अंत में शिवलिंग के शीर्ष पर जल की धारा अर्पित करें।
5. जल अर्पित करते समय मंत्र जप
जल चढ़ाते समय मन ही मन या धीमे स्वर में “ॐ नमः शिवाय” या श्री महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जप करते रहें।
6. जलधारी (सोमसूत्र) को न लांघें
पूजा के बाद शिवलिंग की पूरी परिक्रमा कभी न करें। शिवलिंग से बहकर निकलने वाले जल के मार्ग (जलधारी या सोमसूत्र) को लांघना शास्त्रों में वर्जित माना गया है। जलधारी तक जाकर वापस घूम जाना चाहिए (आधी परिक्रमा)।
7. चढ़े हुए जल का आचमन
अभिषेक के बाद जलधारी से गिर रहे जल की कुछ बूंदें अपने हाथ में लेकर आचमन करें और सिर पर लगाएं। यह चरणामृत की भांति अत्यंत पवित्र और रोग-दोष निवारक माना जाता है।