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रक्षा बंधन 2026 पर जानें भद्रा कौन हैं, भद्रा काल को अशुभ क्यों माना जाता है और राखी बांधने से इसका क्या संबंध है। पढ़ें भद्रा की पौराणिक कथा और धार्मिक मान्यता।
रक्षा बंधन भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनके सुख, समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य तथा लंबी आयु की कामना करती हैं। भाई भी बहन की रक्षा और हर परिस्थिति में उसका साथ देने का संकल्प लेते हैं। सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले शुभ मुहूर्त और तिथि का विचार करने की परंपरा रही है। इसी कारण रक्षा बंधन के दिन राखी बांधने के लिए भी शुभ समय का ध्यान रखा जाता है। विशेष रूप से भद्रा काल को लेकर सावधानी बरतने की धार्मिक मान्यता है।
कौन हैं भद्रा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा का संबंध सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया से बताया जाता है। उन्हें शनिदेव की बहन भी माना जाता है। धार्मिक कथाओं में भद्रा के स्वरूप को उग्र बताया गया है। मान्यता है कि उनका स्वभाव बचपन से ही काफी कठोर था और वे मांगलिक कार्यों में बाधा उत्पन्न करती थीं। उनके इसी स्वभाव के कारण सूर्य देव को उनके विवाह को लेकर चिंता हुई। कई लोगों ने उनके उग्र स्वभाव के कारण विवाह का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। इसके बाद सूर्य देव ने ब्रह्मा जी से इस समस्या का समाधान पूछा।
ब्रह्मा जी ने भद्रा को दिया विशेष स्थान
पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रह्मा जी ने भद्रा को पंचांग के विष्टि करण में स्थान प्रदान किया। मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने भद्रा को निश्चित समय और स्थान पर विचरण करने का अधिकार दिया। कहा गया कि जो व्यक्ति भद्रा के समय शुभ कार्य करेगा और उसके प्रभाव की अनदेखी करेगा, उसके कार्य में बाधा उत्पन्न हो सकती है। इसी कारण हिंदू पंचांग में आने वाले भद्रा काल को कई मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता है।
पंचांग में भद्रा का स्थान कैसे तय हुआ?
हिंदू पंचांग के पांच प्रमुख अंग माने जाते हैं—तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इनमें करण तिथि का आधा भाग होता है और एक तिथि में दो करण होते हैं। पंचांग में कुल 11 करण माने गए हैं। इनमें सात चर करण—बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि हैं। इसके अलावा चार स्थिर करण—शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न माने जाते हैं। इन्हीं में विष्टि करण को भद्रा कहा जाता है। इसलिए पंचांग में भद्रा की स्थिति और उसका समय तिथि की गणना के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
किन तिथियों में रहती हैं भद्रा?
ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार भद्रा अलग-अलग तिथियों के अलग-अलग हिस्सों में आती है। मान्यता के अनुसार शुक्ल पक्ष की अष्टमी और पूर्णिमा के पूर्वार्ध, चतुर्थी और एकादशी के उत्तरार्ध तथा कृष्ण पक्ष की तृतीया और दशमी के उत्तरार्ध में भद्रा रहती है। इसके अलावा सप्तमी और चतुर्दशी के पूर्वार्ध में भी भद्रा की स्थिति मानी जाती है। हालांकि किसी विशेष दिन भद्रा का वास्तविक समय जानने के लिए स्थानीय पंचांग और सूर्योदय के समय के आधार पर गणना की जाती है।
भद्रा काल को क्यों माना जाता है अशुभ?
धार्मिक मान्यताओं में भद्रा को उग्र प्रकृति वाला समय माना गया है। इसी वजह से इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य करने से बचने की परंपरा है। रक्षा बंधन भी भाई-बहन के लिए मंगल और शुभकामना से जुड़ा पर्व है, इसलिए कई परिवारों में भद्रा के दौरान राखी बांधने से परहेज किया जाता है। मान्यता है कि शुभ कार्य को भद्रा से मुक्त समय में करने से उसका सकारात्मक फल प्राप्त होता है।
रावण और शूर्पणखा से जुड़ी कथा
भद्रा को लेकर एक लोकप्रिय लोक-मान्यता रावण और उसकी बहन शूर्पणखा से भी जुड़ी हुई बताई जाती है। कथा के अनुसार शूर्पणखा ने भद्रा काल में रावण को राखी बांधी थी और इसके बाद रावण का विनाश हुआ। इसी कथा के आधार पर भद्रा में राखी बांधने से बचने की मान्यता को बल मिलता है। हालांकि यह कथा धार्मिक और लोक परंपराओं का हिस्सा है और अलग-अलग स्रोतों में इसके विवरण में अंतर मिल सकता है।
रक्षा बंधन 2026 पर भद्रा की स्थिति
वर्ष 2026 में रक्षा बंधन का पर्व 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार इस दिन भद्रा सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी। ऐसे में दिन के दौरान राखी बांधने के लिए भद्रा की बाधा नहीं रहने की बात कही जा रही है। इसका मतलब यह है कि भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिए भद्रा से मुक्त शुभ समय उपलब्ध रहेगा। हालांकि राखी बांधने का सटीक मुहूर्त स्थान के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है, क्योंकि पंचांग की गणना में स्थानीय सूर्योदय और अन्य ज्योतिषीय परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाता है।
राखी बांधते समय रखें शुभ मुहूर्त का ध्यान
रक्षा बंधन के दिन बहनें पूजा की थाली तैयार करके उसमें रोली, अक्षत, दीपक, मिठाई और राखी रख सकती हैं। सबसे पहले भगवान की पूजा करने के बाद भाई को तिलक लगाया जाता है और फिर उसकी कलाई पर राखी बांधी जाती है। इसके बाद भाई को मिठाई खिलाकर उसके सुखी और स्वस्थ जीवन की कामना की जाती है। भाई भी बहन को उपहार देकर उसकी रक्षा और सम्मान का संकल्प लेता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार शुभ मुहूर्त में किया गया यह अनुष्ठान भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम और विश्वास को मजबूत करने का प्रतीक माना जाता है।
भद्रा को लेकर मान्यता का सार
कुल मिलाकर, भद्रा को हिंदू पंचांग के विष्टि करण से जुड़ा समय माना जाता है और धार्मिक परंपराओं में इसे उग्र तथा मांगलिक कार्यों के लिए अनुपयुक्त बताया गया है। इसी कारण रक्षा बंधन पर भी भद्रा के समय राखी बांधने से बचने की परंपरा चली आ रही है। हालांकि रक्षा बंधन 2026 में उपलब्ध गणना के अनुसार भद्रा सूर्योदय से पहले समाप्त होने की बात कही गई है, इसलिए राखी बांधने के दौरान भद्रा की बाधा नहीं रहेगी। शुभ मुहूर्त की पुष्टि के लिए अपने क्षेत्र के विश्वसनीय पंचांग के अनुसार समय देखना उचित रहेगा।