न्यायिक प्रक्रिया पर संकट: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में जजों का बार-बार हटना और सुप्रीम कोर्ट की फटकार

न्यायिक प्रक्रिया पर संकट: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में जजों का बार-बार हटना और सुप्रीम कोर्ट की फटकार

 

सुप्रीम कोर्ट: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में एक ही केस से 4 जजों के हटने पर CJI जस्टिस सूर्यकांत ने नाराजगी जताई। क्या है पूरा मामला, जानें विस्तार से।

हाल ही में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई जिसने न्यायिक प्रणाली की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। न्यायिक अधिकारी अमरीश कुमार जैन की सेवा समाप्ति से जुड़ी 2022 की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के चार न्यायाधीशों ने खुद को अलग (Recusal) कर लिया। इस सूची में हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश शील नागू तक का नाम शामिल है। यह केवल एक বিচ্ছিন্ন घटना नहीं है, बल्कि एक ऐसी खतरनाक प्रवृत्ति का हिस्सा है जो न्यायपालिका में आम लोगों के विश्वास को डगमगा सकती है। जब एक ही मामले से एक के बाद एक जज खुद को अलग करने लगते हैं, तो यह न केवल न्याय में देरी का कारण बनता है, बल्कि याचिकाकर्ता के लिए अनिश्चितता और मानसिक तनाव की स्थिति भी पैदा करता है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और हस्तक्षेप

इस मामले ने जब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने अत्यंत कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने न केवल हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को सख्त निर्देश दिए, बल्कि उन वकीलों को भी आड़े हाथों लिया जो कोर्ट में हंगामा मचाकर जजों को हटने के लिए मजबूर करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कुछ “तथाकथित वरिष्ठ वकील” हाईकोर्ट में जो माहौल बना रहे हैं, वह किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। चीफ जस्टिस ने निर्देश दिया कि इस मामले की सुनवाई के लिए दो जजों की एक विशेष खंडपीठ गठित की जाए, जो 13 जुलाई से रोजाना सुनवाई करे और फैसला सुरक्षित होने तक प्रक्रिया जारी रखे। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि अब किसी भी जज को मामले से हटने की अनुमति नहीं होगी। यदि किसी ने जजों को प्रभावित करने या अलग होने के लिए मजबूर करने की कोशिश की, तो उसे गंभीर परिणामों के लिए तैयार रहना होगा।

न्यायिक ‘रिक्यूजल’ का बढ़ता ट्रेंड

यह मामला न्यायिक इतिहास में जजों के हटने की उस परंपरा का हिस्सा बनता जा रहा है, जिसे ‘जज रिक्यूजल’ कहा जाता है। अमरीश कुमार जैन का मामला संजीव चतुर्वेदी केस की याद दिलाता है। आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी द्वारा दायर अवमानना याचिका के मामले में कुल 16 न्यायाधीशों ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया था। यह एक हैरान करने वाला आंकड़ा है। इससे पहले कुख्यात अपराधी अतीक अहमद से जुड़े मामलों में भी 10 जजों ने सुनवाई से खुद को दूर कर लिया था। 8 अक्टूबर 2025 को न्यायमूर्ति वर्मा का संजीव चतुर्वेदी के मामले से हटना उस कड़ी का 16वां हिस्सा था। बिना कोई ठोस कारण बताए केस को “किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने” का निर्देश देना न्यायिक जवाबदेही पर सवालिया निशान लगाता है।

न्यायपालिका की साख और भविष्य की चुनौतियां

एक न्यायाधीश का किसी मामले से खुद को अलग करना तब तो उचित है जब हितों का टकराव (Conflict of Interest) हो या कोई व्यक्तिगत कारण हो, लेकिन जब यह एक रणनीति के रूप में उपयोग होने लगे, तो यह ‘न्याय से इनकार’ के समान है। सुप्रीम कोर्ट की यह फटकार इस बात का संकेत है कि देश की शीर्ष अदालत अब इस ‘जज शॉपिंग’ या ‘न्यायिक पलायन’ की संस्कृति को और अधिक बर्दाश्त नहीं करेगी। यदि न्यायाधीश किसी दबाव में आकर या केवल हंगामे के कारण केस छोड़ देते हैं, तो यह कानून के शासन के लिए घातक है।

न्यायिक अधिकारी अमरीश कुमार जैन का मामला अब एक परीक्षण के रूप में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करने का प्रयास है कि न्याय प्रणाली किसी भी प्रभावशाली समूह या ‘तथाकथित वरिष्ठ वकीलों’ के खेल का मोहरा न बने। न्यायपालिका के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी गरिमा बनाए रखे और न्यायाधीशों को किसी भी बाहरी दबाव या अवांछित माहौल के बिना मामलों का निपटारा करने के लिए एक सुरक्षित वातावरण प्रदान करे। न्याय में देरी, न्याय का ही गला घोंटना है, और यह मामला उस सिद्धांत की पुनः पुष्टि करता है कि न्यायाधीशों को अपने संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।

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