डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 73वीं पुण्यतिथि: ‘बलिदान दिवस’ पर देश ने किया याद

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 73वीं पुण्यतिथि: 'बलिदान दिवस' पर देश ने किया याद

 

प्रधानमंत्री मोदी सहित भाजपा नेताओं ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उनकी 73वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी। जानिए उनके जीवन, बलिदान और राष्ट्र निर्माण में योगदान के बारे में।

23 जून, 2026 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 73वीं पुण्यतिथि मनाई गई, जिसे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जनसंघ की वैचारिक परंपरा में ‘बलिदान दिवस’ के रूप में याद किया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके अटूट साहस, राष्ट्रवाद के प्रति समर्पण और सार्वजनिक जीवन में उनकी निष्ठा को आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बताया। यह दिन केवल एक स्मृति शेष नहीं है, बल्कि उस संकल्प को दोहराने का अवसर है जिसके लिए डॉ. मुखर्जी ने अपना जीवन समर्पित कर दिया था।

राष्ट्रवाद के प्रखर पुरोधा

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन भारतीय राजनीति के इतिहास में एक मील का पत्थर है। 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वाले डॉ. मुखर्जी एक प्रखर विद्वान, शिक्षाविद और कद्दावर राजनेता थे। आजादी से पूर्व और बाद के भारत के निर्माण में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्होंने फाजुल हक के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया, लेकिन वैचारिक मतभेदों के चलते उन्होंने इस्तीफा देने में भी संकोच नहीं किया। स्वतंत्रता के पश्चात, देश की पहली अंतरिम सरकार में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें उद्योग और आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया था, जो उनकी बौद्धिक क्षमता और राष्ट्रीय कद का प्रमाण था।

‘एक देश, एक विधान’: अनुच्छेद 370 का विरोध

डॉ. मुखर्जी का नाम भारतीय इतिहास में उस संघर्ष के लिए अमर है, जो उन्होंने जम्मू-कश्मीर में ‘अनुच्छेद 370’ के खिलाफ छेड़ा था। उनका दृढ़ मानना था कि भारत में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं हो सकते। उनका नारा “जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी, वह कश्मीर हमारा है” आज भी लाखों देशवासियों के हृदय में गूंजता है। उन्होंने भारत की एकता और अखंडता के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी थी। जून 1953 में कश्मीर में नजरबंदी के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। उनके इसी सर्वोच्च बलिदान को याद करते हुए हर वर्ष 23 जून को ‘बलिदान दिवस’ मनाया जाता है। 2019 में वर्तमान सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को हटाना डॉ. मुखर्जी के उस अधूरे सपने को पूरा करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जाता है, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन न्यौछावर कर दिया था।

भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में स्पष्ट किया है कि डॉ. मुखर्जी का जीवन केवल अतीत का अध्याय नहीं, बल्कि भविष्य के भारत की नींव है। एक ‘विकसित भारत’ के निर्माण का लक्ष्य वही है, जिसे डॉ. मुखर्जी ने अपने जीवन काल में संजोया था। उनके विचार, जो राष्ट्रहित को व्यक्तिगत और दलीय हितों से ऊपर रखते थे, आज भी सार्वजनिक जीवन में कार्यरत लोगों के लिए प्रकाश स्तंभ हैं। दिल्ली में आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री और दिल्ली भाजपा अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की। यह कार्यक्रम इस बात का प्रतीक है कि डॉ. मुखर्जी की विचारधारा आज भी भारतीय राजनीति की धुरी बनी हुई है।

विरासत का निरंतर प्रवाह

डॉ. मुखर्जी का राजनीतिक दर्शन ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ पर आधारित था। उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के निर्माण और देश को आत्मनिर्भर बनाने का उपकरण माना। उनकी शिक्षाओं का ही प्रभाव है कि जनसंघ से निकली भाजपा आज विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में से एक है। उनकी पुण्यतिथि पर किए गए आयोजन केवल एक औपचारिकता नहीं हैं, बल्कि यह उस संकल्प की पुनरावृत्ति है जो उन्होंने “एक राष्ट्र, एक संस्कृति” के विचार को लेकर लिया था।

आज जब भारत ‘विकसित भारत’ की ओर कदम बढ़ा रहा है, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आदर्शों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। उनके जीवन के तीन मुख्य स्तंभ—बौद्धिक स्पष्टता, वैचारिक साहस और अखंड भारत के प्रति अटूट प्रतिबद्धता—आज भी देश की युवा पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करते हैं। उनका बलिदान आज के भारत की एकता के रूप में जीवित है। प्रधानमंत्री का उन्हें याद करना और उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेना यह दर्शाता है कि डॉ. मुखर्जी का वैचारिक प्रभाव भारत की नई पीढ़ी में कितनी गहराई से समाहित है।

अतः, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का 73वां बलिदान दिवस हमें यह याद दिलाता है कि एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और त्याग की आवश्यकता सदैव रहती है। उनके विचार भारत की भावी पीढ़ी को एक विकसित, सुरक्षित और अखंड राष्ट्र की ओर अग्रसर होने का मार्गदर्शन करते रहेंगे।

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