Old Monk की अनसुनी कहानी: कभी जलियांवाला बाग के दोषी जनरल डायर के परिवार से जुड़ा था इस मशहूर रम ब्रांड का इतिहास

Old Monk की अनसुनी कहानी: कभी जलियांवाला बाग के दोषी जनरल डायर के परिवार से जुड़ा था इस मशहूर रम ब्रांड का इतिहास

 

Old Monk Rum की दिलचस्प कहानी जानिए। कभी इसकी निर्माता कंपनी का नाम Dyer Meakin था, जिसका संबंध जलियांवाला बाग हत्याकांड के दोषी जनरल डायर के परिवार से था। पढ़ें पूरा इतिहास।

भारत में अगर किसी रम ब्रांड का नाम सबसे ज्यादा लोकप्रिय और यादगार रहा है, तो वह ओल्ड मॉन्क (Old Monk) है। दशकों से यह सिर्फ एक शराब का ब्रांड नहीं, बल्कि कई लोगों के लिए यादों और भावनाओं का हिस्सा बन चुका है। सर्दियों की शाम, दोस्तों की महफिल और ओल्ड मॉन्क की बोतल—यह तस्वीर भारतीय संस्कृति का एक अलग ही हिस्सा बन गई है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस मशहूर ब्रांड के पीछे की कंपनी का इतिहास भारत के सबसे दर्दनाक अध्यायों में से एक जलियांवाला बाग हत्याकांड से भी जुड़ा रहा है। एक समय ऐसा था जब इस कंपनी का नाम उस परिवार के नाम पर था, जिससे कुख्यात जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड डायर का संबंध था। यह नाम आजादी के करीब दो दशक बाद तक कंपनी के साथ बना रहा और बाद में बदलना पड़ा।

1855 में हुई थी कंपनी की शुरुआत

इस कहानी की शुरुआत वर्ष 1855 से होती है, जब ब्रिटिश व्यवसायी एडवर्ड डायर ने हिमाचल प्रदेश के कसौली में एक ब्रुअरी और सोलन में एक डिस्टिलरी की स्थापना की। इसे एशिया की पहली ब्रुअरी माना जाता है।

उस समय यह केवल शराब बनाने का कारोबार नहीं था, बल्कि पहाड़ी क्षेत्र में औद्योगीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम भी था। ब्रुअरी और डिस्टिलरी ने स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा किए और सोलन क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया।

एडवर्ड डायर और जनरल डायर का संबंध

एडवर्ड डायर का नाम भारतीय इतिहास में इसलिए भी चर्चा में आता है क्योंकि वह जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड डायर के पिता थे।

रेजिनाल्ड डायर वही ब्रिटिश सैन्य अधिकारी था जिसने 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थे भारतीयों पर गोलियां चलाने का आदेश दिया था। इस भीषण नरसंहार में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। यह घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे काले अध्यायों में से एक मानी जाती है।

यही कारण था कि डायर नाम भारतीयों के लिए अत्यंत संवेदनशील और पीड़ादायक बन गया।

कैसे बनी Dyer Meakin & Co.

उसी दौर में ब्रिटेन के प्रसिद्ध ब्रूइंग परिवार से जुड़े एच. जी. मीकिन (H.G. Meakin) ने भी भारत में अपना कारोबार शुरू किया।

बाद में एडवर्ड डायर और मीकिन ने मिलकर Dyer Meakin & Co. Ltd. की स्थापना की। इस साझेदारी के बाद कंपनी ने तेजी से विस्तार किया और सोलन स्थित यूनिट देश की प्रमुख शराब निर्माण इकाइयों में शामिल हो गई।

कंपनी में लगभग 200 कर्मचारियों को रोजगार मिलता था और यह क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।

आजादी के बाद भी नहीं बदला कंपनी का नाम

1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद अधिकांश ब्रिटिश कंपनियों ने भारत से अपना कारोबार समेटना शुरू कर दिया। Dyer Meakin के ब्रिटिश मालिक भी कंपनी को किसी भारतीय उद्योगपति को बेचना चाहते थे।

बताया जाता है कि सबसे पहले यह प्रस्ताव कंपनी में कार्यरत सुबोध चंद्र घोष को दिया गया था। हालांकि उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।

इसके बाद वर्ष 1949 में यह कंपनी प्रसिद्ध उद्योगपति नरेंद्र नाथ मोहन ने खरीद ली।

दिलचस्प बात यह है कि भारतीय स्वामित्व में आने के बावजूद कंपनी का नाम Dyer Meakin Breweries Ltd. ही बना रहा। यानी आजादी के बाद भी लगभग 17 वर्षों तक कंपनी के नाम से “डायर” नहीं हटाया गया।

जब प्रधानमंत्री ने नाम बदलने का संदेश दिया

कंपनी के नाम में “डायर” बने रहने को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे।

लोकप्रिय कथाओं और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, स्थिति तब बदली जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने कंपनी के परिसर में जाने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वह “डायर” नाम वाली कंपनी के गेट से प्रवेश नहीं करेंगे।

इसके बाद कंपनी प्रबंधन पर नाम बदलने का दबाव बढ़ा और अंततः “डायर” शब्द हटा दिया गया।

बाद के वर्षों में कंपनी का नाम बदलकर Mohan Meakin Limited कर दिया गया, जो आज भी इसी नाम से जानी जाती है।

ओल्ड मॉन्क कैसे बना पहचान?

नाम बदलने के बाद कंपनी ने अपने सबसे लोकप्रिय उत्पाद Old Monk Rum पर ध्यान केंद्रित किया।

वर्ष 1954 में लॉन्च हुई ओल्ड मॉन्क धीरे-धीरे भारत की सबसे लोकप्रिय डार्क रम बन गई। इसकी खासियत इसका अनोखा स्वाद, वर्षों पुरानी रेसिपी और बेहद पहचान योग्य बोतल रही, जो दशकों से लगभग बिना बदलाव के बाजार में मौजूद है।

एक समय ऐसा था जब भारतीय रम बाजार में ओल्ड मॉन्क का लगभग एकाधिकार माना जाता था। आज भी यह ब्रांड लाखों लोगों के बीच लोकप्रिय है।

इतिहास और विरासत का अनोखा संगम

ओल्ड मॉन्क की कहानी केवल एक सफल ब्रांड की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के औपनिवेशिक इतिहास, औद्योगिक विकास और स्वतंत्रता के बाद बदलते राष्ट्रीय स्वाभिमान की भी कहानी है।

जिस कंपनी की शुरुआत एक ब्रिटिश परिवार ने की, जिसका संबंध भारत के सबसे विवादित ऐतिहासिक व्यक्तियों में से एक से था, वही कंपनी बाद में भारतीय स्वामित्व में आई और एक प्रतिष्ठित भारतीय ब्रांड बन गई।

आज अधिकांश लोग ओल्ड मॉन्क को उसकी गुणवत्ता और विरासत के लिए जानते हैं, लेकिन उसके पीछे छिपा यह ऐतिहासिक अध्याय कम ही लोगों को मालूम है। यह कहानी याद दिलाती है कि कई प्रसिद्ध ब्रांड केवल व्यापारिक सफलता की कहानी नहीं होते, बल्कि वे इतिहास, राजनीति और समाज के बदलते दौर के भी साक्षी होते हैं।

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