मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द: कांग्रेस पहुंची सुप्रीम कोर्ट, राज्यसभा चुनाव में नया मोड़

मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द: कांग्रेस पहुंची सुप्रीम कोर्ट, राज्यसभा चुनाव में नया मोड़

 

मध्य प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के मामले में सुप्रीम कोर्ट पहुंची कांग्रेस। रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले को दी चुनौती।

मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पत्र का रद्द होना राज्य की राजनीति में एक बड़ा विवाद बन गया है। यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय की चौखट पर है, जहाँ नटराजन ने रिटर्निंग ऑफिसर (RO) के निर्णय को चुनौती दी है। नटराजन ने अपनी याचिका में रिटर्निंग अधिकारी के इस फैसले को न केवल ‘गलत’ और ‘कानून के विरुद्ध’ बताया है, बल्कि इसे ‘पक्षपातपूर्ण’ करार देते हुए तत्काल निरस्त करने की मांग की है। 18 जून को प्रस्तावित राज्यसभा मतदान से ठीक पहले इस कानूनी कदम ने चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

विवाद की जड़: नामांकन रद्द करने का आधार

संपूर्ण विवाद की शुरुआत 9 जून को हुई, जब मध्य प्रदेश विधानसभा के प्रधान सचिव और राज्यसभा चुनाव के लिए रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा ने मीनाक्षी नटराजन के नामांकन को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने आरोप लगाया कि नटराजन ने अपने नामांकन के साथ दायर हलफनामे में तेलंगाना में लंबित एक कानूनी मामले की जानकारी छिपाई है।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने इसे एक सोची-समझी ‘राजनीतिक साजिश’ करार दिया है। नटराजन का तर्क है कि जिस मामले का जिक्र किया जा रहा है, वह किसी भी तरह का गंभीर आपराधिक मुकदमा नहीं है, बल्कि वह महज एक निजी शिकायत से जुड़ा हुआ है, जिसे कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। उन्होंने दावा किया कि उनके खिलाफ कोई भी ऐसा मामला नहीं है जिसकी जानकारी साझा करना उनके लिए अनिवार्य था।

कांग्रेस का स्टैंड और चुनाव आयोग की भूमिका

मामले की गंभीरता को देखते हुए, कांग्रेस पार्टी ने सक्रियता दिखाते हुए दिल्ली में निर्वाचन आयोग (ECI) का रुख किया। बुधवार को कांग्रेस के एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों से मुलाकात की। कांग्रेस का स्पष्ट कहना है कि जिस ‘निजी शिकायत’ को आधार बनाकर नामांकन रद्द किया गया है, उस पर अभी तक किसी भी अदालत ने संज्ञान (Cognizance) नहीं लिया है। पार्टी का मानना है कि जब तक न्यायालय किसी आपराधिक मामले में संज्ञान नहीं लेता, तब तक उसे उम्मीदवार की अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता।

प्रसिद्ध वकील और कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने इस कानूनी पेचीदगी को ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ (Representation of the People Act) के परिप्रेक्ष्य में समझाया है। उन्होंने अधिनियम की धारा 33A का हवाला देते हुए तर्क दिया कि उम्मीदवारों को केवल उन आपराधिक मामलों की जानकारी देने के लिए बाध्य किया गया है जिनमें दो साल से अधिक की सजा का प्रावधान है। सिंघवी के अनुसार, नटराजन के मामले में यह शर्त लागू ही नहीं होती, क्योंकि वह मामला कानूनी तौर पर उस श्रेणी में आता ही नहीं है जिसे घोषित करना अनिवार्य हो। उनका आरोप है कि रिटर्निंग ऑफिसर ने प्रक्रिया का सही पालन नहीं किया।

लोकतंत्र और न्यायिक हस्तक्षेप

राज्यसभा चुनाव की वोटिंग की तारीख (18 जून) नजदीक होने के कारण यह मामला और भी पेचीदा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका ने अब इस लड़ाई को एक संवैधानिक मोड़ दे दिया है। यह मामला न केवल एक उम्मीदवार के भाग्य का फैसला करेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि चुनावी प्रक्रिया में रिटर्निंग ऑफिसर की शक्तियों की सीमाएं क्या हैं और क्या किसी अस्पष्ट निजी शिकायत के आधार पर किसी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है।

कांग्रेस ने चुनाव आयोग से रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग की है। दूसरी ओर, बीजेपी इसे चुनाव आयोग की प्रक्रिया का सही पालन बताकर बचाव कर रही है। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी हैं। क्या अदालत रिटर्निंग अधिकारी के फैसले पर रोक लगाएगी, या फिर कांग्रेस को अपने उम्मीदवार के बिना ही चुनावी मैदान में उतरना पड़ेगा? यह घटनाक्रम भारत के चुनावी इतिहास में ‘उम्मीदवारों की पारदर्शिता’ और ‘कानूनी घोषणाओं’ के दायरे को लेकर एक नई बहस का आधार बन गया है।

आने वाले कुछ दिन न केवल मीनाक्षी नटराजन के राजनीतिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे देश में निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया की मजबूती के लिए भी एक बड़ी परीक्षा साबित होंगे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी उम्मीदवार को नामांकन से वंचित करना एक बड़ा कदम है, और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यह सुनिश्चित करेगा कि यह निर्णय न्यायसंगत है या नहीं।

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