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भारत में पायलटों की कमी दूर करने के लिए 11 नए Flying Training Organizations (FTO) शुरू किए जाएंगे। AAI ने टेंडर प्रक्रिया पूरी की। जानिए एविएशन सेक्टर के इस बड़े फैसले के बारे में पूरी जानकारी।
भारत में नागरिक उड्डयन (Civil Aviation) का क्षेत्र अभूतपूर्व गति से विस्तार कर रहा है। नए हवाई अड्डों के निर्माण, हवाई यात्रियों की बढ़ती संख्या और एयरलाइन कंपनियों द्वारा दिए गए सैकड़ों नए विमानों के ऑर्डर से यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में भारतीय एविएशन सेक्टर एक नए क्षितिज को छूने वाला है। हालाँकि, इस तेज विस्तार के साथ सबसे बड़ी चुनौती सामने आई है—कुशल पायलटों की भारी कमी। इस स्थिति से निपटने और घरेलू स्तर पर प्रशिक्षण क्षमताओं को मजबूत करने के लिए भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) और नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने एक ऐतिहासिक पहल की है, जिसके तहत देश में 11 नए फ्लाइंग ट्रेनिंग ऑर्गनाइजेशन (FTO) खोलने की प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी कर ली गई है।
पायलटों की बढ़ती मांग और एयरलाइंस का विस्तार
सिविल एविएशन मिनिस्ट्री के अनुमान के अनुसार, भारतीय नागरिक उड्डयन उद्योग को अगले 10 वर्षों में लगभग 30,000 से 31,000 अतिरिक्त कमर्शियल पायलटों की आवश्यकता होगी। वर्तमान में देश की अग्रणी एयरलाइंस अपने बेड़े (Fleet) को बढ़ाने में लगी हुई हैं। अकेले अगले 5 वर्षों में भारतीय एयरलाइंस के बेड़े में लगभग 500 नए अत्याधुनिक विमान जुड़ने की संभावना है।
उदाहरण के लिए, टाटा समूह के स्वामित्व वाली ‘एयर इंडिया’ अगले 18 महीनों के भीतर ही अपने फ्लीट में 50 से 60 नए हवाई जहाज शामिल करने की आक्रामक रणनीति पर काम कर रही है। इसके साथ ही, केंद्र सरकार की ‘उडान’ योजना के तहत देश भर में लगभग 50 नए एयरपोर्ट विकसित किए जाने का लक्ष्य है। इस तेजी से बढ़ते ढांचे को सुचारू रूप से चलाने के लिए बड़ी संख्या में योग्य और लाइसेंस प्राप्त पायलटों की आवश्यकता होगी।
11 नए FTO स्लॉट और इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार
पायलटों की इस भारी मांग को पूरा करने के लिए AAI ने ई-टेंडरिंग प्रक्रिया के जरिए 7 प्रमुख एयरपोर्ट्स पर 11 नए FTO स्लॉट की आवंटन प्रक्रिया पूरी कर ली है। वर्तमान में (अप्रैल 2026 तक), देश में DGCA (नागरिक उड्डयन महानिदेशालय) से मान्यता प्राप्त 41 FTO अपने 63 फ्लाइंग बेस के माध्यम से काम कर रहे हैं। इन 11 नए सेंटर्स के जुड़ने से देश में घरेलू स्तर पर पायलट तैयार करने की क्षमता में काफी इजाफा होगा।
- विमानों की संख्या: शुरुआती चरण में इन नए FTOs में 60 से 70 ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट शामिल होंगे, जिनकी संख्या पूर्ण परिचालन क्षमता हासिल करने पर 110 से 120 विमानों तक पहुंच जाएगी।
- वार्षिक प्रशिक्षण क्षमता: शुरुआती समय में इन संस्थानों से हर साल 400 से 500 एविएशन प्रोफेशनल्स पास आउट होंगे। वहीं, पूरी क्षमता से काम शुरू करने के बाद यह संख्या बढ़कर सालाना 1,500 पायलटों तक पहुंच जाएगी।
विदेश जाने की बाध्यता होगी खत्म, CPL जारी होने में ऐतिहासिक वृद्धि
अब तक बड़ी संख्या में भारतीय छात्रों को कमर्शियल पायलट लाइसेंस (CPL) की ट्रेनिंग के लिए अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड जैसे विदेशी देशों का रुख करना पड़ता था, जो काफी खर्चीला साबित होता था। देश में ही विश्वस्तरीय फ्लाइंग स्कूल खुलने से न केवल भारतीय कैडेट्स का खर्च कम होगा, बल्कि देश की पूंजी भी बाहर जाने से बचेगी।
आंकड़ों की बात करें तो भारत में CPL जारी होने की रफ्तार में पहले ही सकारात्मक सुधार देखा गया है। वर्ष 2018 में जहाँ केवल 640 CPL जारी किए गए थे, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 1,628 हो गई। हाल के वर्षों में DGCA ने विदेशी संस्थानों से पढ़ाई पूरी करने वाले कैडेट्स को 615 CPL और 2,309 स्टूडेंट पायलट लाइसेंस (SPL) जारी किए हैं, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि युवाओं में एविएशन करियर को लेकर रुचि और रुझान तेजी से बढ़ रहा है।
रीजनल एयरपोर्ट्स का बेहतर इस्तेमाल और किफायती शिक्षा
इन 11 नए फ्लाइंग स्कुलों को मुख्य रूप से रीजनल (क्षेत्रीय) एयरपोर्ट्स पर स्थापित किया जा रहा है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि इन एयरपोर्ट्स के इंफ्रास्ट्रक्चर का बेहतर और पूर्ण इस्तेमाल संभव हो सकेगा, जहाँ व्यावसायिक उड़ानों की फ्रिक्वेंसी कम होती है।
इसके अलावा, क्षेत्रीय स्तर पर फ्लाइंग बेस बनने से देश के छोटे शहरों से आने वाले प्रतिभावान युवाओं के लिए पायलट ट्रेनिंग की पहुंच आसान होगी। कमर्शियल पायलट बनने का सपना देख रहे छात्रों को स्थानीय स्तर पर ही किफायती और सुलभ प्रशिक्षण का विकल्प मिलेगा। सरकार का यह रणनीतिक कदम ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एविएशन सेक्टर को एक मजबूत और कुशल मानव संसाधन (Skilled Workforce) प्रदान करने में मील का पत्थर साबित होगा।