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दिल्ली में यमुना खादर से हटाए जा रहे लोगों का फूटा गुस्सा। निवासियों ने पूछा- नाले साफ किए बिना घर तोड़ने से यमुना कैसे साफ होगी? आप (AAP) ने भाजपा पर साधा निशाना।
नई दिल्ली: दिल्ली में यमुना के कायाकल्प के नाम पर चलाए जा रहे तोड़फोड़ अभियान ने एक बार फिर मानवीय संवेदनाओं और प्रशासनिक नीतियों के बीच की खाई को गहरा कर दिया है। यमुना खादर और बेला रोड जैसे इलाकों में दशकों से रह रहे हजारों परिवारों पर बेघर होने का खतरा मंडरा रहा है। प्रशासन की इस कार्रवाई के विरोध में स्थानीय निवासियों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। लोगों का कहना है कि वे यहाँ अंग्रेजों के समय से रह रहे हैं, लेकिन सरकार उन्हें “अतिक्रमणकारी” बताकर हटा रही है।
“घर तोड़ने से यमुना साफ नहीं होगी”: निवासियों का सीधा सवाल
हमारे घर तोड़ने से यमुना जी साफ नहीं होंगी, पहले दिल्ली के जो इतने सारे नाले यमुना में गंदगी कर रहे हैं उनका इलाज करो।
हम लोग सैकड़ों सालों से यहां रह रहे हैं। अंग्रेजों के समय से भी पहले से। ऐसे कैसे हम अपना घर छोड़ देंगे। pic.twitter.com/PG8OdCY2Ev
— Aam Aadmi Party Delhi (@AAPDelhi) May 8, 2026
यमुना किनारे बसे लोगों का तर्क बेहद सीधा और तार्किक है। प्रदर्शन कर रहे एक बुजुर्ग निवासी ने कहा, “हमारे छोटे-छोटे घरों को तोड़ने से यमुना जी साफ नहीं होंगी। यमुना को तो वो गंदे नाले मार रहे हैं जो पूरी दिल्ली की गंदगी लेकर सीधे नदी में गिर रहे हैं।” स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकार असल समस्या यानी ‘सीवेज ट्रीटमेंट’ पर ध्यान देने के बजाय गरीबों के आशियाने उजाड़ने को ही समाधान मान बैठी है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि यमुना में प्रदूषण का मुख्य कारण अनट्रीटेड सीवेज (बिना साफ किया हुआ मलजल) और औद्योगिक कचरा है। निवासियों का सवाल है कि जब तक नजफगढ़ और सप्लीमेंट्री ड्रेन जैसे बड़े नाले यमुना में जहर उगलना बंद नहीं करेंगे, तब तक गरीबों के झोपड़े हटाने से पानी में क्या सुधार आएगा?
सैकड़ों सालों का इतिहास और बेदखली का डर
यहाँ रह रहे परिवारों का दावा है कि उनका इतिहास इस शहर की नींव जितना पुराना है। कई परिवारों के पास ऐसे दस्तावेज़ हैं जो यह साबित करते हैं कि उनकी पीढ़ियाँ यहाँ अंग्रेजों के दौर से, या उससे भी पहले से खेती और गुजर-बसर कर रही हैं। लोग भावुक होकर पूछते हैं, “हम कोई आज यहाँ आकर नहीं बसे हैं। हमारी पीढ़ियाँ इसी मिट्टी में खप गईं। अब अचानक हमें बेगाना बताकर घर छोड़ने को कहा जा रहा है। हम अपना घर कैसे छोड़ दें?”
प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, यमुना के बाढ़ क्षेत्र (Floodplains) को पुनर्जीवित करने के लिए इन बस्तियों को हटाना जरूरी है, लेकिन स्थानीय लोग इसे अपनी पहचान और अस्तित्व पर हमला मान रहे हैं।
आम आदमी पार्टी (AAP) ने उठाए लोगों के सवाल: भाजपा और एलजी को घेरा
इस मुद्दे पर दिल्ली की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) पूरी तरह से जनता के साथ खड़ी नजर आ रही है। आप विधायकों और नेताओं ने उपराज्यपाल (LG) और केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाली एजेंसियों (DDA) पर हमला बोला है।
आम आदमी पार्टी के नेताओं ने सवाल उठाया है कि:
- बिना वैकल्पिक आवास (Rehabilitation) के लोगों को बेघर क्यों किया जा रहा है?
- दिल्ली के उन नालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही जो प्रदूषण का मुख्य स्रोत हैं?
- क्या यमुना की सफाई का मतलब केवल गरीबों की झोपड़ियाँ हटाना है, या बड़े उद्योगों पर भी लगाम कसी जाएगी?
पार्टी का कहना है कि अरविंद केजरीवाल की सरकार ने हमेशा ‘जहाँ झुग्गी, वहीं मकान’ का वादा किया है, लेकिन केंद्र की एजेंसियां अमानवीय तरीके से लोगों को हटा रही हैं।
राजनीतिक घमासान और कानूनी पेच
यह मुद्दा अब केवल प्रदूषण का नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक युद्ध का रूप ले चुका है। एक तरफ डीडीए (DDA) नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के आदेशों का हवाला देकर जमीन खाली करा रहा है, तो दूसरी तरफ मानवीय आधार पर इसे रोकने की मांग की जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यमुना किनारे बसने वाली यह आबादी एक बड़ा ‘वोट बैंक’ भी है, जिसके कारण आप और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है।
समाधान या सिर्फ दिखावा?
यमुना की सफाई दिल्ली के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है, लेकिन क्या इसका मूल्य गरीबों की बेदखली होना चाहिए? जनता का यह सवाल कि “पहले नाले ठीक करो”, प्रशासन की प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाता है। जब तक दिल्ली के 20 से अधिक बड़े नालों का पानी साफ नहीं होता, तब तक यमुना किनारे की हरियाली और सौंदर्यकरण केवल एक सतही कोशिश ही नजर आएगी।