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तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा उलटफेर! कांग्रेस ने डीएमके के साथ अपना दशकों पुराना गठबंधन खत्म कर अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके को समर्थन दिया। डीएमके ने कांग्रेस पर ‘धोखाधड़ी’ का आरोप लगाया।
तमिलनाडु की राजनीति में महासंकट: डीएमके-कांग्रेस के दशकों पुराने गठबंधन का अंत
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के परिणामों ने न केवल विजय की पार्टी टीवीके (TVK) को सत्ता की दहलीज पर खड़ा कर दिया है, बल्कि राज्य की राजनीति में एक बड़े वैचारिक और रणनीतिक बदलाव का संकेत भी दिया है। दशकों से एक-दूसरे के पूरक रहे डीएमके (DMK) और कांग्रेस का गठबंधन अब इतिहास बन चुका है। कांग्रेस द्वारा विजय की पार्टी को समर्थन देने के फैसले ने द्रमुक को गहरे सदमे में डाल दिया है, जिससे विपक्ष के राष्ट्रीय गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA) ब्लॉक के भविष्य पर भी सवालिया निशान लग गए हैं।
कांग्रेस का ‘विजय’ कार्ड और डीएमके की नाराजगी
234 सीटों वाली विधानसभा में 108 सीटें जीतकर टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनी। बहुमत के लिए जरूरी 118 के आंकड़े तक पहुँचने के लिए कांग्रेस ने अपने 5 विधायकों का समर्थन विजय को दे दिया। कांग्रेस के इस कदम ने डीएमके को सत्ता से बाहर रखने में निर्णायक भूमिका निभाई। इस फैसले से आगबबूला होकर एम.के. स्टालिन की पार्टी ने कांग्रेस को “पीठ में छुरा घोंपने वाला” करार दिया है। यह कड़वाहट इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि स्टालिन ने राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी का पुरजोर समर्थन किया था।
गठबंधन का अस्थिर इतिहास (1967-1980)
डीएमके और कांग्रेस के बीच संबंधों का इतिहास हमेशा से उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 1967 में डीएमके ने हिंदी थोपने के विरोध के मुद्दे पर कांग्रेस को हराकर ही सत्ता हासिल की थी। 1971 में इंदिरा गांधी के साथ गठबंधन हुआ, लेकिन आपातकाल के बाद 1977 में स्थितियाँ बदल गईं और इंदिरा ने एआईएडीएमके (AIADMK) का हाथ थाम लिया। 1980 में एक बार फिर डीएमके और कांग्रेस करीब आए, लेकिन यह दोस्ती भी स्थाई नहीं रही।
भाजपा का उदय और बदलती समीकरण
जयललिता के दौर में जब एआईएडीएमके ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा के साथ गठबंधन किया, तब कांग्रेस और डीएमके के रास्ते फिर एक हुए। 2004 में यूपीए के गठन से लेकर 2014 तक यह रिश्ता काफी मजबूत रहा। हालांकि, श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे पर बीच में दरार आई, लेकिन 2021 में एम.के. स्टालिन के मुख्यमंत्री बनने के बाद दोनों दल फिर से करीब आए और मोदी सरकार के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा बनाया।
इंडिया ब्लॉक पर संकट के बादल
कांग्रेस का तर्क है कि उसने तमिलनाडु में भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने और एआईएडीएमके-भाजपा गठबंधन की संभावनाओं को खत्म करने के लिए विजय (TVK) का साथ दिया। लेकिन इस फैसले ने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को कमजोर कर दिया है।
ममता बनर्जी और एम.के. स्टालिन की हार: पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में क्षेत्रीय क्षत्रपों की हार से कांग्रेस का प्रभाव कम हुआ है।
- भाजपा का दबदबा: भाजपा अब 18 राज्यों में सत्ता में है और पश्चिम बंगाल में उसकी बड़ी जीत ने कांग्रेस के लिए चुनौती बढ़ा दी है।
- संसदीय समर्थन की कमी: डीएमके की नाराजगी के कारण अब संसद में कांग्रेस को भाजपा की नीतियों का विरोध करने के लिए क्षेत्रीय दलों का वह मजबूत समर्थन मिलना मुश्किल होगा जो पहले मिलता था।
एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत
कांग्रेस द्वारा गठबंधन तोड़ने के फैसले ने तमिलनाडु की राजनीति को उस दुष्चक्र में वापस धकेल दिया है, जहाँ क्षेत्रीय दल अब राष्ट्रीय दलों पर भरोसा करने से हिचकेंगे। डीएमके के संभावित दल-बदल और विपक्ष की आपसी कलह का सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। तमिलनाडु में विजय का उदय और कांग्रेस का यह जुआ दक्षिण भारत की राजनीति की दिशा और दशा को पूरी तरह बदल सकता है।