Table of Contents
दिल्ली के उपराज्यपाल टीएस संधू ने विकसित दिल्ली@2047 के लक्ष्य के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर जोर दिया। उन्होंने परियोजनाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर योजना को जरूरी बताया।
दिल्ली के उपराज्यपाल सरदार टीएस संधू ने मंगलवार को कहा कि पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) यानी सार्वजनिक-निजी भागीदारी को केवल वित्त जुटाने के वैकल्पिक साधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक ऐसा ढांचा है, जिसके माध्यम से सरकार के सार्वजनिक उद्देश्यों और निजी क्षेत्र की क्षमताओं को एक साथ लाया जा सकता है। इसमें जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। उपराज्यपाल द्वारका स्थित गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय (जीजीएसआईपीयू) में आयोजित क्षमता निर्माण कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम का विषय ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप का लाभ उठाना: नीतियां, मानक, साझेदारी ढांचा और परिणाम’ था। इस दौरान उन्होंने अधिकारियों को समझाया कि प्रत्येक सार्वजनिक सेवा के लिए पीपीपी मॉडल उपयुक्त नहीं होता। किसी परियोजना में निजी क्षेत्र की भागीदारी का फैसला उसकी प्रकृति, उपलब्ध संसाधनों और नागरिकों को मिलने वाले अपेक्षित परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकारी अधिकारियों को यह आकलन करना चाहिए कि संबंधित परियोजना के लिए पीपीपी मॉडल कितना उपयोगी होगा, सरकारी विभाग की क्षमता क्या है, निजी क्षेत्र किस तरह योगदान दे सकता है और परियोजना से जुड़े जोखिमों को किस प्रकार बांटा जाना चाहिए। संधू ने स्पष्ट किया कि किसी भी साझेदारी का अंतिम उद्देश्य आम जनता को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना होना चाहिए।
विकसित दिल्ली@2047 के लक्ष्य को हासिल करने पर जोर
उपराज्यपाल टीएस संधू ने दिल्ली की विकास प्राथमिकताओं और विकसित दिल्ली@2047 के लक्ष्य को पूरा करने में सार्वजनिक-निजी भागीदारी की अहमियत पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शहरी परिवहन, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, जल प्रबंधन, कचरा प्रसंस्करण, नवीकरणीय ऊर्जा और डिजिटल प्रशासन जैसे क्षेत्रों में बेहतर योजना और प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है। इन क्षेत्रों की जरूरतें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, इसलिए इनका विकास अलग-अलग करके नहीं किया जा सकता। उन्होंने अधिकारियों से परियोजनाओं का मूल्यांकन उनके पूरे जीवनचक्र के आधार पर करने को कहा। इसका मतलब है कि किसी परियोजना की योजना बनाने से लेकर उसके निर्माण, संचालन और रखरखाव तक सभी पहलुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए। संधू ने कहा कि कोई परियोजना तकनीकी रूप से संभव हो सकती है, लेकिन आर्थिक रूप से टिकाऊ न होने के कारण आगे चलकर परेशानी पैदा कर सकती है। इसी तरह निजी निवेश आकर्षित करने के बावजूद यदि नागरिकों को सस्ती और सुलभ सेवाएं नहीं मिलतीं, तो परियोजना का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि समय पर निर्माण पूरा होना ही सफलता की गारंटी नहीं है। यदि रखरखाव और संचालन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई, तो परियोजना शुरू होने के बाद समस्याएं सामने आ सकती हैं। इसलिए ऐसी चुनौतियों की पहचान योजना के शुरुआती चरण में ही की जानी चाहिए।
सफल पीपीपी परियोजनाओं के लिए तीन प्रमुख सिद्धांत
टीएस संधू ने सफल सार्वजनिक-निजी भागीदारी के लिए बेहतर परियोजना तैयारी, समयबद्ध संस्थागत समन्वय और मापने योग्य जवाबदेही को महत्वपूर्ण बताया। परियोजना की तैयारी के संबंध में उन्होंने व्यवहार्यता अध्ययन, वित्तीय और कानूनी जांच, मांग का यथार्थवादी अनुमान, संबंधित पक्षों से परामर्श तथा स्पष्ट प्रदर्शन मानकों को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि परियोजना से जुड़े जोखिम उसी पक्ष को सौंपे जाने चाहिए, जो उन्हें सबसे प्रभावी ढंग से संभाल सकता हो। इसके अलावा, विभिन्न सरकारी विभागों, नियामक संस्थाओं और स्थानीय निकायों के बीच स्पष्ट जिम्मेदारियां निर्धारित की जानी चाहिए। निर्णय लेने और मंजूरी देने की प्रक्रिया समयबद्ध होनी चाहिए, ताकि परियोजनाओं में अनावश्यक देरी से बचा जा सके। जवाबदेही के मुद्दे पर उपराज्यपाल ने मापने योग्य प्रदर्शन संकेतकों, नियमित निगरानी, प्रोत्साहन, दंड और विवाद समाधान की प्रभावी व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि खरीद प्रक्रिया से लेकर परियोजना के प्रदर्शन के मूल्यांकन तक पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है। इससे निजी भागीदारों और सरकारी संस्थाओं के बीच विश्वास बढ़ेगा और सार्वजनिक धन का बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।
पीएम गति शक्ति के मॉडल से मिलेगी एकीकृत योजना को मजबूती
उपराज्यपाल ने केंद्र सरकार की बुनियादी ढांचा विकास संबंधी पहल पीएम गति शक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआत से ही एकीकृत योजना तैयार करने और विकास से लेकर उपयोग तक सभी चरणों को आपस में जोड़ने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि इसी तरह की व्यापक सोच दिल्ली की विकास परियोजनाओं में भी अपनाई जानी चाहिए। संधू ने क्षमता निर्माण कार्यक्रम का स्वागत करते हुए कहा कि इसमें दिल्ली सरकार, शैक्षणिक संस्थानों और उद्योग जगत को एक मंच पर लाया गया है। गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय को स्टेट इंस्टीट्यूशन ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन के अंतर्गत प्रमुख ज्ञान संस्थान की भूमिका दी गई है। उन्होंने सरकारी अधिकारियों के लिए तैयार की जा रही प्रस्तावित पीपीपी प्लेबुक को व्यावहारिक और परिणाम-केंद्रित बनाने पर जोर दिया। उनके अनुसार, इस मार्गदर्शिका में उपयुक्त परियोजनाओं की पहचान, उनकी व्यवहार्यता का आकलन, अनुबंध तैयार करने, जोखिम बांटने, मंजूरियों में समन्वय और प्रदर्शन की निगरानी से जुड़े स्पष्ट निर्देश होने चाहिए।
पुरानी परियोजनाओं की गलतियों से सीखने की जरूरत
टीएस संधू ने कहा कि केवल सफल परियोजनाओं का अध्ययन करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन परियोजनाओं की समीक्षा भी जरूरी है, जिनमें अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई साझेदारी कमजोर क्यों पड़ी और किन कमियों के कारण उसका प्रदर्शन प्रभावित हुआ। ऐसी समीक्षा से भविष्य की परियोजनाओं में गलतियों को दोहराने से बचा जा सकता है। उन्होंने दोहराया कि निजी क्षेत्र की भागीदारी दिल्ली के विकास को गति दे सकती है, बशर्ते परियोजनाओं की रूपरेखा जनता की जरूरतों, उचित जोखिम वितरण और पारदर्शी जवाबदेही को ध्यान में रखकर तैयार की जाए। उनके मुताबिक, पीपीपी मॉडल का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब सरकारी नीतियों, निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता और नागरिकों के हितों के बीच संतुलन स्थापित किया जाएगा। विकसित दिल्ली@2047 के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए परियोजनाओं की बेहतर योजना, विभागों के बीच समन्वय और सेवाओं की गुणवत्ता पर निरंतर निगरानी महत्वपूर्ण होगी।