दक्षिण चीन सागर विवाद पर भारत का बड़ा बयान: UNCLOS और 2016 के ऐतिहासिक फैसले का किया समर्थन

दक्षिण चीन सागर विवाद पर भारत का बड़ा बयान: UNCLOS और 2016 के ऐतिहासिक फैसले का किया समर्थन

 

दक्षिण चीन सागर विवाद पर भारत ने अपना रुख साफ किया है। विदेश मंत्रालय ने UNCLOS के तहत समुद्री स्वतंत्रता और 2016 के ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय फैसले को विवाद सुलझाने का आधार बताया।

हाल ही में दक्षिण चीन सागर (South China Sea) पर आए ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) के फैसले की 10वीं वर्षगांठ के अवसर पर भारत सहित दुनिया भर के प्रमुख देशों ने एक बार फिर इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन पर जोर दिया है। भारत ने मंगलवार को मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट किया, जबकि अमेरिका, जापान और यूरोपीय संघ (EU) जैसे वैश्विक मंचों ने चीन के दावों को सीधे तौर पर खारिज करते हुए 2016 के फैसले को लागू करने की मांग की है।

भारत का स्पष्ट और पुराना रुख

विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक साप्ताहिक प्रेस वार्ता के दौरान भारत के रुख को दोहराते हुए कहा कि दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर भारत की स्थिति बिल्कुल “स्पष्ट और सर्वविदित” है। भारत ने हमेशा इस बात पर बल दिया है कि वैश्विक व्यापार और सुरक्षा के लिए इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही (Freedom of Navigation) और उड़ानों की स्वतंत्रता (Overflight) अत्यंत आवश्यक है। भारत का मानना है कि समुद्र का कोई भी उपयोग अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में होना चाहिए, विशेष रूप से ‘समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय’ (UNCLOS) के तहत। भारत ने स्पष्ट किया कि निर्बाध व्यापार बनाए रखना सभी देशों के आर्थिक हितों के लिए जरूरी है।

2016 का ट्रिब्यूनल फैसला: एक ऐतिहासिक मील का पत्थर

भारत ने 12 जुलाई 2016 को ‘स्थायी मध्यस्थता न्यायालय’ (Permanent Court of Arbitration – PCA) द्वारा दिए गए फैसले को एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह फैसला संबंधित पक्षों के बीच विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है। भारत का दृढ़ मत है कि सभी समुद्री विवादों का निपटारा बातचीत के जरिए और UNCLOS के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए। दस साल पहले आया यह फैसला कानूनी रूप से इस क्षेत्र के विवादों को सुलझाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम माना जाता है।

14 देशों के गठबंधन का संयुक्त मोर्चा

इस 10वीं वर्षगांठ के मौके पर दुनिया के 14 प्रमुख देशों के एक शक्तिशाली गठबंधन ने एक संयुक्त बयान जारी कर चीन की विस्तारवादी नीतियों को बड़ी चुनौती दी है। इस गठबंधन में अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी, इटली, यूनाइटेड किंगडम (UK), न्यूजीलैंड, फिलीपींस, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, रोमानिया और स्लोवेनिया शामिल हैं। इन देशों ने मिलकर 2016 के अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के फैसले की पुष्टि की और कहा कि दक्षिण चीन सागर में बीजिंग के व्यापक दावों का “कोई कानूनी आधार नहीं है।” इन देशों ने एक स्वतंत्र, खुले, शांतिपूर्ण और नियम-आधारित भारत-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

‘नाइन-डैश लाइन’ का कानूनी अंत और यूरोपीय संघ का रुख

इस पूरे विवाद की जड़ चीन की स्वघोषित “नाइन-डैश लाइन” (Nine-Dash Line) है, जिसके माध्यम से वह दक्षिण चीन सागर के लगभग 80 प्रतिशत हिस्से पर अपना दावा ठोकता है। चीन का तर्क रहा है कि इस क्षेत्र के संसाधनों पर उसका “ऐतिहासिक अधिकार” है। हालांकि, 2016 में ट्रिब्यूनल ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया था कि UNCLOS के तहत चीन के इन दावों का कोई कानूनी वजूद नहीं है और इस संधि के लागू होने के साथ ही ऐसे सभी कथित ऐतिहासिक अधिकार समाप्त हो चुके हैं। इस मोर्चे पर यूरोपीय संघ (EU) ने भी कड़ा रुख अपनाया है। यूरोपीय संघ के उच्च प्रतिनिधि ने पूरे ब्लॉक की ओर से बयान जारी कर कहा कि 2016 का फैसला फिलीपींस और चीन दोनों पर अंतिम और कानूनी रूप से बाध्यकारी है, और दोनों पक्षों को इसका पूरी तरह से सम्मान और पालन करना चाहिए।

चीन का रुख और भविष्य की चुनौतियाँ

इन तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद चीन का रवैया अड़ियल बना हुआ है। चीन ने शुरू से ही इस न्यायाधिकरण के फैसले को मानने से इनकार किया है और वह इसे पूरी तरह खारिज करता आया है। फिलीपींस और उसके वैश्विक सहयोगियों द्वारा बार-बार कानून का पालन करने की अपीलों के बाद भी चीन ने अपनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया है। दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा सैन्य ठिकानों का निर्माण और कृत्रिम द्वीपों का विकास इस क्षेत्र में लगातार तनाव बढ़ा रहा है। ऐसे में, भारत और वैश्विक समुदाय द्वारा अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों (UNCLOS) की वकालत करना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है, ताकि भविष्य में इस रणनीतिक जलमार्ग में किसी भी बड़े संघर्ष को टाला जा सके और वैश्विक व्यापार सुरक्षित रहे।

Related posts

सत्य निकेतन हादसे के बाद एक्शन में दिल्ली LG, छात्रों के लिए सुरक्षित पीजी-हॉस्टल की जमीन तलाशेगा DDA

भारत और आसियान कृषि सहयोग को मिलेगी नई गति, खाद्य सुरक्षा और जलवायु अनुकूल खेती पर जोर

पीएम मोदी ने बताई 10,783 करोड़ की रेल परियोजनाओं की अहमियत, 5 राज्यों में बढ़ेगी कनेक्टिविटी

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Read More