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बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि पत्नी द्वारा खाना बनाने या सफाई करने से इनकार करना क्रूरता नहीं है। कोर्ट ने शादी को ‘बराबरी की साझेदारी’ बताया।
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हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने वैवाहिक अधिकारों, लैंगिक समानता और घरेलू दायित्वों के संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रगतिशील निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि वैवाहिक जीवन में केवल घरेलू कार्यों को करने में विफलता को ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि, “शादी बराबरी की साझेदारी है, न कि कोई सर्विस कॉन्ट्रैक्ट।” यह फैसला उन रूढ़िवादी धारणाओं पर प्रहार करता है, जो अक्सर वैवाहिक विवादों में महिलाओं पर घरेलू कार्यों को करने का दबाव बनाती हैं।
मामले की पृष्ठभूमि: संघर्ष और कानूनी लड़ाई
यह कानूनी विवाद एक ऐसे जोड़े से संबंधित है जिनकी शादी 28 फरवरी 2002 को हुई थी। हालांकि, विवाह के कुछ ही हफ्तों के भीतर दोनों के बीच वैचारिक मतभेद उभरने लगे। हालांकि जून 2002 में एक बार मध्यस्थता के माध्यम से सुलह हुई, लेकिन यह शांति अल्पकालिक रही। 7 जुलाई 2002 को पत्नी ने अपने ससुराल को छोड़ दिया और अपने माता-पिता के घर रहने चली गई। मामला तब और गंभीर हो गया जब पति ने 2004 में मुंबई की एक फैमिली कोर्ट में ‘क्रूरता’ के आधार पर तलाक की याचिका दायर की। वर्ष 2010 में फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए तलाक की मंजूरी दी और पत्नी की भरण-पोषण भत्ता (Maintenance) की याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद पत्नी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पति के आरोप और अदालती रुख
सुनवाई के दौरान, चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) पति ने अपनी पत्नी पर गंभीर आरोप लगाए थे। उसका दावा था कि पत्नी का व्यवहार बेहद रूखा है, वह घर के काम जैसे खाना बनाना और सफाई नहीं करती, और उसके माता-पिता का सम्मान नहीं करती। पति का यह भी तर्क था कि पत्नी द्वारा इन घरेलू कार्यों से इनकार करना ‘मानसिक क्रूरता’ के समान है। हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि खाना पकाने या साफ-सफाई जैसे कार्यों में दक्षता न होना या उन्हें न कर पाना विवाह विच्छेद का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने पत्नियों को ‘नौकरानी’ समझे जाने की पुरुषवादी मानसिकता की कड़ी आलोचना की।
पत्नी का पक्ष: दहेज प्रताड़ना के आरोप
दूसरी ओर, पत्नी ने पति के आरोपों को पूरी तरह नकार दिया। उसने दावा किया कि वास्तव में वह स्वयं ससुराल में प्रताड़ना का शिकार थी। उसने पति और ससुराल वालों पर दहेज की निरंतर मांग, अपमानित करने और शारीरिक रूप से परेशान करने का आरोप लगाया। पत्नी ने तर्क दिया कि इन्हीं परिस्थितियों के कारण उसे अपना घर छोड़ने और कानूनी शिकायतें दर्ज कराने के लिए मजबूर होना पड़ा। अदालती कार्यवाही के दौरान, उसने अपना पक्ष मजबूती से रखा कि एक महिला को मात्र घरेलू सहायक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
भरण-पोषण भत्ता: जीवन की गरिमा और महंगाई का तर्क
इस केस का एक अहम पहलू गुजारा भत्ता (Maintenance) को लेकर भी रहा। पति ने भरण-पोषण भत्ता देने का विरोध करते हुए तर्क दिया कि उसकी पत्नी आर्थिक रूप से स्वतंत्र है और वह पेंटिंग, ड्राइंग और आर्ट क्लासेस चलाकर कमाई करती है। हाई कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पति स्वयं एक योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट है, इसलिए उसकी वित्तीय क्षमता को केवल आयकर रिटर्न तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने महंगाई के बढ़ते स्तर और गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार का उल्लेख करते हुए निर्देश दिया कि पति को अपनी पत्नी को प्रति माह ₹20,000 भरण-पोषण भत्ता देना होगा। कोर्ट ने यह भी माना कि जो राशि एक दशक पहले पर्याप्त लग रही थी, वह आज की आर्थिक स्थितियों में गुजारे के लिए कम हो सकती है।
वैवाहिक समानता का संदेश
बॉम्बे हाई कोर्ट का यह निर्णय भारतीय समाज के लिए एक स्पष्ट संदेश है। यह फैसला इस पुरानी सोच को चुनौती देता है कि विवाह में महिला का प्राथमिक और एकमात्र कर्तव्य घरेलू सेवा है। कोर्ट ने समानता के उस अधिकार को स्थापित किया है, जहाँ पति और पत्नी दोनों को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। यह फैसला न केवल उस पत्नी को न्याय दिलाता है, बल्कि भविष्य में वैवाहिक विवादों की सुनवाई के दौरान एक नजीर (Precedent) के रूप में काम करेगा। यह स्पष्ट करता है कि कानून की नजर में शादी का आधार आपसी सम्मान और बराबरी है, न कि घरेलू कार्यों का निष्पादन।