Artificial Sweeteners: ज्यादा सेवन से तेज हो सकती है याददाश्त में गिरावट? स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा

Artificial Sweeteners: ज्यादा सेवन से तेज हो सकती है याददाश्त में गिरावट? स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा

 

Artificial Sweeteners Study: नई स्टडी में ज्यादा स्वीटनर्स के सेवन और तेज cognitive decline के बीच संबंध सामने आया है। जानें क्या कहती है रिसर्च।

Artificial Sweeteners यानी कृत्रिम मिठास को लंबे समय से चीनी के मुकाबले कम कैलोरी वाला विकल्प माना जाता रहा है। डाइट ड्रिंक्स, शुगर-फ्री प्रोडक्ट्स, प्रोटीन बार और कई अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में इनका इस्तेमाल आम हो गया है। लेकिन Neurology जर्नल में प्रकाशित एक नई स्टडी ने इनके लंबे समय तक सेवन को लेकर नई चिंता पैदा की है। शोध में पाया गया कि अधिक मात्रा में कुछ कृत्रिम और कम कैलोरी वाले स्वीटनर्स का सेवन करने वाले मध्यम आयु वर्ग के लोगों में सोचने और याददाश्त से जुड़ी क्षमताओं में अपेक्षाकृत तेज गिरावट देखी गई। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह नहीं कहा है कि स्वीटनर्स सीधे तौर पर cognitive decline यानी संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट का कारण बनते हैं। अध्ययन मुख्य रूप से इनके सेवन और मानसिक क्षमता में गिरावट के बीच संबंध को दर्शाता है।

12 हजार से ज्यादा लोगों पर हुई स्टडी

रिपोर्ट के अनुसार, इस अध्ययन में 12,772 वयस्कों को शामिल किया गया था, जिनकी औसत उम्र करीब 52 वर्ष थी। शोधकर्ताओं ने लगभग आठ वर्षों तक प्रतिभागियों के स्वास्थ्य और cognitive performance पर नजर रखी। अध्ययन में लोगों के खान-पान से जुड़ी जानकारी food frequency questionnaires के माध्यम से जुटाई गई। इसके आधार पर शोधकर्ताओं ने सात अलग-अलग स्वीटनर्स के सेवन का अनुमान लगाया।

इनमें aspartame, saccharin, acesulfame K, erythritol, xylitol, sorbitol और tagatose शामिल थे। प्रतिभागियों की याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता से जुड़े टेस्ट अध्ययन की शुरुआत, बीच की अवधि और अंत में किए गए। इसके बाद अलग-अलग स्तर पर स्वीटनर्स का सेवन करने वाले समूहों के cognitive performance में बदलाव की तुलना की गई।

ज्यादा सेवन करने वालों में 62% तेज गिरावट

अध्ययन के सबसे चर्चित निष्कर्षों में सामने आया कि 60 वर्ष से कम उम्र के उन प्रतिभागियों में cognitive decline की दर 62% ज्यादा थी, जिन्होंने सबसे अधिक मात्रा में स्वीटनर्स का सेवन किया था, जबकि इसकी तुलना सबसे कम सेवन करने वाले समूह से की गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह अंतर लगभग डेढ़ साल अतिरिक्त brain aging के बराबर हो सकता है।

वहीं, केवल सबसे ज्यादा सेवन करने वाले लोग ही चिंता का विषय नहीं रहे। अध्ययन में moderate consumers यानी मध्यम मात्रा में स्वीटनर्स का सेवन करने वाले लोगों में भी cognitive decline की दर सबसे कम सेवन करने वालों की तुलना में करीब 35% अधिक देखी गई। हालांकि, इन आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह एक observational association है और इससे यह साबित नहीं होता कि स्वीटनर्स ही मानसिक क्षमता में गिरावट का प्रत्यक्ष कारण हैं।

डायबिटीज वाले लोगों में संबंध ज्यादा मजबूत

शोधकर्ताओं ने पाया कि स्वीटनर्स के सेवन और cognitive decline के बीच संबंध डायबिटीज वाले प्रतिभागियों में अधिक मजबूत दिखाई दिया। यह निष्कर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि डायबिटीज से पीड़ित लोग अक्सर चीनी की जगह कम कैलोरी वाले स्वीटनर्स का इस्तेमाल कर सकते हैं।

अध्ययन की प्रमुख लेखिका और यूनिवर्सिटी ऑफ साओ पाउलो की शोधकर्ता डॉ. Claudia Kimie Suemoto के अनुसार, कम या बिना कैलोरी वाले स्वीटनर्स को आम तौर पर चीनी का बेहतर विकल्प माना जाता है, लेकिन अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि कुछ स्वीटनर्स का लंबे समय तक सेवन brain health पर नकारात्मक प्रभावों से जुड़ा हो सकता है। हालांकि, इस संबंध को समझने के लिए आगे और शोध की आवश्यकता है।

60 साल से ज्यादा उम्र वालों में नहीं दिखा स्पष्ट संबंध

अध्ययन का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि 60 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्कों में स्वीटनर्स के सेवन और cognitive decline के बीच कोई महत्वपूर्ण संबंध नहीं पाया गया। इस नतीजे को लेकर विशेषज्ञों ने सावधानी बरतने की सलाह दी है।

Harvard Medical School के न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. Andrew Budson ने इस परिणाम को दिलचस्प बताया, लेकिन इसे यह मानने का आधार नहीं माना कि 60 साल के बाद स्वीटनर्स पूरी तरह सुरक्षित हो जाते हैं। उम्र बढ़ने के साथ cognitive decline में स्वाभाविक रूप से काफी अंतर देखने को मिलता है, जिससे छोटे प्रभावों को सांख्यिकीय रूप से पहचानना मुश्किल हो सकता है।

Artificial Sweeteners सिर्फ डाइट ड्रिंक तक सीमित नहीं

कृत्रिम मिठास का इस्तेमाल सिर्फ चाय या कॉफी में डालने वाले शुगर सब्स्टीट्यूट तक सीमित नहीं है। आज ये कई तरह के ultra-processed foods और beverages में मौजूद होते हैं। डाइट सोडा, शुगर-फ्री ड्रिंक्स, प्रोटीन बार, पैकेज्ड स्नैक्स और कई ‘sugar-free’ उत्पादों में अलग-अलग प्रकार के स्वीटनर्स इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

यही वजह है कि किसी व्यक्ति को अपने रोजाना सेवन की वास्तविक मात्रा का अंदाजा लगाना मुश्किल हो सकता है। कई बार एक ही दिन में अलग-अलग खाद्य और पेय पदार्थों के जरिए इनका सेवन हो जाता है।

क्या स्वीटनर्स पूरी तरह छोड़ देने चाहिए?

इस अध्ययन के आधार पर तुरंत यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि हर व्यक्ति को सभी artificial sweeteners पूरी तरह बंद कर देने चाहिए। शोध में संबंध पाया गया है, लेकिन कारण और प्रभाव साबित नहीं हुआ है। इसके अलावा, व्यक्ति की पूरी डाइट, जीवनशैली, स्वास्थ्य स्थिति और वह किस कारण से स्वीटनर्स का इस्तेमाल करता है, जैसे कई कारक भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

फिलहाल विशेषज्ञों के लिए यह अध्ययन आगे की रिसर्च का आधार बन सकता है। आम लोगों के लिए संदेश इतना जरूर है कि ‘sugar-free’ या ‘low-calorie’ का लेबल किसी उत्पाद को अपने आप स्वस्थ नहीं बना देता। डाइट को संतुलित रखना और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के लेबल पर मौजूद ingredients को ध्यान से देखना बेहतर आदत हो सकती है। खासकर यदि किसी व्यक्ति को डायबिटीज या अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, तो अपने आहार में बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य dietitian की सलाह लेना उचित रहेगा।

 

 

 

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