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पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने खुलासा किया है कि उनके समय चुनाव आयोग विपक्ष के प्रति सहानुभूति रखता था। उन्होंने मनमोहन सिंह का एक किस्सा भी साझा किया।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) एस.वाई. कुरैशी का एक हालिया बयान इस समय देश के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव आयोग (Election Commission) की भूमिका और निष्पक्षता को लेकर कई बड़े और चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। डॉ. कुरैशी ने साफ तौर पर कहा कि उनके कार्यकाल (2010 से 2012) के दौरान चुनाव आयोग का रवैया विपक्ष के प्रति काफी सहानुभूतिपूर्ण (Sympathetic) और सहयोगात्मक था। उनका मानना था कि सत्ता से बाहर होने के कारण विपक्षी दलों को एक समान अवसर (Level Playing Field) सुनिश्चित करने के लिए अधिक संस्थागत समर्थन की आवश्यकता होती है। आइए जानते हैं कि उन्होंने किस तरह विपक्ष की मदद की और तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के समय क्या कुछ घटा था।
विपक्ष के लिए हमेशा खुले रहते थे चुनाव आयोग के दरवाजे
एएनआई (ANI) से बातचीत के दौरान पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने अपने कार्यकाल की नीतियों का जिक्र करते हुए कहा, “हम पूरी तरह से विपक्ष के पक्ष में (Pro-Opposition) काम करते थे। मेरी यह स्पष्ट नीति थी, जिसके बारे में मैंने अपने सभी अधिकारियों को भी कड़े निर्देश दे रखे थे। चूंकि सरकार के हाथ बहुत लंबे होते हैं और वह बहुत कुछ करवा सकती है, इसलिए जो दल सत्ता से बाहर है, उन्हें ही हमारी सहानुभूति और सहयोग की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।”
डॉ. कुरैशी ने आगे बताया कि उन्होंने अपने अधिकारियों से कहा था कि अगर कोई विपक्षी दल कल का अपॉइंटमेंट मांगे, तो उन्हें आज का समय दें, और अगर वे आज मिलना चाहें, तो उन्हें तुरंत बुलाकर उनकी बात सुनी जाए। उनका उद्देश्य विपक्ष की समस्याओं को तुरंत हल करना था, यही वजह थी कि उस दौर में विपक्ष के साथ चुनाव आयोग के संबंध बेहद उत्कृष्ट थे।
जब धुर विरोधी अरुण जेटली बन गए थे कुरैशी के प्रशंसक
एस.वाई. कुरैशी ने बताया कि उनके छह साल के कार्यकाल (चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में) के दौरान भारतीय जनता पार्टी (BJP) मुख्य विपक्षी दल थी और आयोग के इस सहानुभूतिपूर्ण रवैये का सबसे बड़ा लाभ भाजपा को ही मिला था।
उन्होंने दिवंगत भाजपा नेता अरुण जेटली से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प संस्मरण साझा करते हुए कहा, “शुरुआत में अरुण जेटली मेरे प्रति काफी आक्रामक और विरोधी रवैया रखते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि मैं सुषमा स्वराज के करीब हूँ। लेकिन जब उन्होंने मुझे एक्शन में देखा और पाया कि चुनाव आयोग विपक्ष की सभी शिकायतों को बहुत धैर्यपूर्वक सुनता है और उनका तुरंत समाधान भी करता है, तो उनका नजरिया पूरी तरह बदल गया। इसके बाद अरुण जेटली मेरे बहुत बड़े प्रशंसक और समर्थक बन गए।”
पूर्व पीएम मनमोहन सिंह का ऐतिहासिक बयान: “अगर ऐसा है, तो मैं आत्महत्या कर लूंगा”
डॉ. कुरैशी ने अपने साक्षात्कार में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के बारे में भी एक ऐसी घटना का जिक्र किया, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री के मन में संवैधानिक संस्थाओं के प्रति गहरे सम्मान को दर्शाती है। उन्होंने बताया कि यूपीए-2 (UPA-2) सरकार के दौरान जब केंद्रीय मंत्रियों की बयानबाजी और ‘Loose Talk’ को लेकर चुनाव आयोग ने अपनी गंभीर चिंताएं प्रधानमंत्री तक पहुंचाईं, तो मनमोहन सिंह का जवाब बेहद चौंकाने वाला था।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बेहद भावुक होकर कहा था, “अगर आप (चुनाव आयोग) मेरे मंत्रियों या सरकार के बारे में ऐसा सोचते हैं, तो मैं आत्महत्या कर लूंगा।” डॉ. कुरैशी ने कहा कि प्रधानमंत्री के मुंह से ये शब्द सुनकर वे पूरी तरह स्तब्ध रह गए थे और इस तरह की प्रतिक्रिया के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। यह घटना साबित करती है कि डॉ. मनमोहन सिंह चुनाव आयोग का कितना सम्मान करते थे।
2012 का उत्तर प्रदेश चुनाव और सलमान खुर्शीद का विवाद
यह पूरा मामला साल 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय का है। उस वक्त तत्कालीन केंद्रीय कानून और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद ने चुनाव प्रचार के दौरान एक विवादित घोषणा कर दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सत्ता में आती है, तो अल्पसंख्यकों के लिए कोटा (आरक्षण) बढ़ा दिया जाएगा।
चूंकि यह आदर्श आचार संहिता का सीधा उल्लंघन था, इसलिए मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने तुरंत इसकी शिकायत चुनाव आयोग से की। डॉ. कुरैशी ने बताया, “हम इन शिकायतों को बेहद गंभीरता से लेते थे। हमने तुरंत दूसरी पार्टी (कांग्रेस) को नोटिस जारी किया, जिसके बाद दोनों पक्षों के बड़े वकीलों की फौज आयोग के सामने पेश हुई थी।” इस घटना के बाद चुनाव आयोग ने तत्कालीन कानून मंत्री को कड़ी फटकार भी लगाई थी।
एस.वाई. कुरैशी का यह बयान आज के दौर में इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह लोकतांत्रिक देशों में चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और सत्ता के सामने निडर होकर खड़े होने की क्षमता पर एक नई बहस को जन्म देता है।