तमिलनाडु की विजय सरकार का RTI पर यू-टर्न, लॉ एंड ऑर्डर विभाग को छूट देने वाला आदेश वापस

तमिलनाडु की विजय सरकार का RTI पर यू-टर्न, लॉ एंड ऑर्डर विभाग को छूट देने वाला आदेश वापस

 

तमिलनाडु की विजय सरकार ने पब्लिक लॉ एंड ऑर्डर विभाग को RTI से बाहर रखने वाला नोटिफिकेशन वापस ले लिया। कार्ति चिदंबरम और बीजेपी ने फैसले पर सवाल उठाए थे।

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) सरकार ने रविवार को सूचना का अधिकार यानी RTI को लेकर जारी अपने एक आदेश को वापस ले लिया। सरकार ने ‘पब्लिक (लॉ एंड ऑर्डर) डिपार्टमेंट’ को RTI अधिनियम के दायरे से बाहर रखने का फैसला किया था, लेकिन राजनीतिक दलों और सहयोगी दलों की ओर से सवाल उठने के बाद इसे वापस ले लिया गया। सरकार की ओर से जारी नए आदेश में 21 सितंबर 2026 को जारी उस सरकारी आदेश को रद्द करने की बात कही गई, जिसके तहत विभाग को RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत छूट दी गई थी।

विभाग को इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशन की श्रेणी में रखा गया था

मूल अधिसूचना में तमिलनाडु के पब्लिक (लॉ एंड ऑर्डर) विभाग को ‘इंटेलिजेंस एंड सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशन’ के तौर पर अधिसूचित किया गया था। इसके आधार पर विभाग को RTI अधिनियम के दायरे से बाहर रखने का प्रावधान किया गया था। यह आदेश 21 सितंबर को जारी हुआ था और बाद में इसे तमिलनाडु सरकार के गजट में प्रकाशित किया गया।

यह विभाग राज्य में कानून-व्यवस्था से जुड़े कई संवेदनशील मामलों को देखता है। इनमें सांप्रदायिक और जातीय टकराव, राजनीतिक आंदोलन, निवारक हिरासत, पुलिस कार्रवाई, हिरासत में मौत, कथित पुलिस यातना और रिमांड पर मौजूद कैदियों की मौत से जुड़ी जांच रिपोर्ट जैसे मामले शामिल हैं। इसके अलावा विभाग मानवाधिकार आयोग से जुड़े संदर्भों और कानून-व्यवस्था से संबंधित केंद्र को भेजी जाने वाली रिपोर्टों पर भी काम करता है।

RTI के तहत जानकारी तक पहुंच को लेकर उठे सवाल

सरकार के शुरुआती फैसले के बाद यह सवाल उठाया गया कि विभाग को RTI से बाहर करने पर नागरिकों की सार्वजनिक रिकॉर्ड तक पहुंच प्रभावित हो सकती है। खासकर पुलिस कार्रवाई, हिरासत में मौत, पुलिस फायरिंग, सांप्रदायिक घटनाओं और अन्य संवेदनशील कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों से संबंधित सूचनाओं को लेकर चिंता सामने आई। हालांकि, RTI अधिनियम की धारा 24 में आने वाले संगठनों को भी कुछ परिस्थितियों में भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित जानकारी के संबंध में प्रावधानों का सामना करना पड़ता है।

कार्ति चिदंबरम ने फैसले की आलोचना की

कांग्रेस सांसद कार्ति पी. चिदंबरम ने शुरुआती फैसले पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि ऐसा कदम लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिहाज से अच्छी मिसाल नहीं है। कार्ति ने RTI कानून को लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही और सरकारी कामकाज की जानकारी तक नागरिकों की पहुंच से जोड़ते हुए कहा कि कानून का दायरा सीमित करने के बजाय उसे मजबूत किया जाना चाहिए।

कार्ति चिदंबरम ने विशेष रूप से पुलिस फायरिंग, हिरासत में मौत, कथित यातना, रिमांड में मौत, सांप्रदायिक और जातीय टकराव, राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों तथा कुछ मुकदमों से संबंधित सरकारी निर्णयों जैसी सूचनाओं का उल्लेख किया। उनके अनुसार, ऐसे विषयों से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

सरकार के फैसले वापस लेने का किया स्वागत

बाद में जब विजय सरकार ने अपना आदेश वापस लिया तो कार्ति चिदंबरम ने इस कदम का स्वागत किया। उन्होंने सरकार को प्रशासनिक फैसलों में सावधानी बरतने की सलाह दी और कहा कि नौकरशाहों को प्रशासन का तरीका, लहजा और दिशा तय करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। यह टिप्पणी उस राजनीतिक विवाद के बीच आई, जिसमें सरकार के सहयोगी दलों से जुड़े नेताओं ने भी शुरुआती फैसले पर सवाल उठाए थे।

बीजेपी नेता तमिलिसाई सुंदरराजन ने भी उठाए सवाल

इस मामले में बीजेपी नेता तमिलिसाई सुंदरराजन ने भी विजय सरकार के शुरुआती फैसले की आलोचना की थी। उन्होंने RTI से विभाग को बाहर रखने के फैसले पर सवाल उठाते हुए सरकार से पारदर्शिता को लेकर जवाब मांगा। उन्होंने पूछा कि अगर सरकार अपने कामकाज को लेकर निष्पक्ष है तो RTI से जुड़ी व्यवस्था को लेकर चिंता क्यों होनी चाहिए।

राजनीतिक विवाद के बीच सरकार ने बदला फैसला

विजय सरकार का यह फैसला ऐसे समय में सामने आया जब RTI के दायरे और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता को लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई। शुरुआती आदेश के बाद सहयोगी दलों और विपक्षी नेताओं की ओर से आपत्तियां सामने आईं। इसके बाद रविवार को सरकार ने नया आदेश जारी कर 21 सितंबर के आदेश को रद्द कर दिया।

RTI कानून का महत्व

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का उद्देश्य नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरणों के नियंत्रण में मौजूद सूचनाओं तक पहुंच उपलब्ध कराना है। हालांकि कानून में कुछ संस्थाओं और सूचनाओं को निर्धारित परिस्थितियों में छूट देने का प्रावधान भी है। तमिलनाडु सरकार का शुरुआती आदेश इसी कानूनी प्रावधान के तहत पब्लिक (लॉ एंड ऑर्डर) विभाग को एक विशेष श्रेणी में रखने से संबंधित था। अब आदेश वापस लिए जाने के बाद यह विभाग उस विशेष छूट के तहत बाहर नहीं रहेगा, जिसे 21 सितंबर के सरकारी आदेश के जरिए लागू किया गया था।

कुछ ही समय में बदली तस्वीर

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि 21 सितंबर के आदेश को लेकर सामने आए विवाद के बाद सरकार ने रविवार को उसे वापस ले लिया। इस तरह पब्लिक (लॉ एंड ऑर्डर) विभाग को RTI से छूट देने का फैसला ज्यादा समय तक प्रभावी नहीं रहा। अब राजनीतिक दलों के बीच इस मुद्दे पर उठे सवाल और सरकार के फैसले को वापस लेने के घटनाक्रम ने तमिलनाडु में पारदर्शिता, जवाबदेही और सूचना के अधिकार को लेकर बहस को फिर सामने ला दिया है।

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