IIT रुड़की के अध्ययन में दिल्ली के नौ संरक्षित स्मारकों पर अलग-अलग तरह के खतरों का खुलासा हुआ है। निजामुद्दीन और उग्रसेन की बावली जैसे स्मारकों पर शहरी निर्माण का असर सामने आया।
दिल्ली अपने ऐतिहासिक स्मारकों और पुरातात्विक धरोहरों के लिए दुनिया भर में जानी जाती है। राजधानी में मौजूद कई इमारतें और संरचनाएं सदियों पुराने इतिहास की गवाह हैं। इन स्मारकों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार की ओर से कई नियम और प्रावधान लागू किए गए हैं। हालांकि, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की के एक अध्ययन में सामने आया है कि मौजूदा संरक्षण व्यवस्था के बावजूद दिल्ली के संरक्षित स्मारक अलग-अलग तरह के जोखिमों का सामना कर रहे हैं। अध्ययन में विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया गया है कि सभी स्मारकों के आसपास एक जैसे ‘हेरिटेज बफर’ नियम लागू होने के बावजूद उनके सामने मौजूद खतरे एक जैसे नहीं हैं।
निजामुद्दीन में ऐतिहासिक नाले पर फ्लाईओवर का दबाव
अध्ययन में दिल्ली के नौ केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों का विश्लेषण किया गया। इसमें सामने आया कि कुछ स्मारकों के आसपास होने वाले आधुनिक निर्माण और शहरी विकास से ऐतिहासिक संरचनाओं पर असर पड़ सकता है। निजामुद्दीन क्षेत्र का उदाहरण देते हुए अध्ययन में बताया गया है कि एक फ्लाईओवर का दबाव वहां मौजूद ऐतिहासिक नाले को प्रभावित कर रहा है। यह स्थिति इस बात को दर्शाती है कि किसी स्मारक के आसपास केवल निर्धारित दूरी बनाए रखना ही पर्याप्त नहीं हो सकता। उस स्थान की जमीन, आसपास की संरचनाओं, यातायात, जल निकासी और निर्माण गतिविधियों का भी संरक्षण व्यवस्था में ध्यान रखा जाना जरूरी हो सकता है।
उग्रसेन की बावली के पास निर्माण से भूमिगत संरचना को खतरा
उग्रसेन की बावली दिल्ली की प्रमुख ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है। अध्ययन में इसके आसपास की परिस्थितियों को भी गंभीरता से देखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार, बावली के पास नींव की खुदाई जैसी निर्माण गतिविधियों से भूमिगत जल संरचना पर खतरा उत्पन्न हो सकता है। बावली जैसी ऐतिहासिक संरचनाएं केवल ऊपर दिखाई देने वाली पत्थर की सीढ़ियों और दीवारों तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि उनका संबंध आसपास की जमीन और जल व्यवस्था से भी होता है। ऐसे में आसपास होने वाली गहरी खुदाई या निर्माण गतिविधियां जमीन के भीतर मौजूद संरचनाओं और जल प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं।
क्या एक जैसे हेरिटेज बफर नियम पर्याप्त हैं?
अध्ययन का महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि दिल्ली के संरक्षित स्मारकों के आसपास सामान्य तौर पर एक समान हेरिटेज बफर व्यवस्था लागू है, लेकिन प्रत्येक स्मारक का भौगोलिक और शहरी परिवेश अलग है। किसी स्मारक के पास सड़क या फ्लाईओवर हो सकता है, तो किसी अन्य स्थल के आसपास ऊंची इमारतें, भूमिगत निर्माण या जल संरचनाएं मौजूद हो सकती हैं। ऐसे में सभी स्थानों के लिए समान दूरी और समान नियम लागू करने से हर संभावित खतरे का समाधान नहीं हो सकता।
अध्ययन में इसी वजह से स्थल-विशेष के आधार पर संरक्षण नीति तैयार करने की आवश्यकता की ओर संकेत किया गया है। इसका अर्थ यह है कि किसी स्मारक की सुरक्षा तय करते समय केवल उसकी सीमा से बाहर होने वाली गतिविधियों को नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि आसपास के पूरे शहरी वातावरण और उससे जुड़े जोखिमों का भी आकलन किया जाना चाहिए।
AMASR अधिनियम के तहत क्या हैं नियम?
प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष (AMASR) अधिनियम के तहत केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों के आसपास निर्माण गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए विशेष क्षेत्र निर्धारित किए गए हैं। सामान्य व्यवस्था के अनुसार स्मारक के चारों ओर 100 मीटर का क्षेत्र प्रतिबंधित क्षेत्र माना जाता है। इसके बाद 200 मीटर का विनियमित क्षेत्र होता है। इन क्षेत्रों में निर्माण और अन्य गतिविधियों को लेकर अलग-अलग नियम लागू होते हैं।
इन प्रावधानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ऐतिहासिक स्मारकों के आसपास होने वाली आधुनिक गतिविधियां उनकी संरचनात्मक और ऐतिहासिक महत्ता को नुकसान न पहुंचाएं। हालांकि, IIT रुड़की के अध्ययन में यह सवाल उठाया गया है कि क्या केवल तय दूरी पर आधारित यह व्यवस्था दिल्ली जैसे तेजी से बदलते शहरी वातावरण में हर स्मारक की विशिष्ट जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।
शहरी विकास और विरासत संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी
दिल्ली में लगातार बढ़ता शहरीकरण ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण के सामने नई चुनौतियां पैदा कर रहा है। सड़क, फ्लाईओवर, इमारत, भूमिगत ढांचा और अन्य विकास परियोजनाएं शहर की जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक हो सकती हैं, लेकिन इनके निर्माण के दौरान ऐतिहासिक संरचनाओं पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का आकलन भी महत्वपूर्ण है। खासकर उन स्मारकों के मामले में जिनका संबंध जमीन के नीचे मौजूद जल संरचनाओं, नालों या अन्य पुरातात्विक अवशेषों से है।
हर स्मारक के लिए अलग संरक्षण रणनीति की जरूरत
मार्च में प्रकाशित इस अध्ययन का निष्कर्ष व्यापक रूप से इस ओर संकेत करता है कि विरासत संरक्षण के लिए एक समान नियमों के साथ-साथ स्थल-विशेष की परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है। नौ केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों के अध्ययन से पता चला कि जोखिमों की प्रकृति और उनकी गंभीरता अलग-अलग हो सकती है। इसलिए संरक्षण योजनाओं में स्मारक की संरचना के साथ उसके आसपास की जमीन, जल व्यवस्था, यातायात, निर्माण गतिविधियों और शहरी विकास को भी शामिल किया जाना चाहिए।
दिल्ली की ऐतिहासिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहे, इसके लिए आधुनिक विकास और विरासत संरक्षण के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है। IIT रुड़की का अध्ययन इसी दिशा में यह सवाल सामने रखता है कि क्या भविष्य में हेरिटेज बफर क्षेत्रों को सभी स्मारकों के लिए एक समान रखने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों और संभावित जोखिमों के आधार पर अधिक वैज्ञानिक और स्थल-विशेष दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।