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तमिलनाडु मंत्रिमंडल का विस्तार: मुख्यमंत्री विजय की सरकार में VCK और IUML शामिल। AIADMK के बागी विधायकों पर लटकी अयोग्यता की तलवार। राज्य की राजनीति में आए ताजा बदलावों और समीकरणों की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें।
तमिलनाडु की राजनीति में शुक्रवार का दिन एक बड़े बदलाव का गवाह बना। मुख्यमंत्री विजय ने अपनी सरकार को और अधिक मजबूती प्रदान करते हुए मंत्रिमंडल का विस्तार किया। इस विस्तार की सबसे खास बात यह रही कि सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे दो प्रमुख घटक दलों—विदुथलाई चिरुथाईगल काची (VCK) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML)—को औपचारिक रूप से मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया। यह कदम राज्य की गठबंधन सरकार के भविष्य के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है।
क्यों हुई VCK और IUML के शामिल होने में देरी?
बता दें कि मुख्यमंत्री विजय ने पहले ही इन दोनों सहयोगी दलों को सरकार का हिस्सा बनने का न्योता दिया था। हालांकि, प्रक्रिया में देरी का मुख्य कारण इन दलों के भीतर की आपसी रस्साकशी रही। सूत्रों के मुताबिक, VCK और IUML अपने कोटे से मंत्री बनने के लिए उपयुक्त विधायकों का चयन करने में काफी समय ले रहे थे। नामों पर आम सहमति न बन पाने के कारण, गुरुवार को हुए पहले मंत्रिमंडल विस्तार में ये दल शामिल नहीं हो सके थे। उस दौरान केवल कांग्रेस के 2 और TVK के 21 विधायकों ने ही शपथ ली थी। अब नामों की सूची फाइनल होने के बाद, इन दोनों दलों को सरकार में आधिकारिक जगह दे दी गई है, जिससे विजय सरकार की स्थिति विधानसभा में और अधिक स्थिर हो गई है।
AIADMK के बागी विधायकों के लिए बड़ा झटका
मंत्रिमंडल के इस विस्तार में सबसे ज्यादा चर्चा AIADMK के बागी विधायकों को दरकिनार किए जाने की हो रही है। विश्वास मत के दौरान AIADMK से बगावत कर TVK को समर्थन देने वाले 25 विधायकों को उम्मीद थी कि उन्हें इनाम के तौर पर मंत्री पद मिलेगा। इन बागियों की अगुवाई सीनियर नेता CV षणमुगम, SP वेलूमणी और विजय भास्कर जैसे दिग्गज कर रहे थे। उन्होंने अपनी ही पार्टी के 47 में से 25 विधायकों को तोड़कर विजय सरकार को समर्थन दिया था।
हालांकि, मुख्यमंत्री विजय ने इन बागियों को मंत्रिमंडल में शामिल करने से परहेज किया। इस निर्णय के पीछे वामपंथी दलों और गठबंधन के अन्य सहयोगी दलों का भारी दबाव था। सहयोगी दलों का स्पष्ट कहना था कि यदि बागियों को मंत्री बनाया गया, तो वे सरकार से अपना समर्थन वापस ले सकते हैं।
डिसक्वालिफिकेशन (अयोग्यता) की तलवार
इन बागी विधायकों के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तो उन्हें सत्ता में जगह नहीं मिली, और दूसरी तरफ उन पर कानूनी संकट गहरा गया है। AIADMK ने विश्वास मत के दौरान सरकार के खिलाफ वोटिंग का व्हिप (Whip) जारी किया था। व्हिप का उल्लंघन करने के कारण, इन 25 बागी विधायकों पर अब सदस्यता जाने यानी डिसक्वालिफिकेशन का खतरा मंडरा रहा है। कानूनी जानकारों के अनुसार, विधानसभा अध्यक्ष के पास इनकी सदस्यता खत्म करने का पूरा अधिकार है, यदि पार्टी आलाकमान इस संबंध में औपचारिक शिकायत दर्ज कराता है।
क्या फिर एकजुट होगी AIADMK?
मंत्रिमंडल में जगह न मिलने के बाद बागी खेमे में हताशा साफ देखी जा सकती है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, गुरुवार को विस्तार के बाद 25 में से 9 विधायक अपने गुट से अलग हो गए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे अब अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने के लिए वापस AIADMK की मुख्यधारा में लौटने की सोच रहे हैं।
दूसरी ओर, बगावत करने वाले बड़े नेताओं के रुख में भी नरमी देखी जा रही है। जो नेता कभी AIADMK महासचिव एडप्पाडी पलनीस्वामी का इस्तीफा मांग रहे थे, वे अब जनरल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की मांग कर रहे हैं ताकि पार्टी में ‘हार की समीक्षा’ की जा सके। यह स्पष्ट संकेत है कि बगावत की जो आग कुछ दिन पहले भड़की थी, वह अब बुझती हुई दिख रही है।