भारत-थाईलैंड संबंध: चीन और अमेरिका के बीच ‘तीसरी धुरी’ बनेगा भारत; ORF रिपोर्ट में रणनीतिक बदलाव का बड़ा दावा

भारत-थाईलैंड संबंध: चीन और अमेरिका के बीच 'तीसरी धुरी' बनेगा भारत; ORF रिपोर्ट में रणनीतिक बदलाव का बड़ा दावा

 

ORF की नई रिपोर्ट के अनुसार, थाईलैंड अब भारत को अमेरिका और चीन के बीच एक ‘तीसरी धुरी’ के रूप में देख रहा है। सेमीकंडक्टर, एआई और ऑटोमोटिव क्षेत्रों में सहयोग से दोनों देशों के संबंधों में नए युग की शुरुआत हो सकती है।

भारत-थाईलैंड संबंध: वैश्विक भू-राजनीति में ‘तीसरे धुरी’ का उदय

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) की एक विशेष रिपोर्ट ने दक्षिण-पूर्व एशिया में बदलते रणनीतिक समीकरणों के बीच भारत और थाईलैंड के बीच एक गहरे समझौते की वकालत की है। जयबाल नदुवथ द्वारा लिखित इस रिपोर्ट के अनुसार, थाईलैंड अब अपनी पारंपरिक साझेदारियों (अमेरिका और चीन) से परे जाकर भारत को एक “तीसरी धुरी” (Third Axis) के रूप में देख रहा है। यह बदलाव न केवल थाईलैंड की रणनीतिक स्वायत्तता की आवश्यकता को दर्शाता है, बल्कि भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति और थाईलैंड की ‘एक्ट वेस्ट’ नीति के बीच बढ़ते तालमेल का भी प्रतीक है।

रणनीतिक विविधीकरण: अमेरिका और चीन के बीच संतुलन

रिपोर्ट के अनुसार, बैंकॉक अब अपने पुराने सहयोगियों के प्रति सतर्क रुख अपना रहा है। दशकों तक अमेरिका थाईलैंड का प्रमुख सुरक्षा भागीदार रहा है, लेकिन वाशिंगटन की “अनप्रेडिक्टेबल” नीतियों और 2014 के राजनीतिक घटनाक्रमों पर उसकी प्रतिक्रिया ने बैंकॉक को सोचने पर मजबूर कर दिया है। दूसरी ओर, चीन ने निवेश और सांस्कृतिक जुड़ाव के जरिए अपनी पैठ तो बनाई है, लेकिन दक्षिण चीन सागर में बीजिंग का आक्रामक रुख, कंबोडिया के साथ उसकी नजदीकी और “दबावकारी भू-आर्थिक प्रथाओं” ने थाईलैंड की चिंता बढ़ा दी है। इस अनिश्चितता के बीच, भारत एक “भरोसेमंद और बिना किसी रणनीतिक बोझ” वाले साझेदार के रूप में उभरा है।

अर्धचालक (Semiconductors): डिजाइन और निर्माण का संगम

ORF ने आर्थिक मजबूती के लिए पांच ‘अर्ली-हार्वेस्ट’ क्षेत्रों की पहचान की है, जिनमें सेमीकंडक्टर सबसे प्रमुख है। थाईलैंड सेमीकंडक्टर असेंबली, पैकेजिंग और टेस्टिंग (OSAT) में वैश्विक हब है, जबकि भारत के पास दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत चिप डिजाइन वर्कफोर्स है। रिपोर्ट का तर्क है कि दोनों देश मिलकर एक ऐसा ‘को-डेवलपमेंट मॉडल’ विकसित कर सकते हैं जहाँ भारत डिजाइन और आईपी (IP) को संभाले और थाईलैंड विनिर्माण और उन्नत पैकेजिंग को। यह साझेदारी उन्नत फैब्रिकेशन क्षमताओं के बिना भी एक शक्तिशाली पारिस्थितिकी तंत्र बना सकती है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल संप्रभुता

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में, थाईलैंड वर्तमान में विदेशी हाइपरस्केलर्स पर निर्भर है और अपनी “संप्रभु एआई क्षमता” (Sovereign AI) बनाना चाहता है। भारत, जिसके पास 10 लाख से अधिक एआई पेशेवरों का विशाल पूल है, थाईलैंड की इस क्षमता की कमी को दूर कर सकता है। रिपोर्ट में ‘नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन’ के अनुभवों को साझा करने और थाई-केंद्रित फाउंडेशन मॉडल विकसित करने के लिए सहयोग का प्रस्ताव दिया गया है।

ऑटोमोटिव क्षेत्र: भारत-थाईलैंड-जापान त्रिपक्षीय ढांचा

थाईलैंड दुनिया का दसवां सबसे बड़ा वाहन उत्पादक है, जबकि भारत वैश्विक ऑटोमोटिव जीसीसी (Global Capability Centres) का 50 प्रतिशत हिस्सा होस्ट करता है। रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण ‘भारत-थाईलैंड-जापान’ त्रिपक्षीय ढांचे का सुझाव देती है। चूंकि जापानी कंपनियां दोनों देशों के बाजारों पर हावी हैं, इसलिए अनुसंधान, बैटरी प्रबंधन प्रणाली (BMS) और इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बुनियादी ढांचे में संरेखण तीनों पक्षों के लिए जोखिम को कम करेगा और विनिर्माण के पैमाने को बढ़ाएगा।

MSME एकीकरण और वैश्विक मूल्य श्रृंखला

‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) से जोड़ना अनिवार्य है। थाईलैंड की फर्में सटीक असेंबली और इलेक्ट्रॉनिक्स एकीकरण में माहिर हैं, जबकि भारतीय फर्मों के पास सॉफ्टवेयर और टूलिंग में मजबूती है। रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक मशीनरी, आईओटी (IoT) और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में टास्क-शेयरिंग के जरिए दोनों देश अपनी विनिर्माण निर्भरता को चीन और जापान से कम कर सकते हैं।

पर्यटन और सांस्कृतिक सेतु: बौद्ध सर्किट की चुनौतियां

सभ्यतागत रूप से भारत और थाईलैंड दो सहस्राब्दियों से जुड़े हुए हैं। हालांकि, रिपोर्ट भारत के बौद्ध पर्यटन बुनियादी ढांचे पर सवाल उठाती है। 2025 में केवल 1.4 लाख थाई पर्यटक भारत आए, जो बोधगया और सारनाथ जैसे स्थलों के आध्यात्मिक महत्व को देखते हुए काफी कम है। रिपोर्ट में कनेक्टिविटी, सेवा गुणवत्ता और आतिथ्य निवेश में बड़े सुधारों का आह्वान किया गया है ताकि इस “आध्यात्मिक अर्थव्यवस्था” की वास्तविक क्षमता को अनलॉक किया जा सके।

विकसित भारत और थाईलैंड 4.0 का मेल

अंततः, ओआरएफ की यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत और थाईलैंड के बीच की साझेदारी केवल द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक रणनीतिक संलयन है। जहाँ भारत को अपने ‘विकसित भारत’ लक्ष्यों के लिए विश्वसनीय भागीदारों की आवश्यकता है, वहीं थाईलैंड को रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए चीन और अमेरिका के अलावा एक मजबूत विकल्प चाहिए। भारत इस संतुलन को प्रदान करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

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