आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने शिक्षा, विस्थापन और जीवन संघर्ष पर अहम बातें कहीं। जानें उन्होंने बंटवारे के विस्थापितों और शिक्षा के सही अर्थ के बारे में क्या कहा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने हाल ही में नागपुर में ‘सिंधु एजुकेशन सोसाइटी’ के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जीवन के संघर्ष, शिक्षा के सही अर्थ और बंटवारे के दौरान विस्थापित हुए लोगों की वीरता पर महत्वपूर्ण विचार रखे। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन में आने वाली विपरीत परिस्थितियां व्यक्ति के धैर्य और साहस की परीक्षा होती हैं, और जो इन परिस्थितियों से लड़ने के बजाय हार मान लेते हैं, वे पहले ही पराजित हो जाते हैं।
‘रोने वाला व्यक्ति लड़ने से पहले ही हार जाता है’
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में निराशावाद पर प्रहार करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों के सामने रोना किसी समस्या का समाधान नहीं है। उन्होंने कहा, “जो व्यक्ति मुश्किल समय में हार मानकर रोने लगता है, वह संघर्ष शुरू करने से पहले ही हार जाता है। जीवन में कभी भी भागना नहीं चाहिए, न ही निराश होना चाहिए।” उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सिखाया था कि युद्ध से भागना अपकीर्ति का कारण बनता है। संघर्ष में ही वैभव छिपा है और डटे रहने में ही मनुष्य की उन्नति है। यदि एक दरवाजा बंद होता है, तो नियति कहीं न कहीं दूसरा दरवाजा अवश्य खोलती है।
‘वे शरणार्थी नहीं, विस्थापित योद्धा थे’
बंटवारे का दंश झेलकर पाकिस्तान से भारत आए लोगों का स्मरण करते हुए भागवत ने एक बहुत ही संवेदनशील और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि जो लोग अपना सब कुछ—खेती, संपत्ति, पीढ़ियों की कमाई—छोड़कर भारत आए, उन्हें ‘शरणार्थी’ कहना गलत है। भागवत ने उन्हें ‘विस्थापित’ और ‘संघर्षरत योद्धा’ करार दिया। उन्होंने कहा, “उन लोगों ने अपनी संपत्ति या करियर नहीं, बल्कि देश और धर्म को चुना। वे इसलिए भारत आए क्योंकि उन्हें उस जमीन पर रहना था जो उनकी अपनी थी और जहां वे अपने धर्म का पालन निडर होकर कर सकते थे। वे अपनी मातृभूमि और धर्म के प्रति अटूट प्रेम के कारण विस्थापित हुए थे।” भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि उस समय उनके लिए ‘शरणार्थी’ शब्द का उपयोग करना उचित नहीं था, क्योंकि वे तो अपनी मर्यादा और मूल्यों की रक्षा के लिए सब कुछ न्योछावर कर देने वाले लोग थे।
‘पेट भरने वाली शिक्षा ही अनिवार्य नहीं, विवेक सर्वोपरि’
शिक्षा व्यवस्था पर अपने विचार रखते हुए सरसंघचालक ने कहा कि आज शिक्षा का अर्थ केवल ‘पेट भरने’ या नौकरी पाने तक सीमित हो गया है, जो कि अनुचित है। भागवत ने तर्क दिया कि केवल पेट भरने वाली शिक्षा आवश्यक तो हो सकती है, लेकिन वही अनिवार्य नहीं है। उन्होंने कहा, “इतिहास गवाह है कि कई बार बिना औपचारिक शिक्षा के लोग भी बड़े-बड़े उद्योगपति बने हैं और शिक्षित लोगों को अपने यहाँ काम पर रखा है।”
उनके अनुसार, शिक्षा का असली उद्देश्य ‘विवेक’ का विकास करना है। शिक्षा का शुभारंभ घर से होता है, जहाँ माँ ही बच्चे की पहली शिक्षिका होती है। उन्होंने जोर दिया कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो मनुष्य को सही-गलत का विवेक दे और उसे जीवन में ऊँचे लक्ष्य (Aim in Life) निर्धारित करने की प्रेरणा दे।
जीवन जीने की वास्तविक रीति: स्वार्थ से ऊपर मानवता
डॉ. भागवत ने भारतीय संस्कृति की मूल भावना को रेखांकित करते हुए कहा कि जीवन केवल अपने लिए जीने का नाम नहीं है। उन्होंने कहा, “हमें केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपनों के लिए और मानवता के लिए जीना है।” उन्होंने नेकी के महत्व को समझाते हुए कहा कि दूसरों को उपदेश देने से बेहतर है कि हम खुद ‘नेकी’ का आचरण करें। कार्य और कीर्ति से समाज को शिक्षित करना ही भारतीय जीवन पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता है।
अंत में, मोहन भागवत का यह संबोधन युवाओं और समाज के हर वर्ग के लिए एक संदेश था। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीति का चरित्र अक्सर ऐसा होता है कि सफल होने पर लोगों में जलन की भावना पैदा हो जाती है, लेकिन एक जागरूक समाज को इन सब से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण, धर्म और सत्य के मार्ग पर अडिग रहना चाहिए। उनका यह विचार कि “प्रयास करने से सब ठीक होता है,” आज के दौर में हर उस व्यक्ति के लिए एक संबल है जो चुनौतियों के बीच अपने सपनों को साकार करने का साहस रखता है।