इंडिया ब्लॉक की बैठक के लिए दिल्ली पहुँचीं ममता बनर्जी। टीएमसी में बगावत और विधायकों के अलग होने के बीच क्या पार्टी संसद में एकजुट रह पाएगी? जानें पूरी सियासी हलचल।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सोमवार को होने वाली ‘इंडिया ब्लॉक’ (INDIA Block) की महत्वपूर्ण बैठक से ठीक पहले राजनीतिक सरगर्मियां अपने चरम पर हैं। इस बैठक में भाग लेने के लिए तृणमूल कांग्रेस (TMC) सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज दिल्ली पहुँच गईं। उनके साथ राज्यसभा सांसद डोला सेन और वरिष्ठ लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी भी मौजूद रहे। हालांकि, यह यात्रा केवल इंडिया ब्लॉक की रणनीतिक चर्चाओं तक सीमित नहीं है; बल्कि टीएमसी के भीतर जारी आंतरिक कलह और टूट की अटकलों के बीच यह दौरा ममता बनर्जी के लिए एक ‘अग्निपरीक्षा’ जैसा है।
टीएमसी का आंतरिक संकट और नेतृत्व पर सवाल
ममता बनर्जी की यह दिल्ली यात्रा ऐसे नाजुक समय में हो रही है, जब पार्टी अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। 1998 में पार्टी की स्थापना के बाद से यह टीएमसी के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। पिछले सप्ताह पश्चिम बंगाल विधानसभा में जो कुछ हुआ, उसने पार्टी की नींव हिला दी है। टीएमसी के दो-तिहाई से अधिक विधायक पार्टी के आधिकारिक विधायक दल से अलग होकर एक स्वतंत्र विधायी विंग के रूप में काम करने लगे हैं, जिसे निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी का नेतृत्व प्राप्त है। उन्हें एक प्रमुख विपक्षी दल के रूप में मान्यता भी मिल चुकी है।
पार्टी के भीतर इस फूट का सीधा असर दिल्ली में भी देखने को मिल सकता है। सूत्रों का कहना है कि जो स्थिति पश्चिम बंगाल विधानसभा में उत्पन्न हुई है, वही दृश्य अब संसद के गलियारों में भी दोहराए जाने की आशंका है।
संसदीय दल पर मंडराता संकट और बागी नेताओं की सक्रियता
इंडिया ब्लॉक की बैठक के इतर, ममता बनर्जी दिल्ली में अपने संसदीय दल के साथ एक उच्च-स्तरीय बैठक करेंगी। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य संसद के भीतर पार्टी की वर्तमान स्थिति का जायजा लेना और बागियों की गतिविधियों पर लगाम कसना है। बागी टीएमसी नेता और सांसद संसद में पार्टी से अलग होने की योजना पर काम कर रहे हैं, ऐसी खबरें राजनीतिक गलियारों में जोर-शोर से चर्चा में हैं।
पार्टी के नए विधायी विंग के उपनेता संदीपान साहा ने संकेत दिए हैं कि नई दिल्ली में संसदीय दल के भीतर भी बगावत की वैसी ही स्थिति है, जैसी बंगाल विधानसभा में दिखी। बशीरहाट के सांसद हाजी नूरुल इस्लाम के निधन के बाद लोकसभा में टीएमसी की सदस्य संख्या घटकर 28 रह गई है। यदि इन सांसदों में से भी एक बड़ा धड़ा अलग होता है, तो ममता बनर्जी के लिए संसद में अपनी ताकत को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी।
अभिषेक बनर्जी बनाम टीएमसी नेतृत्व
पार्टी में इस असंतोष की जड़ें पिछले महीने हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों में छिपी हैं। करारी हार के बाद से ही पार्टी के कई नेताओं ने पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी और उनके काम करने के तौर-तरीकों के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई है। अभिषेक बनर्जी, जिन्हें ममता बनर्जी का उत्तराधिकारी माना जाता रहा है, फिलहाल खुद पार्टी के भीतर निशाने पर हैं। यह दिलचस्प है कि अभिषेक बनर्जी शनिवार को ही दिल्ली रवाना हो गए थे, जबकि उन्हें ममता बनर्जी के साथ ही जाना था। उनकी यह अलग यात्रा भी राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।
ममता बनर्जी के सामने दोहरी चुनौती
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने इस वक्त दोहरी चुनौती है। पहली, इंडिया ब्लॉक के सहयोगियों के बीच पार्टी का इकबाल बुलंद रखना और दूसरी, अपने बिखरे हुए घर को फिर से संगठित करना। दिल्ली दौरे के दौरान ममता बनर्जी का पूरा ध्यान अपने सांसदों को एकजुट रखने और संभावित दलबदल को रोकने पर होगा। उनके करीबी सहयोगियों का मानना है कि ममता बनर्जी अगले कुछ दिनों में पार्टी में बड़े संगठनात्मक बदलावों का ऐलान कर सकती हैं ताकि बागियों के हौसले पस्त किए जा सकें।
क्या होगा टीएमसी का भविष्य?
मौजूदा हालात बताते हैं कि ममता बनर्जी का करिश्माई नेतृत्व पहली बार किसी बड़ी आंतरिक चुनौती का सामना कर रहा है। बागी सांसद जो अपना कदम उठाने की तैयारी में हैं, वे टीएमसी के भविष्य का निर्धारण कर सकते हैं। यदि पार्टी का यह बिखराव नहीं रुका, तो आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति में टीएमसी की भूमिका सिमट सकती है।
सोमवार की इंडिया ब्लॉक की बैठक के साथ-साथ दिल्ली में होने वाली टीएमसी की आंतरिक बैठक यह तय करेगी कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी को टूटने से बचा पाती हैं, या फिर यह विद्रोह उनके राजनीतिक सफर का सबसे बड़ा मोड़ साबित होगा। देश की नजरें अब टीएमसी के रुख पर टिकी हैं कि क्या वे संसद में एकजुट रह पाएंगे या फिर इतिहास खुद को दोहराएगा।