कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस ने 5 सीटें जीतीं। बीजेपी-जेडीएस के विधायकों की क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस को बहुमत मिला। डीके शिवकुमार की रणनीति रही सफल।
कर्नाटक में हाल ही में संपन्न हुए विधान परिषद चुनावों के नतीजों ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। इन परिणामों ने न केवल कांग्रेस की स्थिति को मजबूत किया है, बल्कि बीजेपी और जेडीएस गठबंधन के भीतर अविश्वास की खाई को और गहरा कर दिया है। कांग्रेस ने इन चुनावों में पांच सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी सत्ता को और अधिक सुरक्षित कर लिया है। इस जीत के पीछे सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘क्रॉस वोटिंग’ है, जिसने विपक्षी दलों की रणनीति को ध्वस्त कर दिया है।
क्रॉस वोटिंग का गणित और कांग्रेस की बढ़त
विधान परिषद की इन सीटों पर जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस के पांच उम्मीदवारों को कुल 140 ‘फर्स्ट प्रेफरेंस’ वोटों की आवश्यकता थी। हालांकि, जब परिणाम घोषित हुए, तो कांग्रेस के खाते में 151 वोट आए। यह स्पष्ट संकेत है कि बीजेपी और जेडीएस के कम से कम 11 विधायकों ने अपनी पार्टी की विचारधारा के विपरीत जाकर कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया। चूँकि यह मतदान प्रक्रिया ‘गुप्त’ थी, इसलिए बीजेपी और जेडीएस के लिए यह पता लगाना एक बड़ी चुनौती बन गई है कि उनके खेमे में ‘भितरघात’ किसने किया है।
बीजेपी के आंतरिक सूत्रों की मानें तो उनके खेमे से कम से कम पांच विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है, जिनमें पहले से निष्कासित दो विधायक एसटी सोमशेखर और शिवराम हेब्बार भी शामिल हैं। वहीं, जेडीएस के आंकड़ों को देखें तो स्थिति और भी गंभीर दिखती है। जेडीएस के पास 18 विधायक थे, लेकिन उनके उम्मीदवार गोविंद राजू को केवल 14 वोट मिले, जिसका अर्थ है कि पार्टी के 4 विधायकों ने कांग्रेस के पक्ष में वोट डालकर अपनी ही पार्टी के साथ विश्वासघात किया है।
बीजेपी-जेडीएस गठबंधन में बढ़ता अविश्वास
इन नतीजों ने बीजेपी और जेडीएस गठबंधन के भीतर नेतृत्व क्षमता पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। बीजेपी में प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र के नेतृत्व को लेकर अब अंदरखाने आलोचना शुरू हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के पुत्र विजयेंद्र के लिए यह परीक्षा की घड़ी है, क्योंकि उनके नेतृत्व में हुई इस चुनावी हार और क्रॉस वोटिंग ने पार्टी की साख पर सवाल उठा दिए हैं।
दूसरी ओर, जेडीएस के लिए यह परिणाम एक बड़ा झटका है। गठबंधन के सहयोगी होने के बावजूद उनके विधायकों का कांग्रेस के प्रति झुकाव यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दोनों पार्टियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि उनके कौन से विधायक ‘बिकाऊ’ साबित हुए हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में लगने वाला समय गठबंधन के बीच दूरियां और बढ़ा सकता है।
विधान परिषद में कांग्रेस का दबदबा
इन पांच सीटों पर जीत के साथ ही कर्नाटक विधान परिषद का समीकरण पूरी तरह बदल गया है। 175 सदस्यों वाली इस उच्च सदन में अब कांग्रेस पार्टी स्पष्ट बहुमत में आ गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह जीत कांग्रेस सरकार के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। अब सरकार के लिए विवादास्पद या महत्वपूर्ण बिलों (Critical Bills) को सदन में पारित कराना बेहद आसान हो जाएगा, जिसे पहले विपक्ष की संख्या बल के कारण रोकना मुश्किल होता था।
इस जीत का पूरा श्रेय उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की चुनावी रणनीति को दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के साथ उनकी जुगलबंदी ने कांग्रेस को राज्य में एक अपराजेय शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया है। डी.के. शिवकुमार की राजनीतिक चतुराई और जमीनी स्तर पर पकड़ ने यह साबित कर दिया है कि वे कर्नाटक की राजनीति के बड़े खिलाड़ी हैं।
कर्नाटक की राजनीति के लिए यह चुनाव एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो रहा है। कांग्रेस का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है, जबकि विपक्ष अपने ही विधायकों पर भरोसा खोता जा रहा है। यदि बीजेपी और जेडीएस ने जल्द ही अपने असंतुष्ट विधायकों को नहीं संभाला, तो आने वाले समय में उन्हें और भी बड़ी राजनीतिक हानि का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल, कर्नाटक में कांग्रेस सरकार पहले से कहीं अधिक स्थिर और शक्तिशाली नजर आ रही है।