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अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा, संसद जन-आकांक्षाओं का प्रतीक है। जानिए क्यों मजबूत और जवाबदेह संसद लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है।
30 जून, 2026 को ‘अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस’ (International Day of Parliamentarism) के अवसर पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक संस्थाओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों को शुभकामनाएँ दीं। यह दिन केवल एक वैश्विक आयोजन नहीं है, बल्कि उस लोकतंत्र की आत्मा को नमन करने का दिन है, जो जनता की आकांक्षाओं, उनके अधिकारों और अटूट विश्वास का प्रतिनिधित्व करती है। अपने संदेश में बिरला ने इस बात पर जोर दिया कि एक मजबूत, स्वतंत्र और जवाबदेह संसद ही लोकतंत्र की असली ताकत है और नागरिकों के अधिकारों की सबसे बड़ी संरक्षक है।
संसद: जन-आकांक्षाओं का सर्वोच्च केंद्र
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि संसद वह पवित्र स्थान है जहाँ विचारों का मंथन होता है, नीतियां गढ़ी जाती हैं और देश के भविष्य की दिशा तय की जाती है। भारत, जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, की संसद ने हमेशा से संविधान की भावना और लोकतांत्रिक परंपराओं को पूरी मजबूती के साथ कायम रखा है। भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र में संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव का एक ऐसा मंच है, जहाँ हर क्षेत्र, हर वर्ग और देश के हर नागरिक की आवाज सुनी जाती है और उसे उचित स्थान मिलता है।
विधायी कार्यों से परे: जवाबदेही और सामाजिक उत्तरदायित्व
ओम बिरला ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि आधुनिक युग में संसद की भूमिका केवल कानून निर्माण तक ही सीमित नहीं है। संसद पर आज कहीं अधिक बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसमें सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना, जनहित के मुद्दों पर सार्थक विमर्श को प्रोत्साहित करना, लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को बनाए रखना और नागरिकों के अधिकारों व कर्तव्यों के बीच एक उचित संतुलन स्थापित करना शामिल है। बिरला के अनुसार, आज का दौर ऐसी संसदीय कार्यप्रणाली की मांग करता है जो न केवल प्रभावी हो, बल्कि पारदर्शी और संविधान सम्मत भी हो।
लोकतंत्र की आत्मा को मजबूत करने का अवसर
अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस हमें आत्मनिरीक्षण करने का अवसर प्रदान करता है। लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि यह दिन हमें उन मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ करने का संकल्प लेने के लिए प्रेरित करता है जो लोकतंत्र की असली आत्मा हैं—संवाद, आम सहमति, जिम्मेदारी, पारदर्शिता और संवैधानिक मर्यादा। एक जीवंत लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि संसद के भीतर स्वस्थ बहस हो, जिसमें सत्तापक्ष और विपक्ष मिलकर देश के विकास के लिए एक सामूहिक दृष्टिकोण अपनाएं। जब संसद के भीतर संवाद का स्तर ऊंचा होता है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव पूरे देश के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण पर पड़ता है।
अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस का ऐतिहासिक संदर्भ
अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस, जिसे ‘विश्व संसद दिवस’ (World Parliament Day) के रूप में भी जाना जाता है, प्रतिवर्ष 30 जून को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 2018 में स्थापित यह दिवस 1889 में ‘इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन’ (IPU) की स्थापना की वर्षगांठ का प्रतीक है। IPU का उद्देश्य दुनिया भर के संसदों के बीच संवाद को बढ़ावा देना और शांति व लोकतंत्र को मजबूत करना है। यह दिन याद दिलाता है कि संसदीय लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं और इसे निरंतर पोषित करने की आवश्यकता है।
भविष्य का मार्ग और हमारा संकल्प
भारत का संसदीय इतिहास गौरवशाली रहा है। आज जब हम वैश्विक स्तर पर एक बड़ी शक्ति के रूप में उभर रहे हैं, तब हमारी जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के संदेश का सार यही है कि संसद केवल एक इमारत नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के सपनों का प्रतिबिंब है। आने वाले समय में, तकनीकी विकास और बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच, हमारी संसद को अधिक समावेशी और प्रतिक्रियाशील बनना होगा। नागरिकों का विश्वास ही संसदीय प्रणाली की सबसे बड़ी पूंजी है। अतः, यह हमारा सामूहिक संकल्प होना चाहिए कि हम संसदीय मर्यादाओं का पालन करते हुए देश के लोकतंत्र को और अधिक सशक्त और जीवंत बनाएं। शहीदों के सपनों के भारत और संविधान निर्माताओं की सोच के अनुरूप, एक जिम्मेदार और सजग संसद ही हमारे सुनहरे भविष्य का आधार स्तंभ है।