8 जून को भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट। निफ्टी और सेंसेक्स में भारी गिरावट के पीछे के कारण, पश्चिम एशिया का तनाव और कच्चे तेल की कीमतों का असर जानें।
सोमवार, 8 जून, 2026 को भारतीय शेयर बाजार के लिए एक बेहद निराशाजनक दिन साबित हुआ। बाजार के खुलते ही प्रमुख सूचकांकों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों में हड़कंप मच गया। निफ्टी 50 में 290 अंकों (1.24%) की भारी गिरावट के साथ यह 23,076.65 के स्तर पर आ गया, जबकि बीएसई सेंसेक्स 840 अंक यानी 1.13% टूटकर 73,403.06 पर कारोबार करता दिखा। केवल लार्जकैप ही नहीं, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी चौतरफा बिकवाली देखी गई। रियल्टी, मेटल, ऑटो और फाइनेंशियल सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित रहे, जबकि फार्मा और हेल्थकेयर सेक्टर ने बाजार की इस भारी गिरावट के बीच कुछ हद तक मजबूती दिखाई।
पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव
बाजार में इस गिरावट का सबसे प्रमुख कारण पश्चिम एशिया (West Asia) में अचानक बढ़ता तनाव है। इजरायल द्वारा ईरान के ठिकानों पर किए गए हवाई हमलों ने वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता पैदा कर दी है। ईरान के इस्फ़हान, तबरीज़ और तेहरान जैसे प्रमुख शहरों में धमाकों की खबरों ने निवेशकों के भरोसे को बुरी तरह हिला दिया है। हालांकि पिछले हफ्ते संघर्ष विराम को लेकर कुछ सकारात्मक संकेत मिले थे, लेकिन ताजा हमलों ने उन प्रयासों पर पानी फेर दिया है। युद्ध के इस बढ़ते खतरे के चलते वैश्विक स्तर पर जोखिम से बचने की प्रवृत्ति (risk-off sentiment) देखी जा रही है, जिसका असर भारतीय बाजारों पर स्पष्ट रूप से दिख रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर कमोडिटी बाजार पर पड़ा है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 3.50 डॉलर बढ़कर 96.59 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई हैं। वहीं, अमेरिकी क्रूड ऑयल भी 3.48 डॉलर की तेजी के साथ 94.02 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए मुद्रास्फीति (inflation) का खतरा पैदा करती हैं। तेल की बढ़ती कीमतें न केवल कॉर्पोरेट मार्जिन पर दबाव डालती हैं, बल्कि राजकोषीय घाटे को लेकर भी चिंताएं बढ़ाती हैं, जो बाजार की गिरावट का एक बड़ा कारक है।
वैश्विक बाजारों का दबाव और ‘फियर गेज’ में उछाल
भारतीय बाजार ही नहीं, बल्कि पूरा एशियाई बाजार भी दबाव में है। जापान का निक्केई 225 सूचकांक 4.2% की गिरावट के साथ बंद हुआ, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी 6.8% टूट गया। सैमसंग जैसी दिग्गज कंपनियों में 7% तक की गिरावट देखी गई। वहीं, वॉल स्ट्रीट पर भी पिछले सप्ताह भारी बिकवाली हुई थी, जहाँ एसपई 500 (S&P 500) और नैस्डैक (Nasdaq) ने अक्टूबर के बाद अपनी सबसे बड़ी एकदिवसीय गिरावट देखी। मजबूत अमेरिकी नौकरियों के आंकड़ों के कारण फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की आशंका ने भी निवेशकों को डरा दिया है। भारत में भी ‘इंडिया वीआईएक्स’ (India VIX), जो बाजार का ‘फियर गेज’ माना जाता है, 10% से अधिक उछलकर 17.40 पर पहुंच गया, जो बाजार में अनिश्चितता और घबराहट के बढ़ते स्तर को दर्शाता है।
तकनीकी दृष्टिकोण: क्या और नीचे जाएगा बाजार?
तकनीकी चार्ट्स पर भी बाजार की स्थिति कमजोर बनी हुई है। चॉइस ब्रोकिंग के टेक्निकल एनालिस्ट आकाश शाह के अनुसार, निफ्टी अपने सभी प्रमुख मूविंग एवरेज के नीचे कारोबार कर रहा है। चार्ट पर ‘लोअर हाई-लोअर लो’ का पैटर्न स्पष्ट रूप से दिख रहा है, जो यह दर्शाता है कि बाजार की संरचना काफी कमजोर है। जब तक सूचकांक प्रमुख प्रतिरोध स्तरों को पार नहीं कर लेता, तब तक बाजार में और गिरावट की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।
निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
बाजार में व्याप्त यह गिरावट दर्शाती है कि बाहरी कारक (Global Cues) फिलहाल भारतीय बाजार पर हावी हैं। जब तक पश्चिम एशिया में स्थिति सामान्य नहीं होती और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक बाजार में अस्थिरता बनी रहने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों को मौजूदा बाजार में भारी उतार-चढ़ाव के बीच अत्यधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है। यह समय आक्रामक खरीदारी के बजाय गुणवत्ता वाले स्टॉक्स पर ध्यान केंद्रित करने का है। आने वाले दिनों में फेडरल रिजर्व के रुख और वैश्विक घटनाक्रमों पर बाजार की नजर टिकी रहेगी। कुल मिलाकर, सोमवार का यह सत्र भारतीय बाजार के लिए एक कड़ा सबक रहा है, जो भू-राजनीतिक अस्थिरता के समय बाजार की संवेदनशीलता को पूरी तरह उजागर करता है।