भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच रणनीतिक साझेदारी पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का बयान। 15.5 अरब डॉलर के व्यापार को नई ऊंचाइयों पर ले जाने और आगामी इंडिया-अफ्रीका समिट पर पूरी जानकारी।
भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच ऐतिहासिक और समसामयिक संबंधों की डोर आज एक नए युग में प्रवेश कर रही है। मंगलवार को राष्ट्रपति भवन में दक्षिण अफ्रीका के उपराष्ट्रपति शिपोकोसा पालस माशातिले के साथ हुई बैठक में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने दोनों देशों के आपसी सहयोग को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का संकल्प दोहराया। भारत की अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पर आए उपराष्ट्रपति माशातिले का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि भारत और दक्षिण अफ्रीका की मित्रता केवल राजनयिक नहीं है, बल्कि यह साझा इतिहास और भविष्य की आकांक्षाओं पर आधारित एक ‘विशेष साझेदारी’ है।
15.5 अरब डॉलर का व्यापार और भविष्य की संभावनाएं
राष्ट्रपति मुर्मु ने विशेष रूप से दोनों देशों के बीच 15.5 अरब डॉलर के मौजूदा कारोबार का उल्लेख किया। हालांकि यह आंकड़ा प्रभावशाली है, लेकिन राष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में व्यापार की अपार संभावनाएं अभी भी अछूती हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को अपने द्विपक्षीय कारोबारी रिश्तों को और ऊंचाई पर ले जाने के लिए निरंतर प्रयास करने चाहिए।
मुर्मु के अनुसार, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए दोनों देशों को एक अनुकूल नीतिगत माहौल (Policy Framework) बनाए रखने की आवश्यकता है। एक ऐसा वातावरण, जहाँ दोनों देशों की कंपनियां एक-दूसरे के बाजारों में सहजता से निवेश कर सकें और अपनी कारोबारी गतिविधियों का विस्तार कर सकें। यह न केवल आर्थिक विकास को गति देगा, बल्कि रोजगार सृजन और तकनीकी हस्तांतरण के नए अवसर भी पैदा करेगा।
इंडिया-अफ्रीका फोरम समिट की पुनर्बहाली
बैठक के दौरान एक महत्वपूर्ण मुद्दा ‘इंडिया-अफ्रीका फोरम समिट’ का रहा। यह समिट मूल रूप से 28 से 31 मई के बीच नई दिल्ली में आयोजित की जानी थी, लेकिन उस समय इबोला वायरस के बढ़ते प्रकोप और इससे जुड़ी वैश्विक चिंताओं के कारण इसे स्थगित करना पड़ा था। राष्ट्रपति मुर्मु ने स्पष्ट किया कि भारत इस समिट को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
उन्होंने कहा कि भारत, अफ्रीकन यूनियन कमीशन के साथ मिलकर काम करेगा ताकि इस महत्वपूर्ण समिट को जल्द से जल्द फिर से आयोजित किया जा सके। यह समिट भारत और पूरे अफ्रीकी महाद्वीप के बीच रणनीतिक साझेदारी को एक नई दिशा देने का मंच है। अफ्रीका के साथ अपनी साझेदारी को लेकर भारत की प्रतिबद्धता किसी से छिपी नहीं है, और इस फोरम का सफल आयोजन इस प्रतिबद्धता का प्रमाण बनेगा।
ऐतिहासिक और समसामयिक मित्रता
राष्ट्रपति मुर्मु ने अपनी बातचीत में इस बात को रेखांकित किया कि भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच दोस्ती केवल अतीत के साझा संघर्षों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समसामयिक चुनौतियों का मिलकर सामना करने का संकल्प भी है। दक्षिण अफ्रीका की स्वतंत्रता की लड़ाई में भारत का नैतिक समर्थन और महात्मा गांधी व नेल्सन मंडेला जैसी महापुरुषों की विचारधारा ने दोनों देशों के बीच संबंधों की नींव रखी थी।
आज के दौर में, जब दुनिया खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल क्रांति और ऊर्जा संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, भारत और दक्षिण अफ्रीका का सहयोग वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज को बुलंद करने में सक्षम है। उपराष्ट्रपति माशातिले की यह यात्रा दोनों देशों के बीच आपसी समझ को और गहरा करने का काम करेगी।
सहयोग के नए क्षेत्र: निवेश और नवाचार
भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच व्यापार केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। राष्ट्रपति ने संकेत दिया कि दोनों देशों की कंपनियों को नवाचार (Innovation), नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy), और डिजिटल बुनियादी ढांचे जैसे आधुनिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना चाहिए। दक्षिण अफ्रीका के पास संसाधनों की प्रचुरता है, तो भारत के पास तकनीकी कौशल और मानव संसाधन का बड़ा आधार है। इन दोनों शक्तियों का मेल एक नई आर्थिक क्रांति का सूत्रपात कर सकता है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और उपराष्ट्रपति माशातिले के बीच हुई यह बैठक इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अपनी ‘अफ्रीका नीति’ को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है। भारत का लक्ष्य अफ्रीका को केवल एक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक विकास भागीदार के रूप में देखना है। 15.5 अरब डॉलर का कारोबार महज एक शुरुआत है। आने वाले समय में, यदि दोनों देश अपनी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करते हैं और नीतिगत बाधाओं को दूर करते हैं, तो भारत-दक्षिण अफ्रीका के संबंध विश्व पटल पर एक नई मिसाल कायम करेंगे।
यह यात्रा न केवल दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों को नया जोश देती है, बल्कि यह भी संदेश देती है कि भारत और अफ्रीका एक साझा भविष्य की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, जहाँ विकास, समृद्धि और आपसी सम्मान ही मुख्य स्तंभ होंगे।