आम आदमी पार्टी के राजनीतिज्ञ दुर्गेश पाठक ने दिल्ली शराब नीति मामले में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत की कार्यवाही में शामिल होने से इनकार कर दिया है। केजरीवाल और सिसोदिया के बाद पाठक ने भी पत्र लिखकर निष्पक्षता पर चिंता जताई।
आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ भारतीय राजनीतिज्ञ दुर्गेश पाठक ने दिल्ली शराब नीति मामले से जुड़ी कानूनी कार्यवाही में एक बड़ा और कड़ा रुख अपनाया है। दुर्गेश पाठक ने न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखकर सूचित किया है कि वे अब उनकी अदालत में चल रही कार्यवाही का हिस्सा नहीं बनेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे न तो व्यक्तिगत रूप से और न ही किसी वकील के माध्यम से इस प्रक्रिया में शामिल होंगे।
“सत्याग्रह” के मार्ग पर दुर्गेश पाठक
‘Justice must not only be done, but must also be seen to be done.’
With respect and humility, I have written to Justice Swarnakanta Sharma, that I too – along with Arvind Kejriwal ji and Manish Sisodia ji – will not participate in the current legal proceedings before her, either… pic.twitter.com/TMdfF5BfSb
— Durgesh Pathak (@ipathak25) April 29, 2026
दुर्गेश पाठक ने अपने फैसले के पीछे प्रसिद्ध कानूनी सिद्धांत का हवाला देते हुए ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा— ‘न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।’ उन्होंने अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के निर्णय के साथ एकजुटता दिखाते हुए कहा कि जब न्याय की प्रक्रिया की निष्पक्षता ही संदेह के घेरे में हो, तो वहाँ मूक दर्शक बने रहने के बजाय “सत्याग्रह” का मार्ग अपनाना बेहतर है।
केजरीवाल, सिसोदिया और संजय सिंह के बाद सामूहिक मोर्चा
यह निर्णय आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा अपनाए गए उस सामूहिक रुख का हिस्सा है, जिसके तहत अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह पहले ही न्यायमूर्ति शर्मा की अदालत का बहिष्कार कर चुके हैं। दुर्गेश पाठक ने अपने पत्र में सम्मान और विनम्रता व्यक्त करते हुए कहा कि वे न्यायपालिका का अनादर नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक ऐसी स्थिति का विरोध कर रहे हैं जहाँ उन्हें निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद नजर नहीं आ रही।
हितों के टकराव (Conflict of Interest) का आरोप
आम आदमी पार्टी के नेताओं का आरोप है कि इस मामले में हितों का टकराव और पूर्वाग्रह की स्थिति बनी हुई है। दुर्गेश पाठक ने संकेत दिया कि जब तक अदालत की कार्यवाही में पारदर्शिता और अटूट निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं होती, तब तक इस प्रक्रिया में भागीदारी का कोई अर्थ नहीं रह जाता। राजनीतिक हलकों में ‘आप’ नेताओं के इस कदम को न्यायिक प्रक्रिया के प्रति एक दुर्लभ और बड़े राजनीतिक प्रतिरोध के रूप में देखा जा रहा है।