दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बिजली न होने से छात्रों का भविष्य खतरे में। बुनियादी सुविधाओं की कमी और सरकार की विफलता पर जानें पूरी खबर।
दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था, जिसे कभी वैश्विक स्तर पर मॉडल के रूप में देखा जाता था, आज एक गहरे संकट के दौर से गुजर रही है। हालिया रिपोर्ट्स और जमीन से आ रही शिकायतों के अनुसार, दिल्ली के कई सरकारी स्कूलों में बिजली की भारी किल्लत है। बिजली का न होना केवल एक तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का प्रतीक है जो शिक्षा के प्रति पूरी तरह उदासीन है। आम आदमी पार्टी और अन्य प्रबुद्ध नागरिक यह सवाल पूछने पर मजबूर हैं कि आखिर भाजपा सरकार को दिल्ली के बच्चों की शिक्षा से इतनी नाराजगी क्यों है?
बुनियादी सुविधाओं का अभाव और छात्रों का भविष्य
स्कूल वह स्थान है जहाँ बच्चे अपना भविष्य गढ़ते हैं, और एक आदर्श शिक्षण वातावरण के लिए बिजली, पंखे, लाइट और कंप्यूटर लैब का सुचारू रूप से चलना अनिवार्य है। आज दिल्ली के भीषण गर्मी वाले दिनों में जब छात्रों को कूलिंग सिस्टम की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब स्कूलों में बिजली का न होना उनके सीखने की प्रक्रिया को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। बिना बिजली के स्कूलों में बच्चों का घंटों तक पसीने में बैठे रहना न केवल उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि यह उनकी एकाग्रता (concentration) को भी खत्म कर रहा है। जब शिक्षा विभाग बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में विफल रहता है, तो इसका सीधा असर परीक्षा परिणामों और छात्रों के समग्र विकास पर पड़ता है।
शिक्षा को राजनीति का केंद्र बनाने की विफलता
विगत वर्षों में दिल्ली के सरकारी स्कूलों को जिस ऊंचाई पर ले जाया गया था, उसे बनाए रखना और सुधारना वर्तमान सरकार की जिम्मेदारी थी। परंतु, बिजली जैसी बुनियादी सुविधा को भी उपलब्ध न करा पाना यह दर्शाता है कि सरकार की प्राथमिकताएं शिक्षा से हटकर कहीं और हैं। यदि सत्ता में बैठे लोग स्कूलों को संचालित करने के लिए बिजली का भुगतान तक समय पर नहीं कर पा रहे हैं या व्यवस्था को सही ढंग से नहीं देख पा रहे हैं, तो यह सरकारी तंत्र की घोर विफलता है।
क्या यह संभव है कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देने वाली सरकार, स्कूलों में अंधेरा रखकर छात्रों को अंधकार में धकेलना चाहती है? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा किसी भी राष्ट्र के निर्माण का आधार है। स्कूलों को राजनीति का अखाड़ा बनाने के बजाय, उन्हें ज्ञान के मंदिर के रूप में संरक्षित करना सरकार का प्राथमिक कर्तव्य होना चाहिए।
कौन है जिम्मेदार?
ये भाजपा वाले दिल्ली के स्कूलों में बिजली तक दे नहीं सकते, आखिर इनकी शिक्षा से इतनी भी क्या दुश्मनी है? pic.twitter.com/WBeN8ouadq
— Aam Aadmi Party Delhi (@AAPDelhi) July 4, 2026
जब दिल्ली के स्कूलों में बिजली कटने की खबरें आती हैं, तो जवाबदेही तय करने के बजाय अक्सर विभागों के बीच एक-दूसरे पर दोषारोपण का खेल शुरू हो जाता है। यह खेल दिल्ली की जनता देख रही है। बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना एक प्रशासनिक कार्य है, न कि कोई जादुई काम। यदि सरकारें स्कूलों की बिजली बिल नहीं भर सकतीं या बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड नहीं कर सकतीं, तो यह इस बात को स्पष्ट करता है कि उनके पास शिक्षा को लेकर कोई विजन ही नहीं है।
अभिभावक, जो अपने बच्चों को बेहतर भविष्य की उम्मीद में सरकारी स्कूलों में भेजते हैं, आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। क्या उन्हें यह अधिकार नहीं है कि उनके बच्चे पंखे के नीचे बैठकर पढ़ सकें? यह नाराजगी केवल एक सुविधा की नहीं, बल्कि उस अपमान की है जो छात्रों और शिक्षकों को रोज झेलना पड़ता है।
शिक्षा के प्रति सरकार का नजरिया
ऐसा लगता है कि भाजपा सरकार का शिक्षा के प्रति रवैया बेहद संकीर्ण है। शिक्षा में निवेश करना भविष्य में निवेश करना होता है। यदि सरकार स्कूलों में बिजली जैसी मामूली चीजों पर कटौती कर रही है, तो यह आने वाली पीढ़ी के प्रति अपराध के समान है। एक तरफ हम डिजिटल इंडिया और वर्ल्ड-क्लास एजुकेशन की बात करते हैं, दूसरी तरफ हमारे स्कूलों में बेसिक सुविधाएं तक नहीं हैं। यह दोमुंहा रवैया दिल्ली की जनता को स्वीकार्य नहीं है।
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि शिक्षा को किसी भी राजनीतिक द्वेष से ऊपर रखा जाना चाहिए। यदि स्कूल में बिजली नहीं है, तो वहां प्रयोग नहीं होंगे, वहां स्मार्ट क्लासेज नहीं चलेंगी, और अंततः शिक्षा का स्तर गिरेगा। भाजपा सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा के साथ खिलवाड़ का अर्थ है देश की नींव को कमजोर करना। दिल्ली की जनता इस उदासीनता के खिलाफ निरंतर आवाज उठा रही है और सरकार को इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए तुरंत स्कूलों में निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए। बच्चों की पढ़ाई से खिलवाड़ करने का हक किसी को नहीं है, चाहे वह सत्ता में कोई भी क्यों न बैठा हो।