दलित ईसाइयों के SC दर्जे की मांग: 10 अगस्त के जंतर-मंतर प्रदर्शन पर दिल्ली पुलिस लेगी फैसला, हाईकोर्ट ने दिया निर्देश

दलित ईसाइयों के SC दर्जे की मांग: 10 अगस्त के जंतर-मंतर प्रदर्शन पर दिल्ली पुलिस लेगी फैसला, हाईकोर्ट ने दिया निर्देश

 

दलित ईसाइयों को SC दर्जा देने की मांग को लेकर 10 अगस्त को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन पर दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस को शनिवार तक फैसला लेने का निर्देश दिया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली पुलिस को ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी (AIDCRPC) की उस याचिका पर फैसला लेने का निर्देश दिया, जिसमें 10 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित करने की अनुमति मांगी गई है। यह प्रदर्शन दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा देने की मांग को लेकर प्रस्तावित है। न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने मामले का निपटारा करते हुए कहा कि प्रदर्शन की अनुमति देने से जुड़ा कानून-व्यवस्था का पहलू पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से दी गई जानकारी को रिकॉर्ड पर लेते हुए याचिका का निपटारा किया। केंद्र ने अदालत को बताया कि दिल्ली पुलिस प्रदर्शन की अनुमति के आवेदन पर निर्णय लेगी और अपना फैसला शनिवार तक याचिकाकर्ता को बता देगी।

75 लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन की मांगी गई अनुमति

याचिकाकर्ता संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय घोष ने अदालत के समक्ष कहा कि संगठन फिलहाल केवल अपने आवेदन पर दिल्ली पुलिस से निर्णय चाहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित प्रदर्शन करीब 75 लोगों का होगा और यह तीन घंटे तक जंतर-मंतर पर स्थिर एवं शांतिपूर्ण तरीके से आयोजित किया जाएगा। इसमें किसी प्रकार का मार्च या जुलूस शामिल नहीं होगा। वकील ने यह भी कहा कि प्रदर्शन दिल्ली पुलिस के विरोध-प्रदर्शनों से संबंधित स्थायी आदेश में निर्धारित सभी शर्तों का पालन करते हुए किया जाएगा। संगठन का उद्देश्य दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की लंबे समय से चली आ रही मांग को सरकार और संबंधित अधिकारियों के सामने रखना है।

अदालत ने कानून-व्यवस्था को लेकर जताई चिंता

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अमित महाजन ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार मान्य है, लेकिन किसी भी प्रदर्शन से आम जनता को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रदर्शन शहर को बंधक बनाने जैसी स्थिति पैदा नहीं कर सकते। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि आखिरकार प्रदर्शन की अनुमति देने या न देने का फैसला सरकार और संबंधित प्रशासन को करना है। अदालत ने पुलिस को मामले पर विचार करने और कानून के अनुसार उचित निर्णय लेने की जिम्मेदारी दी। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने याचिका पर प्रदर्शन की अनुमति देने के संबंध में स्वयं कोई अंतिम आदेश जारी नहीं किया।

केंद्र ने अनुमति पर तत्काल राहत का किया विरोध

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने याचिका पर तत्काल राहत दिए जाने का विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि प्रदर्शन के लिए स्थानीय अधिकारियों से आवश्यक अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) प्राप्त नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में बनाए रखने के व्यापक मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही विचार चल रहा है। ऐसे में जंतर-मंतर पर किसी भी नए प्रदर्शन की अनुमति देते समय संबंधित प्रशासन को मौजूदा कानूनी और प्रशासनिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा।

स्वतंत्रता दिवस से पहले सुरक्षा व्यवस्था भी अहम

सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से दिल्ली में लागू मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि दिल्ली के कुछ हिस्सों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधात्मक आदेश लागू हैं। यह प्रावधान पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 के रूप में जाना जाता था। इसके अलावा स्वतंत्रता दिवस से पहले दिल्ली में व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए जा रहे हैं। ऐसे में पुलिस को किसी भी सार्वजनिक सभा या प्रदर्शन की अनुमति देने से पहले सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े सभी पहलुओं का आकलन करना होगा।

पुलिस के सामने 75 प्रतिभागियों की संख्या भी चुनौती

जब अदालत को बताया गया कि प्रस्तावित प्रदर्शन में लगभग 75 लोग शामिल होंगे, तब केंद्र की ओर से कहा गया कि प्रशासन पहले से यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि वास्तविक संख्या 75 लोगों तक ही सीमित रहेगी। किसी प्रदर्शन की सूचना मिलने के बाद मौके पर अपेक्षा से अधिक लोगों के पहुंचने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, केंद्र ने अदालत को आश्वासन दिया कि दिल्ली पुलिस संगठन के आवेदन पर विचार करेगी और अगले दिन तक अपना निर्णय उसे सूचित कर देगी।

9 जुलाई को दिया गया था आवेदन

याचिका के अनुसार, ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी ने 9 जुलाई को दिल्ली पुलिस के समक्ष प्रदर्शन की अनुमति के लिए आवेदन किया था। संगठन ने 10 अगस्त को सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित करने की अनुमति मांगी थी। प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में संशोधन कर दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग को प्रमुखता से उठाना है। संगठन का कहना है कि इस मुद्दे को लेकर लंबे समय से मांग उठाई जा रही है और संबंधित पक्षों के सामने इसे शांतिपूर्ण तरीके से रखने का प्रयास किया जा रहा है।

लिखित आदेश नहीं मिलने का आरोप

याचिकाकर्ता संगठन ने आरोप लगाया कि आवेदन देने के बाद उसने कई बार संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन उसे अनुमति के संबंध में कोई लिखित निर्णय नहीं दिया गया। संगठन के अनुसार, 4 अगस्त को उसे मौखिक रूप से बताया गया कि प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जाएगी। हालांकि, इसके संबंध में उसे कोई औपचारिक लिखित आदेश नहीं मिला और न ही किसी वैकल्पिक स्थान का सुझाव दिया गया। इसी वजह से संगठन ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था।

हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर फैसला नहीं दिया

दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान प्रदर्शन की अनुमति देने या रोकने के मुद्दे पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की। अदालत ने केंद्र की ओर से दिए गए आश्वासन को रिकॉर्ड में लेते हुए याचिका का निपटारा कर दिया। अब प्रदर्शन की अनुमति को लेकर अंतिम निर्णय दिल्ली पुलिस के सक्षम अधिकारी को लेना है। पुलिस को कानून, सुरक्षा व्यवस्था, मौजूदा निषेधात्मक आदेश, स्वतंत्रता दिवस से पहले की सुरक्षा तैयारियों और प्रस्तावित प्रदर्शन की प्रकृति समेत सभी प्रासंगिक पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय करना होगा। इस तरह हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब सभी की नजर दिल्ली पुलिस के उस फैसले पर है, जो 10 अगस्त को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित दलित ईसाई प्रदर्शन की अनुमति को लेकर शनिवार तक सामने आ सकता है।

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