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Delhi Bicycle Scam: AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने दावा किया कि ₹7,000 की सरकारी साइकिल करीब ₹4,200 में खरीदी जा सकती है और ₹3,000 प्रति साइकिल कमीशन का आरोप लगाया।
दिल्ली की राजनीति में सरकारी साइकिल खरीद को लेकर विवाद और गहरा गया है। आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने रेखा गुप्ता सरकार पर छात्राओं के लिए खरीदी गई साइकिलों की कीमत को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। सौरभ भारद्वाज ने दावा किया कि जिस साइकिल को दिल्ली सरकार ने करीब ₹7,000 की कीमत पर खरीदा, उसी तरह की साइकिल AAP ने लगभग ₹4,200 में खरीदी है। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों कीमतों के बीच करीब ₹3,000 का अंतर है और यह रकम कथित तौर पर प्रति साइकिल कमीशन के रूप में ‘जेब में’ गई।
सौरभ भारद्वाज ने क्या कहा?
AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए दिल्ली सरकार की साइकिल खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि रेखा गुप्ता सरकार ने जिस साइकिल को करीब ₹7,000 में खरीदा, AAP ने उसी तरह की साइकिल लगभग ₹4,200 में खरीदी।
भारद्वाज ने इसी कीमत अंतर के आधार पर आरोप लगाया कि प्रति साइकिल करीब ₹3,000 का कथित कमीशन लिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब बाजार में समान साइकिल कम कीमत पर उपलब्ध हो सकती है, तो सरकारी खरीद में इतनी अधिक राशि क्यों खर्च की गई।
₹3,000 के अंतर को लेकर AAP का सवाल
AAP का कहना है कि अगर सरकारी खरीद में वास्तव में प्रति साइकिल करीब ₹3,000 का अतिरिक्त भुगतान हुआ है, तो बड़ी संख्या में साइकिलों की खरीद होने पर सरकारी खजाने पर इसका काफी असर पड़ सकता है। पार्टी ने सरकार से खरीद प्रक्रिया, टेंडर, सप्लायर और कीमत तय करने के आधार को सार्वजनिक करने की मांग की है।
सौरभ भारद्वाज ने इस कीमत अंतर को भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा। उनका आरोप है कि सरकारी खरीद में जनता के पैसे का इस्तेमाल पारदर्शी तरीके से होना चाहिए और किसी भी तरह की अनियमितता होने पर उसकी जांच होनी चाहिए।
क्या वाकई एक ही साइकिल की कीमत में ₹3,000 का अंतर है?
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या सरकार द्वारा खरीदी गई साइकिल और AAP द्वारा करीब ₹4,200 में खरीदी गई साइकिल वास्तव में हर मायने में समान हैं। केवल कीमत की तुलना के आधार पर खरीद में भ्रष्टाचार या कमीशन का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
सरकारी खरीद की कीमत में साइकिल के मॉडल, गुणवत्ता, स्पेसिफिकेशन, टैक्स, परिवहन, पैकेजिंग, वितरण, वारंटी और अन्य सेवाओं की लागत शामिल हो सकती है। इसलिए पूरे मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए सरकारी टेंडर और खरीद दस्तावेजों की जांच जरूरी होगी।
छात्राओं की साइकिल खरीद को लेकर बढ़ा सियासी विवाद
छात्राओं के लिए साइकिल उपलब्ध कराने की योजना को लेकर AAP और बीजेपी के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। AAP का आरोप है कि छात्राओं के लिए जरूरी सामान की सरकारी खरीद में कीमतों को लेकर पारदर्शिता होनी चाहिए।
पार्टी ने सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि साइकिल किस कंपनी से खरीदी गई, कितनी संख्या में खरीदी गई, प्रति साइकिल वास्तविक लागत कितनी थी और टेंडर में कौन-कौन सी शर्तें रखी गई थीं। इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही कीमत के अंतर की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
विधानसभा में साइकिल लेकर पहुंच चुके हैं AAP विधायक
रेखा गुप्ता सरकार ने जिस साइकिल को ₹7,000 का खरीदा है उसे हमने लगभग ₹4,200 में खरीदा है।
इसका मतलब कि प्रति साइकिल करीब ₹3,000 का कमीशन खाया है इन लोगों ने।@Saurabh_MLAgk pic.twitter.com/6qY9BKKMTP
— Aam Aadmi Party Delhi (@AAPDelhi) August 10, 2026
इससे पहले AAP विधायक विधानसभा में साइकिल लेकर पहुंचे थे और सरकारी खरीद की कीमत पर सवाल उठाए थे। पार्टी ने दावा किया था कि करीब ₹6,957 की दर से खरीदी गई साइकिल को बाजार में लगभग ₹4,200 में खरीदा जा सकता है। अब सौरभ भारद्वाज ने इसी मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए करीब ₹7,000 और ₹4,200 की कीमत की तुलना करते हुए प्रति साइकिल लगभग ₹3,000 के कथित कमीशन का आरोप लगाया है।
AAP नेताओं का कहना है कि विधानसभा में साइकिल लेकर पहुंचने का उद्देश्य सरकार को यह दिखाना था कि समान वस्तु बाजार में कथित तौर पर कम कीमत पर उपलब्ध है।
सरकार के
सौरभ भारद्वाज के आरोपों के बाद अब सरकार के आधिकारिक जवाब का इंतजार है। यदि सरकार खरीद दस्तावेजों के आधार पर यह स्पष्ट करती है कि ₹7,000 के आसपास की कीमत में अतिरिक्त सुविधाएं, वितरण या अन्य लागत शामिल थीं, तो कीमत का अंतर समझने में मदद मिलेगी।
वहीं, यदि दोनों साइकिलों के मॉडल, गुणवत्ता और खरीद की शर्तें समान होने के बावजूद सरकारी खरीद दर काफी अधिक पाई जाती है, तो मामले में विस्तृत जांच की मांग मजबूत हो सकती है।
फिलहाल ₹3,000 प्रति साइकिल कमीशन का दावा AAP नेता सौरभ भारद्वाज का आरोप है। इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए पूरे मामले में सरकारी दस्तावेज और आधिकारिक जांच सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कीमत का अंतर वास्तविक खरीद लागत, अतिरिक्त सेवाओं या किसी कथित वित्तीय अनियमितता से जुड़ा था।