नई रिसर्च में कॉफी और गट माइक्रोबायोम के बीच संबंध सामने आया है। जानें कैफीन और डिकैफिनेटेड कॉफी आंत, मूड, तनाव और संज्ञानात्मक कार्यों को कैसे प्रभावित कर सकती है।
बहुत से लोगों के लिए सुबह की शुरुआत एक कप कॉफी के बिना अधूरी लगती है। किसी के लिए यह नींद भगाने का जरिया है तो किसी के लिए दिन की शुरुआत का जरूरी हिस्सा। अब यूनिवर्सिटी कॉलेज कॉर्क के APC Microbiome Ireland के शोधकर्ताओं ने कॉफी और शरीर के बीच संबंध को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया है। यह शोध अप्रैल 2026 में Nature Communications में प्रकाशित हुआ। वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि नियमित रूप से कॉफी पीने से आंत में मौजूद सूक्ष्मजीवों यानी गट माइक्रोबायोम पर क्या प्रभाव पड़ता है और इसका मूड, तनाव तथा संज्ञानात्मक कार्यों से किस तरह संबंध हो सकता है।
क्या है माइक्रोबायोटा-गट-ब्रेन एक्सिस?
हमारी आंत और मस्तिष्क को लंबे समय तक शरीर के अलग-अलग हिस्सों के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन वैज्ञानिक शोध ने इनके बीच होने वाले दोतरफा संवाद को काफी महत्वपूर्ण माना है। इसे माइक्रोबायोटा-गट-ब्रेन एक्सिस कहा जाता है। इसमें आंत के सूक्ष्मजीव, उनसे बनने वाले रासायनिक पदार्थ और शरीर की विभिन्न जैविक प्रक्रियाएं मस्तिष्क तथा व्यवहार से जुड़ी हो सकती हैं।
इसी कड़ी को ध्यान में रखते हुए नए अध्ययन में यह जांच की गई कि कॉफी पीने की आदत आंत के माइक्रोबायोम और उससे जुड़े मेटाबोलाइट्स को किस तरह प्रभावित करती है। शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि ये बदलाव तनाव, मूड और याददाश्त जैसे पहलुओं से किस हद तक जुड़े हुए हैं।
62 लोगों पर किया गया अध्ययन
इस शोध में 30 से 50 वर्ष की उम्र के 62 स्वस्थ वयस्क शामिल हुए। इनमें 31 लोग नियमित रूप से कॉफी नहीं पीते थे, जबकि 31 लोग नियमित कॉफी पीने वाले थे और आमतौर पर रोजाना तीन से पांच कप कॉफी का सेवन करते थे। अध्ययन के अगले चरण में नियमित कॉफी पीने वाले प्रतिभागियों को दो सप्ताह तक कॉफी से दूर रखा गया। इसके बाद उन्हें कैफीन वाली या डिकैफिनेटेड कॉफी दी गई और उनके शरीर तथा व्यवहार में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया गया।
इस डिजाइन की खास बात यह थी कि शोधकर्ताओं ने केवल कैफीन के प्रभाव को देखने के बजाय यह समझने की कोशिश की कि कॉफी में मौजूद अन्य घटक भी आंत और शरीर पर असर डाल सकते हैं या नहीं।
कॉफी से गट माइक्रोबायोम में बदलाव
अध्ययन में पाया गया कि कॉफी पीने वालों और कॉफी न पीने वालों के गट माइक्रोबायोम में कुछ अंतर मौजूद थे। कॉफी से जुड़े कुछ विशेष बैक्टीरियल स्ट्रेन की मात्रा में बदलाव देखा गया। जब नियमित कॉफी पीने वालों ने दो सप्ताह के लिए कॉफी छोड़ दी, तो कुछ माइक्रोबियल बदलाव दिखाई दिए और कॉफी दोबारा शुरू करने पर इनमें से कुछ बदलाव फिर नजर आए।
दिलचस्प बात यह रही कि कैफीन वाली और डिकैफिनेटेड कॉफी दोनों को दोबारा शुरू करने पर गट माइक्रोबायोम में कुछ बदलाव देखे गए। इससे संकेत मिलता है कि कॉफी का आंत पर प्रभाव केवल कैफीन की वजह से नहीं हो सकता। हालांकि, इसके पीछे मौजूद जैविक प्रक्रिया को समझने के लिए आगे और शोध की जरूरत है।
मूड और तनाव से भी जुड़ी मिली जानकारी
शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों के मूड, तनाव और व्यवहार से जुड़े कई पहलुओं का भी आकलन किया। अध्ययन में कॉफी पीने वालों में शुरुआत में अधिक इम्पल्सिविटी और भावनात्मक प्रतिक्रिया देखी गई, जबकि कॉफी छोड़ने और फिर दोबारा शुरू करने के दौरान इन मापदंडों में बदलाव आए।
कैफीन वाली कॉफी के सेवन के बाद चिंता और मनोवैज्ञानिक तनाव से जुड़े कुछ मापदंडों में कमी देखी गई। वहीं डिकैफिनेटेड कॉफी लेने वाले प्रतिभागियों में नींद की गुणवत्ता, शारीरिक गतिविधि और कुछ स्मृति परीक्षणों में सुधार दर्ज किया गया। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि इन परिणामों की व्याख्या सावधानी से करनी चाहिए और कुछ बदलावों पर अन्य कारकों का प्रभाव हो सकता है।
क्या कॉफी याददाश्त और दिमाग के लिए फायदेमंद है?
अध्ययन के निष्कर्षों से यह कहना जल्दबाजी होगी कि कॉफी हर व्यक्ति की याददाश्त या मानसिक क्षमता को बेहतर बनाती है। शोध में डिकैफिनेटेड कॉफी लेने वाले समूह में कुछ मेमोरी टेस्ट में सुधार देखा गया, जबकि कैफीन वाली कॉफी के साथ कुछ अलग संज्ञानात्मक बदलाव सामने आए। शोधकर्ताओं ने संभावित कारणों में नींद और शारीरिक गतिविधि जैसे कारकों की भूमिका पर भी चर्चा की।
इसलिए इस अध्ययन को कॉफी को किसी बीमारी के इलाज या निश्चित मानसिक स्वास्थ्य उपाय के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यह मुख्य रूप से कॉफी, गट माइक्रोबायोम और मस्तिष्क से जुड़े संभावित संबंधों को समझने की दिशा में किया गया शोध है।