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बच्चों और नॉन-स्मोकर्स में लंग कैंसर के बढ़ते मामले: पैसिव स्मोकिंग, प्रदूषण, जेनेटिक बदलाव और रेडॉन गैस जैसे कारणों से फेफड़ों का कैंसर कैसे होता है और शुरुआती चेतावनी संकेत क्या हैं।
अक्सर लोग सोचते हैं कि लंग कैंसर केवल उन लोगों को होता है जो सिगरेट पीते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि बच्चों और नॉन-स्मोकर्स में भी फेफड़ों का कैंसर बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, करीब 25% लंग कैंसर के मरीज वे होते हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। इसलिए यह समझना बेहद जरूरी है कि नॉन-स्मोकर्स और बच्चों में यह बीमारी क्यों हो रही है।
पैसिव स्मोकिंग का खतरा
भले ही बच्चे सिगरेट न पीते हों, लेकिन अगर वे धूम्रपान करने वालों के पास रहते हैं, तो फेफड़ों पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है। घर या सार्वजनिक जगहों पर धुएं के संपर्क में आने से कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) की रिसर्च बताती है कि पैसिव स्मोकिंग नॉन-स्मोकर्स में लंग कैंसर का खतरा 20–30% तक बढ़ा सकती है।
वायु प्रदूषण
शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण एक बड़ा स्वास्थ्य खतरा बन चुका है। वाहन धुआं, फैक्ट्री के हानिकारक धुएं और निर्माण कार्यों से उड़ती धूल लंबे समय तक फेफड़ों में जमा होकर कोशिकाओं में बदलाव ला सकती है, जिससे कैंसर का जोखिम बढ़ता है।
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जेनेटिक और हार्मोनल कारण
कुछ बच्चों में लंग कैंसर का कारण जेनेटिक म्यूटेशन भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, EGFR जैसे जीन म्यूटेशन कैंसर सेल्स को तेजी से बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। जिन परिवारों में पहले कैंसर का इतिहास रहा हो, उनमें जोखिम और अधिक होता है।
इसके अलावा, हार्मोनल बदलाव भी लंग कैंसर के खतरे को प्रभावित कर सकते हैं। खासकर लड़कियों में हार्मोनल कारण कैंसर सेल्स की वृद्धि को बढ़ावा दे सकते हैं।
रेडॉन गैस का प्रभाव
रेडॉन एक रेडियोएक्टिव गैस है जो जमीन और चट्टानों से निकलती है। खराब वेंटिलेशन वाले घरों में यह गैस जमा हो सकती है। लंबे समय तक रेडॉन के संपर्क में रहने से नॉन-स्मोकर्स में भी लंग कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
शुरुआती चेतावनी संकेत
कैंसर इम्यूनोथेरेपी के विशेषज्ञ डॉ. तरंग कृष्णा के अनुसार, फेफड़ों का कैंसर अक्सर देर से पता चलता है। शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। समय पर पहचान और इलाज से बीमारी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।
शोध और तथ्य
2022 में लैंसेट में प्रकाशित एक स्टडी में पाया गया कि लंबे समय तक PM2.5 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक कणों के संपर्क में रहने से नॉन-स्मोकर्स में नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। यह विशेष रूप से शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में देखा गया है। भारत के कई बड़े शहर, जैसे दिल्ली, बेंगलुरु और नोएड़ा, विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों से अधिक प्रदूषण स्तर रखते हैं, जिससे फेफड़ों पर गंभीर असर पड़ता है।