भारत में सर्वाइकल कैंसर का खतरा गंभीर है। जानें HPV संक्रमण से इसका संबंध, शुरुआती चेतावनी संकेत, स्क्रीनिंग, HPV वैक्सीन और बचाव के जरूरी उपाय।
सर्वाइकल कैंसर यानी गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्याओं में शामिल है। भारत में हर साल बड़ी संख्या में महिलाएं इस बीमारी से प्रभावित होती हैं और कई मामलों में इसका पता बीमारी के आगे बढ़ जाने के बाद चलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत में सर्वाइकल कैंसर का बोझ अभी भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। उपलब्ध GLOBOCAN 2024 आंकड़ों के अनुसार, 2024 में भारत में सर्वाइकल कैंसर के 79,360 नए मामले और 36,319 मौतें दर्ज की गईं। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार सर्वाइकल कैंसर उन कैंसर में शामिल है जिन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है या शुरुआती चरण में पहचानकर प्रभावी उपचार किया जा सकता है।
क्यों है सर्वाइकल कैंसर चिंता का विषय?
सर्वाइकल कैंसर गर्भाशय के निचले हिस्से यानी गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं में विकसित होता है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बीमारी की शुरुआती अवस्था में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। कई महिलाओं को सामान्य जीवन में किसी तरह की परेशानी महसूस नहीं होती और वे पूरी तरह स्वस्थ महसूस कर सकती हैं। यही वजह है कि नियमित जांच न होने पर बीमारी का पता देर से लग सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, सर्वाइकल कैंसर आमतौर पर अचानक विकसित नहीं होता। ज्यादातर मामलों में गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं में बदलाव कई वर्षों के दौरान धीरे-धीरे विकसित होते हैं। समय रहते इन बदलावों की पहचान की जाए तो कैंसर बनने से पहले ही उपचार या निगरानी के जरिए जोखिम को कम किया जा सकता है।
HPV संक्रमण से जुड़ा है अधिकांश जोखिम
सर्वाइकल कैंसर के अधिकांश मामलों का संबंध हाई-रिस्क ह्यूमन पैपिलोमावायरस यानी HPV के लंबे समय तक बने रहने वाले संक्रमण से होता है। HPV एक बेहद सामान्य वायरस है और इसके कई प्रकार होते हैं। अधिकांश HPV संक्रमण शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की मदद से समय के साथ समाप्त हो जाते हैं, लेकिन कुछ हाई-रिस्क प्रकार लंबे समय तक बने रह सकते हैं।
लगातार बने रहने वाला हाई-रिस्क HPV संक्रमण गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं में असामान्य बदलाव पैदा कर सकता है। यदि इन बदलावों की पहचान और उपचार समय पर न हो, तो कुछ मामलों में वर्षों बाद सर्वाइकल कैंसर विकसित हो सकता है।
शुरुआती अवस्था में क्यों नहीं दिखते लक्षण?
सर्वाइकल कैंसर से पहले होने वाले प्रीकैंसरस बदलाव आमतौर पर किसी विशेष लक्षण का कारण नहीं बनते। यही कारण है कि केवल शरीर में किसी परेशानी के दिखाई देने का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है। नियमित स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि जांच के जरिए उन बदलावों का पता लगाया जा सकता है जो अभी कैंसर में परिवर्तित नहीं हुए हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, बीमारी की शुरुआती अवस्था में महिला को कोई दर्द या असामान्य स्वास्थ्य समस्या महसूस न होना आम बात है। इसलिए उम्र, व्यक्तिगत जोखिम और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार स्क्रीनिंग कराना बेहद महत्वपूर्ण है।
किन लक्षणों पर तुरंत ध्यान दें?
जब सर्वाइकल कैंसर आगे बढ़ने लगता है, तो कुछ चेतावनी संकेत सामने आ सकते हैं। इनमें सामान्य पीरियड्स के बीच असामान्य रक्तस्राव, संभोग के बाद ब्लीडिंग, मेनोपॉज के बाद रक्तस्राव और सामान्य से अधिक या असामान्य योनि स्राव शामिल हो सकते हैं।
कुछ महिलाओं में लगातार पेल्विक दर्द, कमर दर्द या संभोग के दौरान दर्द भी महसूस हो सकता है। बीमारी के अधिक बढ़ने पर पेशाब या मल त्याग से जुड़ी समस्याएं, पैरों में सूजन, अत्यधिक कमजोरी या वजन कम होने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
हालांकि, इन लक्षणों का मतलब हमेशा सर्वाइकल कैंसर नहीं होता। कई अन्य सामान्य स्त्री रोग संबंधी समस्याएं भी ऐसे लक्षण पैदा कर सकती हैं। लेकिन असामान्य या लगातार बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
HPV वैक्सीन से कम हो सकता है जोखिम
सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम में HPV वैक्सीन महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वैक्सीन HPV के उन प्रकारों से सुरक्षा प्रदान करने में मदद करती है जो सर्वाइकल कैंसर के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। टीकाकरण के संबंध में सही उम्र, डोज और व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
यह भी समझना महत्वपूर्ण है कि HPV वैक्सीन स्क्रीनिंग का विकल्प नहीं है। टीकाकरण के बाद भी चिकित्सकीय दिशानिर्देशों के अनुसार नियमित सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग आवश्यक हो सकती है।
स्क्रीनिंग क्यों है जरूरी?
सर्वाइकल कैंसर से बचाव का एक महत्वपूर्ण तरीका नियमित स्क्रीनिंग है। स्क्रीनिंग का उद्देश्य कैंसर बनने से पहले गर्भाशय ग्रीवा में मौजूद असामान्य कोशिकीय बदलावों या HPV संक्रमण की पहचान करना है। उपलब्ध स्क्रीनिंग विकल्पों में HPV टेस्ट, पैप टेस्ट या डॉक्टर द्वारा सुझाए गए अन्य परीक्षण शामिल हो सकते हैं।
किस महिला को किस उम्र में और कितनी बार स्क्रीनिंग करानी चाहिए, यह स्थानीय दिशानिर्देशों, उम्र और व्यक्तिगत स्वास्थ्य जोखिमों पर निर्भर करता है। इसलिए स्त्री रोग विशेषज्ञ से व्यक्तिगत सलाह लेना बेहतर है।
इलाज समय पर हो तो बेहतर परिणाम संभव
अगर सर्वाइकल कैंसर का पता शुरुआती चरण में चल जाता है, तो उपचार के विकल्प और बीमारी पर नियंत्रण की संभावना बेहतर हो सकती है। उपचार बीमारी के चरण और मरीज की स्थिति के आधार पर सर्जरी, रेडिएशन, कीमोथेरेपी या अन्य आधुनिक उपचारों में से एक या इनके संयोजन के रूप में किया जा सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि असामान्य लक्षणों को शर्म या झिझक के कारण छिपाया न जाए। समय पर जांच और सही चिकित्सा सलाह बीमारी की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
रोकथाम के लिए जागरूकता जरूरी
सर्वाइकल कैंसर के मामले में जागरूकता, HPV से बचाव, टीकाकरण, नियमित स्क्रीनिंग और समय पर उपचार बेहद महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि बीमारी लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के विकसित हो सकती है, इसलिए केवल लक्षणों का इंतजार करना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
महिलाओं को अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए डॉक्टर से नियमित जांच और स्क्रीनिंग के बारे में चर्चा करनी चाहिए। खासकर यदि असामान्य रक्तस्राव, असामान्य योनि स्राव या लगातार पेल्विक दर्द जैसे लक्षण दिखाई दें, तो चिकित्सकीय सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए। सर्वाइकल कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती इसकी चुपचाप शुरुआत है, लेकिन यही वह बीमारी भी है जिसमें रोकथाम और शुरुआती पहचान के जरिए गंभीर परिणामों के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।