ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर भारत ने अपनी कूटनीतिक ताकत और रणनीतिक स्वायत्तता का प्रदर्शन किया। चीन समेत अलग-अलग देशों को एक मंच पर लाने में भारत की भूमिका अहम रही।
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए केवल एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन की मेजबानी करने का अवसर नहीं था, बल्कि यह उसकी बढ़ती कूटनीतिक क्षमता को प्रदर्शित करने वाला मंच भी साबित हुआ। भारत ने ऐसे समय में ब्रिक्स देशों को एक साथ लाने में सफलता हासिल की, जब दुनिया कई तरह के भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितताओं और रणनीतिक प्रतिस्पर्धाओं से गुजर रही है। सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि भारत ने अलग-अलग हितों और गहरे मतभेद रखने वाले देशों को एक साझा मंच पर बैठाया और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को भी कायम रखा। चीन, रूस, ईरान, खाड़ी देशों, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और अन्य देशों की मौजूदगी ने यह स्पष्ट किया कि भारत आज वैश्विक कूटनीति में केवल किसी एक धड़े के साथ खड़े होने के बजाय कई अलग-अलग साझेदारियों को एक साथ आगे बढ़ाने की क्षमता रखता है।
ब्रिक्स की मेजबानी भारत के लिए क्यों है बड़ी उपलब्धि?
ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि भारत ने एक सफल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया। इसका वास्तविक महत्व भारत की उस क्षमता में है, जिसके तहत वह अलग-अलग राजनीतिक और रणनीतिक सोच वाले देशों के साथ संवाद कायम रख सकता है। एक तरफ भारत अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत कर रहा है और क्वाड का हिस्सा है, वहीं दूसरी ओर रूस के साथ लंबे समय से चले आ रहे संबंधों को भी बनाए हुए है। भारत चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और मतभेदों के बावजूद बातचीत का रास्ता खुला रखता है। इसके अलावा ईरान और खाड़ी देशों के साथ भी भारत के महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं। साथ ही भारत ग्लोबल साउथ के देशों की चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठाता रहा है। इन सभी रिश्तों को एक साथ आगे बढ़ाना भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की एक बड़ी मिसाल है।
बदलती दुनिया में भारत की संतुलित कूटनीति
आज की वैश्विक व्यवस्था पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो चुकी है। अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव, पश्चिम एशिया में अस्थिरता और वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों ने देशों के लिए विदेश नीति को अधिक कठिन बना दिया है। ऐसे माहौल में भारत किसी एक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग देशों के साथ संबंध विकसित कर रहा है। इसे केवल संतुलन साधने की नीति के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। भारत की रणनीति इस विचार पर आधारित दिखाई देती है कि अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग साझेदारियों को आगे बढ़ाया जा सकता है। यही वजह है कि भारत अमेरिका के साथ तकनीक, रक्षा और व्यापार में सहयोग करता है, रूस के साथ ऊर्जा और रणनीतिक संबंध बनाए रखता है और चीन के साथ मतभेदों के बावजूद संवाद जारी रखता है।
शी जिनपिंग की भारत यात्रा ने बढ़ाया महत्व
ब्रिक्स सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी ने इस पूरे घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना दिया। वर्ष 2019 के बाद उनकी भारत यात्रा को दोनों देशों के संबंधों के संदर्भ में विशेष महत्व मिला। हालांकि इस यात्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा शी जिनपिंग के बीच बातचीत को भारत-चीन संबंधों में पूरी तरह नए दौर की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद अभी भी मौजूद है और रणनीतिक अविश्वास पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसके अलावा एशिया में प्रभाव बढ़ाने को लेकर दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा भी जारी है। फिर भी कूटनीति में हर प्रगति किसी बड़े समझौते के रूप में सामने नहीं आती। कई बार बातचीत की बहाली और संवाद के लिए मंच उपलब्ध होना ही महत्वपूर्ण शुरुआत होती है।
भारत-चीन संबंधों के लिए ब्रिक्स बना उपयोगी मंच
ब्रिक्स ने भारत और चीन को ऐसे समय में बातचीत का अवसर दिया, जब दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं। दोनों पक्षों के बीच सीमा पर शांति और स्थिरता, व्यापार असंतुलन, कारोबारी संबंधों और दोनों देशों के नागरिकों के बीच संपर्क बढ़ाने जैसे मुद्दों पर चर्चा की गुंजाइश बनी। भारत के लिए चीन के साथ संबंधों को पूरी तरह नजरअंदाज करना संभव नहीं है। दोनों देश बड़े पड़ोसी होने के साथ-साथ महत्वपूर्ण आर्थिक और क्षेत्रीय शक्तियां भी हैं। दूसरी तरफ भारत यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि सीमा से जुड़े मतभेद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा द्विपक्षीय संबंधों के हर क्षेत्र पर हावी न हो जाएं। ऐसे में ब्रिक्स जैसा बहुपक्षीय मंच संवाद को बनाए रखने में उपयोगी भूमिका निभा सकता है।
मतभेदों के बावजूद संयुक्त घोषणा महत्वपूर्ण
विस्तारित ब्रिक्स समूह की विविधता अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। अलग-अलग देशों की विदेश नीति, आर्थिक प्राथमिकताएं और रणनीतिक हित एक-दूसरे से काफी अलग हैं। इसके बावजूद सम्मेलन में संयुक्त घोषणा जारी होना एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा सकती है। इससे संकेत मिलता है कि मतभेदों के बावजूद साझा हितों वाले मुद्दों पर सहमति बनाई जा सकती है। भारत ने इस प्रक्रिया में केवल एक सदस्य देश के रूप में हिस्सा नहीं लिया, बल्कि मेजबान देश होने के नाते एजेंडा तय करने और संवाद के लिए वातावरण तैयार करने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने का अवसर
भारत लंबे समय से विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की चिंताओं को वैश्विक मंचों पर प्रमुखता देने की कोशिश करता रहा है। ब्रिक्स इस प्रयास के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है, क्योंकि इसके सदस्य देशों का आर्थिक और भौगोलिक प्रभाव काफी व्यापक है। विकास, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार तथा विकासशील देशों की भागीदारी जैसे मुद्दों पर भारत अपनी भूमिका को और मजबूत कर सकता है। ब्रिक्स की विविधता भारत को यह अवसर देती है कि वह विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों के साथ संवाद करते हुए साझा हितों की पहचान करे।
भारत के लिए आगे की राह
ब्रिक्स सम्मेलन से भारत को सबसे बड़ा लाभ यह मिला है कि उसने अपनी कूटनीतिक पहुंच और रणनीतिक स्वायत्तता को एक साथ प्रदर्शित किया। चीन के साथ बातचीत जारी रखते हुए अमेरिका और क्वाड के साथ सहयोग, रूस के साथ संबंध, खाड़ी देशों के साथ साझेदारी और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती देना बताता है कि भारत की विदेश नीति अब किसी एक रिश्ते या खेमे तक सीमित नहीं है। हालांकि, इन सभी संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा। भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार रणनीति तैयार करनी होगी। ब्रिक्स सम्मेलन ने कम से कम इतना जरूर दिखा दिया है कि भारत केवल बदलती विश्व व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनना चाहता, बल्कि वह इस व्यवस्था को आकार देने वाली प्रमुख शक्तियों में अपनी भूमिका मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।