BRICS Summit 2026: नई दिल्ली डिक्लेरेशन भारत की शानदार कूटनीतिक जीत, एक्सपर्ट्स ने बताई बड़ी उपलब्धि

BRICS Summit 2026: नई दिल्ली डिक्लेरेशन भारत की शानदार कूटनीतिक जीत, एक्सपर्ट्स ने बताई बड़ी उपलब्धि

 

BRICS Summit 2026 में जारी नई दिल्ली डिक्लेरेशन को विशेषज्ञों ने भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया। जानें कैसे भारत ने मतभेदों के बावजूद BRICS देशों को साझा सहमति पर लाया।

नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय BRICS सम्मेलन के समापन के बाद रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत कई देशों के प्रतिनिधि अपने-अपने देश लौटने की तैयारी में हैं। सम्मेलन के दौरान जारी हुई नई दिल्ली डिक्लेरेशन को लेकर अब विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अलग-अलग सदस्य देशों के बीच मौजूद राजनीतिक मतभेदों, रणनीतिक हितों और जियोपॉलिटिकल विरोधाभासों के बावजूद संयुक्त घोषणा पर सहमति बनाना भारत की कूटनीतिक क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण है। उनके मुताबिक, भारत ने BRICS के विस्तारित और विविध स्वरूप को चुनौती के बजाय अवसर में बदलने की कोशिश की और सदस्य देशों को साझा न्यूनतम सहमति के आधार पर एक मंच पर लाने में सफलता हासिल की। यही वजह है कि नई दिल्ली डिक्लेरेशन को भारत की बहुपक्षीय कूटनीति के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

भारतीय डिप्लोमेसी के लिए शानदार नतीजा

ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के जिंदल स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स के डीन प्रोफेसर (डॉ.) श्रीराम चौलिया ने BRICS सम्मेलन के नतीजे को भारतीय कूटनीति और बहुपक्षीय जुड़ाव के लिए शानदार सफलता बताया। उनके अनुसार, सम्मेलन ने यह साबित किया कि भारत अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा और राष्ट्रीय हित रखने वाले देशों के बीच संवाद का रास्ता तैयार कर सकता है। BRICS में शामिल देशों के बीच कई मुद्दों पर स्पष्ट मतभेद हैं, लेकिन इसके बावजूद साझा घोषणा पर सहमति बनना भारत की बातचीत और समन्वय क्षमता को दर्शाता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत सभी सदस्य देशों को एक साझा न्यूनतम सहमति यानी कॉमन डिनॉमिनेटर पर लाने में सक्षम रहा।

BRICS की विविधता को कमजोरी नहीं बनने दिया

BRICS के विस्तार के साथ यह आशंका भी जताई जाती रही है कि नए देशों के जुड़ने से समूह के भीतर मतभेद और बढ़ सकते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले देशों के आर्थिक हित, विदेश नीति और रणनीतिक प्राथमिकताएं एक-दूसरे से काफी अलग हैं। ऐसे में किसी एक संयुक्त दस्तावेज पर सभी की सहमति हासिल करना आसान नहीं माना जाता। प्रोफेसर चौलिया के मुताबिक, भारत ने इस विविधता को कमजोरी बनने देने के बजाय उसे ताकत में बदलने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर समूह के विस्तार के साथ मतभेद और विभाजन बढ़ने की संभावना रहती है, लेकिन नई दिल्ली में भारत ने अलग-अलग विचार रखने वाले देशों को एक साझा मंच पर लाने की क्षमता दिखाई। खासकर विवादित भू-राजनीतिक मुद्दों पर यह भूमिका महत्वपूर्ण रही।

बंटी हुई दुनिया में सहयोग का रास्ता

विशेषज्ञों के अनुसार, नई दिल्ली डिक्लेरेशन की एक अहम विशेषता यह है कि इसमें युद्ध, अंतरराष्ट्रीय तनाव और विवादित वैश्विक मुद्दों के बीच सहयोग की संभावनाओं पर जोर दिया गया है। दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष और तनाव जारी हैं और प्रमुख शक्तियों के बीच मतभेद भी बढ़े हैं। ऐसे समय में BRICS जैसे बहुपक्षीय समूह में साझा घोषणा पर सहमति बनना आसान नहीं था। चौलिया के मुताबिक, भारत ने अपनी नेतृत्व क्षमता के जरिए यह दिखाने की कोशिश की कि अत्यधिक विभाजित वैश्विक माहौल में भी सहयोग के लिए कुछ साझा आधार तैयार किया जा सकता है। यह भारत की बहुपक्षीय कूटनीति के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS अब पहले की तुलना में अधिक विविध समूह बन चुका है।

आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून पर भी चर्चा

यूरोपियन प्रेस फेडरेशन के पत्रकार मार्को एल्पेगियानी ने नई दिल्ली डिक्लेरेशन में आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़े मुद्दों को महत्वपूर्ण बताया। उनके मुताबिक, आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट चर्चा और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन की आवश्यकता पर जोर दिया जाना महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में किसी भी तरह के आतंकवाद का विरोध किया जाना चाहिए और नियमों तथा कानूनों का पालन सभी देशों और संगठनों के लिए जरूरी है। उनके अनुसार, डिक्लेरेशन में आतंकवाद से जुड़े मुद्दों को व्यापक संदर्भ में देखने की कोशिश की गई है। यह चर्चा ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हिंसा, संघर्ष और सुरक्षा चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं।

युद्ध और वैश्विक स्थिरता पर जोर

दक्षिण अफ्रीका के पत्रकार सियाबोंगा गुडमैन माडोंडो ने कहा कि BRICS देशों के लिए संयुक्त घोषणा पर पहुंचना जरूरी था। उनके अनुसार, 45 पेज के इस दस्तावेज में कई ऐसे मुद्दों को शामिल किया गया है, जिनका संबंध वैश्विक स्थिरता और सुरक्षा से है। उन्होंने विशेष रूप से ईरान और मध्य पूर्व में जारी संघर्षों का उल्लेख किया। उनका कहना है कि BRICS देशों को इन संघर्षों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभावों को समझने की जरूरत है, क्योंकि क्षेत्रीय युद्धों का असर केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होती है। उन्होंने सुरक्षित अफ्रीका और सुरक्षित दुनिया के लिए सामूहिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

मानव तस्करी और मानवाधिकार भी बने मुद्दे

BRICS सम्मेलन में मानव तस्करी जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। माडोंडो के अनुसार, मानव तस्करी जैसी समस्याओं का सीधा संबंध मानवाधिकारों से है और इनका समाधान वैश्विक स्तर पर सहयोग के बिना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि देशों को आर्थिक विकास के साथ-साथ अपने समाजों में स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी काम करना होगा। अफ्रीका और दुनिया के अन्य हिस्सों में निवेश बढ़ाने तथा रोजगार और आर्थिक अवसर पैदा करने की आवश्यकता पर भी उन्होंने जोर दिया। उनके मुताबिक, केवल घोषणा जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसमें शामिल बिंदुओं को जमीन पर लागू करने के लिए ठोस प्रयास जरूरी होंगे।

अब असली चुनौती डिक्लेरेशन के अमल की

विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि नई दिल्ली डिक्लेरेशन को सफल बनाने की असली चुनौती अब इसके क्रियान्वयन की होगी। माडोंडो ने इसे एक ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ बताते हुए कहा कि दस्तावेज में कई महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं, लेकिन उन्हें लागू करने की कोई निश्चित समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं है। ऐसे में सदस्य देशों को घोषणा में व्यक्त प्रतिबद्धताओं को वास्तविक नीतियों और कार्य योजनाओं में बदलना होगा। कुल मिलाकर, नई दिल्ली BRICS सम्मेलन ने भारत को अपनी बहुपक्षीय कूटनीति और नेतृत्व क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर दिया है। अलग-अलग हितों वाले देशों को एक संयुक्त घोषणा पर सहमत कराना भारत की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। अब इस सफलता को दीर्घकालिक प्रभाव में बदलने के लिए डिक्लेरेशन में तय प्राथमिकताओं पर लगातार काम करना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

 

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