असम में जनगणना 2027 की तैयारी: भारत की पहली डिजिटल जनगणना की पूरी जानकारी

असम में जनगणना 2027 की तैयारी: भारत की पहली डिजिटल जनगणना की पूरी जानकारी

 

असम में जनगणना 2027 की तैयारियों के लिए राज्य-स्तरीय सम्मेलन आयोजित। जानें डिजिटल जनगणना के चरण, महत्वपूर्ण तिथियाँ और इसके महत्व के बारे में।

हाल ही में गुवाहाटी में असम सरकार द्वारा एक महत्वपूर्ण राज्य-स्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत की पहली डिजिटल जनगणना—’जनगणना 2027’—की तैयारियों की समीक्षा करना था। असम प्रशासनिक स्टाफ कॉलेज में आयोजित इस सम्मेलन की अध्यक्षता असम के मुख्य सचिव रवि कोटा ने की। यह आयोजन राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग और भारत सरकार के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ, जिसमें जिला आयुक्तों, नगर आयुक्तों और प्रधान जनगणना अधिकारियों ने भाग लिया।

जनगणना 2027: भारत की पहली डिजिटल पहल

भारत के लिए जनगणना 2027 एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है क्योंकि यह देश की पहली पूर्णतः डिजिटल जनगणना अभ्यास होगी। इस विशाल कार्य को दो चरणों में विभाजित किया गया है: पहला चरण ‘हाउस-लिस्टिंग और हाउसिंग सेंसस’ (HLO) है, और दूसरा ‘जनसंख्या गणना’ (Population Enumeration – PE) है। सम्मेलन में मुख्य रूप से पहले चरण की तैयारियों पर चर्चा की गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, असम में इस पहले चरण के संचालन के लिए लगभग 83,535 प्रगणकों (Enumerators) और पर्यवेक्षकों की तैनाती की जाएगी, जो घर-घर जाकर डेटा एकत्र करेंगे।

चरणबद्ध कार्ययोजना और महत्वपूर्ण तिथियाँ

असम सरकार ने जनगणना के प्रथम चरण के लिए एक स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित की है। राज्य में हाउस-लिस्टिंग और हाउसिंग सेंसस का कार्य 17 अगस्त 2026 से शुरू होकर 15 सितंबर 2026 तक चलेगा। इससे पहले, नागरिकों को अपनी जानकारी स्वयं दर्ज करने की सुविधा देने के लिए आधिकारिक पोर्टल पर ‘सेल्फ-एन्यूमरेशन’ (स्व-गणना) की सुविधा 2 अगस्त से 16 अगस्त 2026 तक उपलब्ध रहेगी। भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण ने स्पष्ट किया कि पहले चरण को 30 सितंबर 2026 तक पूरा करना अनिवार्य है, जिसके बाद फरवरी 2027 में जनगणना का दूसरा चरण शुरू किया जाएगा।

प्रशासनिक समन्वय और प्रशिक्षण पर जोर

असम के मुख्य सचिव रवि कोटा ने इस प्रक्रिया की सफलता के लिए प्रशासनिक समन्वय और जन-भागीदारी को अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि जनगणना केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि एक राष्ट्र-निर्माण का कार्य है। सम्मेलन के दौरान प्रधान जनगणना अधिकारी बिस्वजीत पेगु ने बताया कि पूरा दिन प्रशिक्षण रणनीतियों और लॉजिस्टिक व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने पर केंद्रित रहा। जिला स्तर से लेकर स्वायत्त परिषदों तक के अधिकारियों को इस बात का प्रशिक्षण दिया जाएगा कि डिजिटल उपकरणों का उपयोग करते हुए डेटा की शुद्धता कैसे सुनिश्चित की जाए। मास्टर ट्रेनर्स के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम 9 जून से 12 जून तक निर्धारित हैं, जबकि फील्ड ट्रेनर्स का प्रशिक्षण जून के तीसरे सप्ताह में शुरू हो जाएगा।

विकास योजनाओं के लिए डेटा का महत्व

इस पहले चरण में घरों की स्थिति, आवासीय सुविधाओं, संपत्तियों और बुनियादी ढांचे से संबंधित डेटा एकत्र किया जाएगा। यह डेटा केंद्र और राज्य सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों, जनजातीय इलाकों और चाय बागानों जैसे दुर्गम क्षेत्रों के विकास की योजना बनाने में। बेहतर पेयजल, स्वच्छता, बिजली और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसी सुविधाओं का विस्तार करने के लिए सटीक डेटा एक आधार स्तंभ का कार्य करेगा।

जन-जागरूकता और डिजिटल बुनियादी ढांचा

सम्मेलन का समापन परिचालन रणनीति, डिजिटल बुनियादी ढांचे और व्यापक जन-जागरूकता अभियानों पर चर्चा के साथ हुआ। जनगणना को पूरी तरह डिजिटल बनाने के पीछे सरकार का मुख्य उद्देश्य डेटा में पारदर्शिता लाना और मानवीय त्रुटियों को कम करना है। यह पूरी प्रक्रिया भारत के भविष्य के सामाजिक-आर्थिक विकास की नींव रखेगी। आने वाले समय में, यह डिजिटल डेटाबेस नीति निर्माताओं को समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की योजनाओं को पहुँचाने में एक अचूक माध्यम प्रदान करेगा।

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