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आलिया भट्ट की कान फिल्म फेस्टिवल और फिल्म ‘अल्फा’ को लेकर हो रही ट्रोलिंग के पीछे की सच्चाई क्या है? जानिए बॉलीवुड में पेड नेगेटिव पब्लिसिटी और स्मीयर कैंपेन का पूरा विश्लेषण।
बॉलीवुड में इन दिनों ‘पेड नेगेटिव पब्लिसिटी’ और सुनियोजित स्मीयर कैंपेन (Smear Campaign) की चर्चा एक बार फिर से गरमा गई है। इस पूरी बहस के केंद्र में अभिनेत्री आलिया भट्ट हैं, जो हाल ही में कान फिल्म फेस्टिवल (Cannes Film Festival) में अपनी उपस्थिति को लेकर सोशल मीडिया पर निरंतर चर्चा का विषय बनी रहीं। कान जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करना एक सम्मान की बात होती है, लेकिन आलिया के लिए यह अनुभव बेहद कड़वा रहा। रेड कार्पेट पर उनके जाने और वहां पैपराजी द्वारा उन्हें ‘नोटिस’ न किए जाने की बातों को लेकर सोशल मीडिया पर एक सुनियोजित ट्रोलिंग अभियान चलाया गया। यह ट्रोलिंग इतनी तीखी थी कि मानो किसी ने पहले से ही उनकी छवि को नुकसान पहुँचाने का मन बना लिया हो।
सोशल मीडिया का दोहरा चेहरा और सेलिब्रिटी का बचाव
सोशल मीडिया अक्सर दो धारी तलवार की तरह काम करता है। जहाँ एक ओर कुछ लोग केवल नफरत फैलाने के लिए सक्रिय रहते हैं, वहीं दूसरी ओर बॉलीवुड के कई साथी कलाकार आलिया के बचाव में खुलकर सामने आए। कई हस्तियों ने सोशल मीडिया पर उन लोगों की जमकर आलोचना की जो विश्व मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाली एक भारतीय अभिनेत्री को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे थे। इन समर्थकों का मानना था कि किसी की मेहनत का मजाक उड़ाना न केवल संवेदनहीनता है, बल्कि यह देश की वैश्विक छवि को भी नुकसान पहुँचाता है। यह समर्थन इस बात का प्रमाण था कि इंडस्ट्री का एक बड़ा वर्ग अब इस तरह की नकारात्मकता और ‘पेड कैंपेन’ के खिलाफ एकजुट हो रहा है।
‘अल्फा’ टीजर और नकारात्मकता का नया दौर
आलिया भट्ट की ट्रोलिंग का सिलसिला यहीं नहीं थमा। मामला तब और गंभीर हो गया जब उनकी आने वाली फिल्म ‘अल्फा’ का टीजर रिलीज हुआ। टीजर के सामने आते ही उन्हें एक बार फिर से सोशल मीडिया पर निशाना बनाया गया। इस बार उनके अभिनय और लुक को लेकर असंवेदनशील मजाक उड़ाए गए। आलोचकों और ट्रोलर्स ने टीजर को आधार बनाकर उनकी कार्यक्षमता पर सवाल उठाए, जो काफी हद तक एक सुनियोजित नकारात्मकता की ओर इशारा करता है। यह देखना कष्टकारी है कि कैसे किसी कलाकार की रचनात्मक यात्रा को इस तरह की नकारात्मकता में उलझा दिया जाता है।
पेड नेगेटिव पब्लिसिटी का काला सच
बॉलीवुड में ‘पेड नेगेटिव पब्लिसिटी’ कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसका स्तर अब काफी गिर चुका है। आज के डिजिटल युग में, PR फर्मों और बॉट्स (Bots) के जरिए किसी भी सेलिब्रिटी के खिलाफ माहौल बनाया जा सकता है। आलिया भट्ट जैसे सफल कलाकार को निशाना बनाना इस बात का संकेत है कि अब लक्ष्य केवल असफलता नहीं, बल्कि किसी की साख (Reputation) को खत्म करना है। यह महज एक इत्तेफाक नहीं है कि किसी बड़े इवेंट या प्रोजेक्ट के लॉन्च के तुरंत बाद ट्रोलिंग का स्तर अचानक बढ़ जाता है। यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें सितारों को बदनाम करने के लिए भारी बजट का इस्तेमाल किया जाता है।
इंडस्ट्री में मानसिक स्वास्थ्य और सहनशीलता का संकट
निरंतर ट्रोलिंग और नकारात्मकता का प्रभाव केवल कलाकार की छवि पर ही नहीं, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। एक पब्लिक फिगर होने के नाते, आलोचना सहना उनके काम का हिस्सा है, लेकिन ‘स्मीयर कैंपेन’ और ‘पेड ट्रोलिंग’ में फर्क होता है। आलिया जैसे कलाकार जो अपनी कड़ी मेहनत और प्रदर्शन के दम पर शीर्ष तक पहुंचे हैं, उन्हें इस तरह के दबाव में लाना पूरी इंडस्ट्री के लिए चिंता का विषय है। यदि इस चलन को नहीं रोका गया, तो यह न केवल अभिनेताओं की रचनात्मकता को कुंद करेगा, बल्कि उद्योग के स्वस्थ माहौल को भी पूरी तरह नष्ट कर देगा।
आलिया भट्ट की हालिया घटनाओं ने इस कड़वे सच को उजागर कर दिया है कि बॉलीवुड अब केवल कला और प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र नहीं रह गया है, बल्कि यह डिजिटल युग के ‘नफरत के बाजार’ का शिकार भी हो चुका है। हालांकि, आलिया ने जिस गरिमा के साथ इन चुनौतियों का सामना किया है, वह काबिले तारीफ है। दर्शकों को यह समझने की जरूरत है कि स्क्रीन पर दिखने वाला एक कलाकार भी इंसान है। सोशल मीडिया पर एक क्लिक के जरिए किसी की वर्षों की मेहनत पर पानी फेरना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह एक असुरक्षित समाज की पहचान भी है। वक्त आ गया है कि इस तरह के ‘पेड अभियानों’ को पहचाना जाए और नकारात्मकता फैलाने वालों के बजाय प्रतिभा को सम्मान देने की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए।