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दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में दवा और मेडिकल सामान की खरीद को लेकर विवाद बढ़ा। सौरभ भारद्वाज ने BJP सरकार पर केंद्रीकरण और कथित अनियमितताओं को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में दवाइयों, मेडिकल उपकरणों और जरूरी सामान की खरीद को लेकर आम आदमी पार्टी और BJP सरकार के बीच विवाद तेज हो गया है। AAP के दिल्ली अध्यक्ष और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया है कि फरवरी 2025 में BJP सरकार बनने के बाद अस्पतालों से दवा और जरूरी मेडिकल सामान की स्वतंत्र खरीद का अधिकार वापस लेकर खरीद की प्रक्रिया को केंद्रीय एजेंसी के हाथों में कर दिया गया। भारद्वाज के मुताबिक, 10 जुलाई 2025 को जारी आदेश के बाद अस्पतालों को खुद खरीद करने से रोक दिया गया और सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (CPA) के जरिए खरीद की व्यवस्था लागू की गई।
सौरभ भारद्वाज ने उठाए खरीद प्रक्रिया पर सवाल
सौरभ भारद्वाज का आरोप है कि खरीद व्यवस्था को केंद्रीकृत करने के बाद दवाइयों और मेडिकल उपकरणों की कीमतों में कथित तौर पर भारी अंतर सामने आया। AAP ने इसे करीब 650 करोड़ रुपये की कथित अनियमितता बताया है। भारद्वाज ने आरोप लगाया कि कुछ मेडिकल उपकरण बाजार कीमत से कई गुना अधिक दर पर खरीदे गए। हालांकि, इन आरोपों को AAP के दावे के रूप में देखा जाना चाहिए और मामले में जांच जारी है।
जांच के बीच अधिकारियों पर कार्रवाई
मामला तब और गंभीर हो गया जब दिल्ली सरकार ने मेडिकल खरीद में कथित अनियमितताओं को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की। जून 2026 में दिल्ली सरकार ने पूर्व DGHS डॉ. वत्सला अग्रवाल और BJRM अस्पताल के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी डॉ. विनोद कुमार रंगा को निलंबित किया। यह कार्रवाई खरीद प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच के बीच की गई।
इसके बाद मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने स्वास्थ्य विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत जांच की अनुमति दी। सरकार ने कहा कि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से की जानी चाहिए और दोष साबित होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई होगी।
कथित घोटाले की जांच में क्या सामने आया?
भाजपा सरकार और अधिकारियों के बीच टकराव की स्थिति…
2025 में सत्ता संभालते ही भाजपा सरकार ने आदेश दिया था कि दिल्ली के अस्पताल अब खुद दवाइयां और अन्य जरूरी सामान नहीं खरीद सकेंगे। इससे भ्रष्टाचार केंद्रित होकर भाजपा नेताओं के हाथों में आ गया था।
अब एक अधिकारी ने इसी आदेश को… pic.twitter.com/mSKtAWpBdv
— Aam Aadmi Party Delhi (@AAPDelhi) August 16, 2026
मामले की जांच में दवाइयों, सर्जिकल सामान और मेडिकल उपकरणों की खरीद से जुड़े कथित वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं की पड़ताल की जा रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, जांच एजेंसियां टेंडर प्रक्रिया में कथित हेरफेर और कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाने के आरोपों की भी जांच कर रही हैं।
एक अन्य रिपोर्ट में FIR के हवाले से मेडिकल सामान की कीमतों में कथित 200 से 500 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी के आरोपों का उल्लेख किया गया है। इनमें ORS, बेडशीट, एक्स-रे मशीन और C-Arm उपकरण जैसे सामान शामिल बताए गए हैं।
अधिकारियों और सरकार के बीच टकराव क्यों?
यही पूरा विवाद अब सरकार और अधिकारियों के बीच कथित टकराव का केंद्र बन गया है। AAP का आरोप है कि जिस केंद्रीकृत खरीद व्यवस्था को BJP सरकार ने लागू किया, उसी व्यवस्था में बाद में कथित अनियमितताएं सामने आईं। दूसरी ओर, सरकार ने इन आरोपों को जांच के दायरे में लेते हुए अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की है। ऐसे में सवाल यह है कि खरीद प्रक्रिया में नियमों का पालन किस स्तर पर हुआ और यदि कोई वित्तीय अनियमितता हुई तो उसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी।
सौरभ भारद्वाज ने सरकार से यह भी सवाल किया है कि जिन अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे, उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करने का निर्णय क्यों लिया गया। AAP का आरोप है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि सरकारी खजाने को नुकसान हुआ है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जानी चाहिए।
सरकार के सामने जवाबदेही की चुनौती
दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में दवाइयों और मेडिकल उपकरणों की उपलब्धता सीधे मरीजों से जुड़ा मुद्दा है। इसलिए खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और समय पर सप्लाई बेहद महत्वपूर्ण है। दिल्ली सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर 2026 में भी सरकारी अस्पतालों द्वारा दवाइयों और मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद से जुड़े टेंडर जारी किए गए हैं, जिससे स्पष्ट है कि अलग-अलग स्तरों पर खरीद प्रक्रियाएं जारी हैं।
फिलहाल इस पूरे मामले में जांच एजेंसियों की कार्रवाई आगे बढ़ रही है। AAP इसे BJP सरकार की खरीद व्यवस्था पर बड़ा सवाल बता रही है, जबकि सरकार ने कथित अनियमितताओं की जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई का रास्ता अपनाया है। ऐसे में आने वाले समय में जांच की रिपोर्ट यह स्पष्ट कर सकती है कि खरीद प्रक्रिया में वास्तविक गड़बड़ी कहां हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।