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लो हीमोग्लोबिन रीडिंग देखते ही आयरन की गोली न खाएं। यह एनीमिया के अलावा कई अन्य बीमारियों का संकेत हो सकता है।
रूटीन ब्लड टेस्ट के दौरान अक्सर ‘लो हीमोग्लोबिन’ (कम हीमोग्लोबिन) का पता चलना एक बहुत ही सामान्य बात है। लेकिन विडंबना यह है कि यह स्वास्थ्य संबंधी सबसे ज्यादा गलत समझे जाने वाले विषयों में से एक है। रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन का स्तर कम देखते ही ज्यादातर लोग तुरंत यह मान लेते हैं कि उन्हें ‘एनीमिया’ है और उसका कारण ‘आयरन की कमी’ है। बिना किसी डॉक्टर की सलाह के मेडिकल स्टोर से आयरन सप्लीमेंट्स शुरू कर देना एक ऐसी गलती है, जिसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ बेहद खतरनाक मानते हैं।
हीमोग्लोबिन क्या है और इसका स्तर क्या होना चाहिए?
सरल शब्दों में कहें तो, हीमोग्लोबिन रक्त में पाया जाने वाला एक प्रोटीन है जो शरीर के ऊतकों तक ऑक्सीजन पहुँचाने का काम करता है। जब इसकी मात्रा कम होती है, तो शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिससे थकान और कमजोरी महसूस होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के 2024 के ग्लोबल एनीमिया अनुमान और 2025 की ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (GBD) रिपोर्ट के अनुसार, एशिया में आज भी सबसे बड़ी संख्या में लोग एनीमिया से पीड़ित हैं।
सामान्यतः, स्वस्थ पुरुषों में हीमोग्लोबिन का स्तर 13.5 से 17.5 g/dL और महिलाओं में 12.0 से 15.5 g/dL के बीच होना चाहिए। यदि यह स्तर इससे कम है, तो इसका सीधा अर्थ है कि शरीर में पर्याप्त स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं (RBCs) नहीं बन रही हैं।
क्या केवल आयरन की कमी ही एकमात्र कारण है?
दिन भर अत्यधिक थकान महसूस करना, थोड़ी सी सीढ़ियां चढ़ने पर सांस फूलना या हर समय सुस्ती और कमजोरी महसूस होना हीमोग्लोबिन की कमी के मुख्य लक्षण हैं। लेकिन डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि ‘लो हीमोग्लोबिन’ का मतलब हमेशा ‘आयरन की कमी’ नहीं होता। इसे आयरन की कमी मानकर खुद से इलाज (self-treatment) करना शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है। हीमोग्लोबिन कम होने के कई अन्य गंभीर कारण भी हो सकते हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना घातक हो सकता है:
विटामिन की कमी: आयरन के अलावा, विटामिन B12 और फोलेट (विटामिन B9) की कमी के कारण भी शरीर लाल रक्त कोशिकाएं बनाने में असमर्थ हो जाता है।
- जीर्ण बीमारियाँ (Chronic Diseases): किडनी की बीमारियाँ, कैंसर, या अर्थराइटिस जैसी दीर्घकालिक बीमारियों के कारण भी शरीर में हीमोग्लोबिन का उत्पादन प्रभावित होता है।
- रक्त का अत्यधिक नुकसान: आंतरिक ब्लीडिंग या अन्य शारीरिक स्थितियों के कारण रक्त का नुकसान होना।
- जेनेटिक कारण: थैलेसीमिया जैसी अनुवांशिक बीमारियों में शरीर सही तरीके से हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता।
- अस्थि मज्जा (Bone Marrow) से जुड़ी समस्या: यदि बोन मैरो में ही कोई खराबी है, तो वह नई रक्त कोशिकाएं बनाने में असमर्थ हो सकता है।
बिना डॉक्टर की सलाह के आयरन सप्लीमेंट क्यों न लें?
सोशल मीडिया या सुनी-सुनाई बातों के आधार पर आयरन की गोलियां खाना बहुत हानिकारक हो सकता है। आयरन का अधिक सेवन शरीर के अंगों, विशेषकर लिवर और हृदय को नुकसान पहुँचा सकता है। इसे ‘आयरन ओवरलोड’ कहा जाता है, जो शरीर के लिए आयरन की कमी से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि बिना ब्लड रिपोर्ट और डॉक्टर के परामर्श के सप्लीमेंट्स लेना वैसा ही है जैसे बिना बीमारी जाने दवा खाना।
सही कदम क्या होना चाहिए?
यदि आपकी ब्लड रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन कम आता है, तो सबसे पहले घबराएं नहीं। निम्नलिखित कदम उठाएं:
- पूर्ण जांच (Complete Blood Count): केवल हीमोग्लोबिन नहीं, बल्कि MCV, MCH और आयरन प्रोफाइल जैसे अन्य टेस्ट करवाएं।
- डॉक्टर से परामर्श: अपने लक्षणों और मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर डॉक्टर से बात करें। यह पता लगाना जरूरी है कि कमी का स्रोत क्या है—क्या यह डाइट की वजह से है या किसी आंतरिक बीमारी के कारण?
- संतुलित आहार: यदि कमी मामूली है, तो डॉक्टर अक्सर हरी सब्जियां, दालें, फल और संतुलित आहार की सलाह देते हैं।
- उपचार की निगरानी: यदि आपको सप्लीमेंट्स की जरूरत है, तो उनकी खुराक और समय-सीमा डॉक्टर द्वारा निर्धारित की जानी चाहिए।
हीमोग्लोबिन का कम होना शरीर का एक संकेत है, कोई बीमारी नहीं। यह संकेत दे रहा है कि शरीर में कुछ गड़बड़ है, लेकिन वह गड़बड़ ‘आयरन की कमी’ ही होगी, यह सोचना गलत है। अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ न करें; किसी भी सप्लीमेंट को लेने से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। सही निदान ही सही उपचार की पहली सीढ़ी है।