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सरकारी कर्मचारी संघ ने JCM के पुनर्गठन की मांग की है ताकि आधुनिक प्रशासन में सभी विभागों को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। पढ़ें पूरी खबर।
हाल ही में सरकारी कर्मचारी संगठनों ने केंद्र सरकार से ‘संयुक्त परामर्शदात्री तंत्र’ (Joint Consultative Machinery – JCM) के पुनर्गठन की पुरजोर मांग की है। ‘ऑल इंडिया नेशनल पब्लिक सर्विस एम्प्लॉइज फेडरेशन’ (AINPSEF), जो देश भर के 13 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है, ने कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह और कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को पत्र लिखकर इस ढांचे में बदलाव का आह्वान किया है। कर्मचारी संघों का तर्क है कि वर्तमान JCM का ढांचा दशकों पुराना है और आधुनिक प्रशासनिक वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है, जिसके कारण बड़ी संख्या में सरकारी विभागों को संवाद के इस मंच पर उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।
1966 का ढांचा और आधुनिक प्रशासनिक चुनौतियाँ
AINPSEF के राष्ट्रीय अध्यक्ष मंजीत सिंह पटेल ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि JCM का वर्तमान प्रतिनिधित्व ढांचा 1960 के दशक की कार्यप्रणाली के आधार पर तैयार किया गया था। उस समय भारत सरकार लगभग 35-45 मंत्रालयों के माध्यम से कार्य करती थी और प्रशासनिक ढांचा अपेक्षाकृत सीमित था। हालांकि, वर्तमान में स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज केंद्र सरकार 50 से अधिक मंत्रालयों, अनगिनत विभागों, स्वायत्त संस्थानों, शैक्षणिक निकायों और अनुसंधान संगठनों के साथ-साथ केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) के विशाल नेटवर्क के माध्यम से संचालित हो रही है। संघ का कहना है कि प्रशासन के इतने बड़े विस्तार के बावजूद, कर्मचारियों की ओर से JCM का प्रतिनिधित्व ढांचा अभी भी 1966 के ऐतिहासिक ढांचे पर ही टिका हुआ है।
अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और संवाद में बाधा
आधुनिक प्रशासन में हुए विस्तार के कारण कई मंत्रालय, सेक्टर और केंद्रीय प्रशासनिक तंत्र या तो अपर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त कर रहे हैं या पूरी तरह से उपेक्षित हैं। पटेल ने तर्क दिया है कि इस असंतुलन के कारण एक बड़ा कर्मचारी वर्ग अपनी बात सरकार के शीर्ष स्तर तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुँचा पा रहा है। कर्मचारी संघों का मानना है कि प्रशासनिक आधुनिकता के साथ-साथ ‘परामर्शदात्री समावेशन’ (Consultative Inclusion) का होना अनिवार्य है। यदि संवाद तंत्र ही आधुनिक नहीं होगा, तो सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन में कर्मचारियों की भागीदारी सुनिश्चित करना कठिन होगा।
संघ के प्रमुख सुझाव: रोटेशनल प्रतिनिधित्व और UTs को स्थान
JCM के ढांचे को व्यावहारिक और समावेशी बनाने के लिए AINPSEF ने कुछ रचनात्मक प्रस्ताव दिए हैं:
- रोटेशनल नियुक्तियाँ: संघ ने सुझाव दिया है कि कर्मचारियों के प्रतिनिधियों की नियुक्ति रोटेशनल आधार पर की जानी चाहिए, ताकि विभिन्न विभागों को समय-समय पर प्रतिनिधित्व मिल सके।
- केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व: संघ ने विशेष रूप से ‘यूनियन टेरिटरीज एम्प्लॉइज कन्फेडरेशन रिप्रेजेंटेशन ब्लॉक’ बनाने की मांग की है। इसके तहत JCM के ढांचे में UTs के कर्मचारियों के कम से कम चार प्रतिनिधियों को शामिल करने का आग्रह किया गया है।
- संस्थागत भागीदारी: जिन मंत्रालयों या विभागों के पास अभी तक JCM में कोई स्थान नहीं है, उन्हें वहां संस्थागत भागीदारी प्रदान की जानी चाहिए।
सहभागी शासन और प्रशासनिक दक्षता की ओर कदम
यह अपील केवल अतिरिक्त प्रतिनिधित्व पाने की इच्छा नहीं, बल्कि ‘सहभागी शासन’ (Participative Governance) को मजबूत करने का एक प्रयास है। संघ का मानना है कि यदि JCM को पुनर्गठित किया जाता है, तो इससे प्रशासनिक समन्वय में सुधार होगा और ‘इज ऑफ गवर्नेंस’ (Ease of Governance) को गति मिलेगी। पटेल ने अपने पत्र में इसे एक ‘रचनात्मक प्रस्ताव’ बताते हुए कहा है कि यह लोकतंत्र के हित में है कि सरकार अपने कर्मचारियों के विभिन्न वर्गों के साथ निरंतर और सार्थक संवाद बनाए रखे।
सुधार की आवश्यकता और सरकार का रुख
प्रशासनिक दक्षता और आधुनिक समन्वय के लिए संस्थागत संवाद तंत्रों में समय के साथ बदलाव होना स्वाभाविक है। JCM, जो सरकार और कर्मचारियों के बीच सेतु का कार्य करता है, यदि व्यापक और विविध बनेगा, तो इससे कार्यस्थल पर बेहतर माहौल और नीतिगत फैसलों में पारदर्शिता आएगी। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह किस प्रकार इन सुझावों पर विचार करती है। एक आधुनिक भारत के लिए एक आधुनिक और समावेशी परामर्श तंत्र का होना न केवल कर्मचारियों के लिए लाभकारी होगा, बल्कि यह राष्ट्र की प्रशासनिक व्यवस्था को भी और अधिक लचीला और जवाबदेह बनाएगा।