हनुमान जी अपनी शक्तियां क्यों भूल गए थे? जानिए बचपन की उस शरारत और ऋषियों के श्राप की अनोखी कथा

हनुमान जी अपनी शक्तियां क्यों भूल गए थे? जानिए बचपन की उस शरारत और ऋषियों के श्राप की अनोखी कथा

हनुमान जी अपनी शक्तियां क्यों भूल गए थे? जानिए ऋषियों के उस श्राप की कहानी जिसने बजरंगबली को विस्मृत कर दिया और कैसे जामवंत जी ने उन्हें उनका खोया हुआ बल याद दिलाया।

पवनपुत्र हनुमान को ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली देवता माना जाता है। उनके पास अष्ट सिद्धियाँ और नौ निधियाँ हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब वे अपनी इन अपार शक्तियों को पूरी तरह भूल गए थे? रामायण का एक बड़ा हिस्सा बीत जाने तक उन्हें यह आभास ही नहीं था कि वे समुद्र लांघ सकते हैं या पहाड़ उठा सकते हैं।

बचपन की चपलता और ऋषियों का श्राप

हनुमान जी बचपन से ही अत्यंत शक्तिशाली और नटखट थे। वे भगवान शिव के अंश थे, इसलिए उनके पास असीमित ऊर्जा थी। वे अपनी शक्तियों के मद में अक्सर जंगल में तपस्या कर रहे ऋषि-मुनियों को तंग किया करते थे।

  • कभी वे ऋषियों के यज्ञ की अग्नि बुझा देते थे।
  • कभी उनके कमंडल और वल्कल (वस्त्र) पेड़ों पर टांग देते थे।
  • कभी ध्यान में मग्न ऋषियों की दाढ़ी खींचकर भाग जाते थे।

उनकी इन हरकतों से ऋषियों की तपस्या में बाधा आने लगी। अंततः, क्रोधित होकर भृगु और अंगिरा वंश के ऋषियों ने उन्हें श्राप दे दिया कि— “जिस बल के अहंकार में तुम यह सब कर रहे हो, तुम उसे भूल जाओगे। तुम्हें अपनी शक्तियों का आभास तब तक नहीं होगा, जब तक कोई तुम्हें उनकी याद न दिलाए।”

मौन रही शक्तियां और राम का साथ

इस श्राप के बाद हनुमान जी एक साधारण वानर की तरह रहने लगे। वे सुग्रीव के मंत्री बने और भगवान राम की शरण में आए, लेकिन उन्हें अपनी उड़ने वाली या रूप बदलने वाली शक्तियों का ज्ञान नहीं था। वे राम के हर कार्य में समर्पित थे, पर उनकी दिव्य शक्तियां सुप्त (सोई हुई) अवस्था में थीं।

जब जामवंत जी ने याद दिलाया ‘शौर्य’

हनुमान जी की शक्तियों के पुनर्जागरण का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ किष्किंधा कांड के अंत में आता है। माता सीता की खोज में वानर सेना समुद्र तट पर पहुँचती है। सामने 100 योजन (लगभग 800 मील) विशाल समुद्र था। अंगद और अन्य वीर संशय में थे कि इतना बड़ा समुद्र कौन पार करेगा।

तब अत्यंत वृद्ध और अनुभवी जामवंत जी ने हनुमान जी को चुपचाप बैठा देखा। उन्होंने हनुमान जी के पास जाकर उनके जन्म की कथा, उनके द्वारा सूर्य को निगलने का प्रयास और उनकी दिव्य शक्तियों का वर्णन किया। उन्होंने कहा:

“कहनु रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहा बलवाना॥”
(हे हनुमान! आप चुप क्यों बैठे हैं? आप तो पवनपुत्र हैं, असीम बलशाली हैं।)

जैसे ही जामवंत जी ने उन्हें उनकी शक्तियों की याद दिलाई, ऋषियों का श्राप समाप्त हो गया। हनुमान जी का शरीर पर्वत के समान विशाल होने लगा, उनका आत्मविश्वास जागा और उन्होंने एक ही छलांग में समुद्र पार कर लंका पहुँचने का गौरव हासिल किया।

 

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