नमक और नींबू के साथ शॉट लगाने का दौर अब पुराना हो चुका है। भारत के प्रीमियम होटलों और कॉकटेल बार्स में टेकिला अब एक परिपक्व और लक्ज़री स्पिरिट के रूप में उभर रही है। जानिए भारत में कैसे बदला टेकिला का ट्रेंड।
एक जमाना था जब टेकिला (Tequila) ऑर्डर करने का एक ही मतलब होता था: एक छोटा शॉट ग्लास, नींबू का टुकड़ा और हाथ के पीछे रखी नमक की चुटकी। पाँच सेकेंड के भीतर शॉट खत्म और बात खत्म।
लेकिन आज भारत के प्रीमियम होटलों और कॉकटेल बार्स में टेकिला एक बिल्कुल नए और भव्य अवतार में पेश की जा रही है। कहीं यह ट्रांसपेरेंट कूप में टोमैटो वॉटर के साथ परोसी जा रही है, तो कहीं कैंटोनीज़ डिम सम (Cantonese Dim Sum) के साथ। टेकिला अब केवल पार्टियों में शोर मचाने वाली ड्रिंक नहीं रही, बल्कि यह लक्ज़री और सोफिस्टिकेशन (Sophistication) का नया प्रतीक बन चुकी है।
शॉट्स कल्चर का अंत और क्राफ्ट की शुरुआत
हायात रीजेंसी दिल्ली (Hyatt Regency Delhi) के पोलो लाउंज के मैनेजर रॉजर ट्यूनियास का कहना है कि बार की दुनिया में सबसे बड़ा बदलाव किसी कॉकटेल का नहीं, बल्कि खुद टेकिला का हुआ है। दशकों तक टेकिला को केवल नमक और नींबू के साथ शॉट के रूप में पिया जाता था।
मेज़कालिटा एंड ला ताकेरिया के ब्रांड प्रमुख रिजवान अमलाणी के अनुसार, इस शॉट कल्चर ने हमेशा टेकिला के असली स्वाद को छुपा कर रखा। जब उपभोक्ताओं को यह अहसास होता है कि टेकिला सदियों की कारीगरी से बनी एक आर्टिसनल एगेव स्पिरिट (Artisanal Agave Spirit) है, तो उनका नज़रिया तुरंत बदल जाता है। अब यह जल्दी में गटकने वाली ड्रिंक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे सिप (Sip) करके इसका आनंद लेने वाली ड्रिंक बन चुकी है।
लक्ज़री हॉस्पिटैलिटी: अब सिर्फ कॉकटेल नहीं, एक कहानी
टेकिला के इस मेकओवर की सबसे साफ झलक भारत के प्रीमियम होटलों में देखने को मिल रही है। द लीला पैलेस नई दिल्ली (The Leela Palace New Delhi) में टेकिला से बनी ऐसी कॉकटेल परोसी जा रही हैं जो माइकल एंजेलो और कार्ल सेगन जैसी हस्तियों और वैज्ञानिक अवधारणाओं से प्रेरित हैं।
कहीं केसर, लीची और हैबनेरो के मेल से कलात्मकता को दर्शाया जा रहा है, तो कहीं क्लेरिफाइड टोमैटो वॉटर और डिल-इन्फ्यूज्ड जिन के जरिए ब्रह्मांड की विशालता को कॉकटेल में ढाला गया है। आज का लक्ज़री उपभोक्ता केवल ड्रिंक नहीं चाहता, वह एक अनोखा अनुभव (Experience) चाहता है।
भारतीय कॉकटेल कल्चर अब परिपक्व हो चुका है
नोवोटेल हैदराबाद एयरपोर्ट के एफएंडबी मैनेजर अनीश घरियार बताते हैं कि आज मेहमान सिर्फ टेकिला मांगने के बजाय कई सवाल पूछते हैं:
यह कहाँ बनी है?
- इसमें किस प्रकार के एगेव (Agave) का इस्तेमाल हुआ है?
- क्या यह ब्लैंको (Blanco) है या रेपोसाडो (Reposado)?
टेकिला अब उसी राह पर चल रही है जिस पर कुछ साल पहले जिन (Gin) चली थी। द लीला हैदराबाद के द लाइब्रेरी बार के बार्टेंडर शिवम नेगी का मानना है कि अब लोग टेकिला की तुलना व्हिस्की या वाइन से करने लगे हैं। लोग किसी नामचीन ब्रांड के बजाय उसकी प्रामाणिकता और टेरोइर (Terroir – मिट्टी और जलवायु का प्रभाव) को महत्व दे रहे हैं।
नए दौर का नया कॉकटेल कैनवास
भारत के प्रीमियम रेस्तरां में अब टेकिला को सीरप के नीचे छिपाने के बजाय उसके मूल स्वाद को उभरने का मौका दिया जा रहा है:
- रॉयल चाइना (Royal China): यहाँ टेकिला को एशियाई हर्ब्स, चाय और मसालों के साथ मिलाकर कैंटोनीज़ व्यंजनों के साथ सर्व किया जा रहा है।
- सिनसिन (CinCin): बेवरेज लीड विनीत कृष्णन अपनी सिग्नेचर कॉकटेल ‘स्प्रेज़ातुरा’ (Sprezzatura) में सिल्वर टेकिला, कैम्पारी और फर्मेंटेड रास्पबेरी का इस्तेमाल करते हैं।
- पुलमैन नई दिल्ली एयरोसिटी: यहाँ की सिग्नेचर ड्रिंक ‘द ग्रीन हाउस’ में टेकिला के साथ खीरा, तुलसी और नींबू का संतुलन बनाकर इसे एक तरोताज़ा अनुभव दिया गया है।
ब्रांड नहीं, कहानी और ओरिजिन की मांग
क्रिस्टल अज़ुल के सह-संस्थापक अमन स्वेत्ता का कहना है कि आज का लक्ज़री उपभोक्ता किसी भी ड्रिंक के पीछे की कहानी और क्राफ्ट्समैनशिप (Craftsmanship) को जानना चाहता है। जिस तरह वाइन, कॉफी और व्हिस्की के प्रीमियम सेगमेंट ने भारतीय बाज़ार में जगह बनाई है, वही बदलाव अब टेकिला के साथ हो रहा है।
विवाणो (Vivaano) के संस्थापक अर्जुनप्रीत सिंह साहनी के अनुसार, टेकिला का भविष्य ऐसी यादें और अनुभव बनाने में है जो गुणवत्ता और प्रामाणिकता पर आधारित हों।
टेकिला के लक्ज़री युग का आगाज़
एक समय था जब व्हिस्की को सोफिस्टिकेशन का पैमाना माना जाता था, फिर जिन का दौर आया और अब टेकिला का लक्ज़री एरा (Luxury Era) शुरू हो चुका है। अब टेकिला पार्टियों में ज़ोर से चिल्लाने वाली ड्रिंक नहीं रही—यह और बेहतर, परिपक्व और शांत लक्ज़री का नाम बन चुकी है।