इम्पैक्ट प्लेयर नियम पर संजय मांजरेकर का सवाल: क्या “बल्लेबाजी और चिल” मॉडल भारतीय क्रिकेट के विकास में बाधक है?

इम्पैक्ट प्लेयर नियम पर संजय मांजरेकर का सवाल: क्या "बल्लेबाजी और चिल" मॉडल भारतीय क्रिकेट के विकास में बाधक है?

संजय मांजरेकर ने आईपीएल के इम्पैक्ट प्लेयर नियम की आलोचना की है। उन्होंने वैभव सूर्यवंशी का उदाहरण देते हुए कहा कि यह नियम युवा खिलाड़ियों के सर्वांगीण विकास को रोक रहा है।

इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) के ‘इम्पैक्ट प्लेयर’ नियम ने खेल में रोमांच तो बढ़ाया है, लेकिन इसने क्रिकेट जगत के दिग्गजों के बीच एक नई बहस को भी जन्म दे दिया है। पूर्व भारतीय क्रिकेटर और मशहूर कमेंटेटर संजय मांजरेकर ने अब इस नियम की उपयोगिता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मांजरेकर का मानना है कि यह नियम युवा भारतीय क्रिकेटरों के सर्वांगीण विकास (Overall Development) को प्रभावित कर रहा है और खेल को “बहुत आसान” बना रहा है।

वैभव सूर्यवंशी का उदाहरण: केवल एक आयाम तक सीमित?

मांजरेकर ने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए राजस्थान रॉयल्स के युवा खिलाड़ी वैभव सूर्यवंशी का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि इस सीजन में सूर्यवंशी का इस्तेमाल मुख्य रूप से केवल एक बल्लेबाज के तौर पर किया गया है। इम्पैक्ट प्लेयर नियम के तहत, सूर्यवंशी बल्लेबाजी करके मैदान से बाहर चले जाते हैं और उनकी जगह कोई अन्य गेंदबाज या फील्डर ले लेता है।

मांजरेकर के अनुसार, यह मॉडल एक खिलाड़ी की अन्य क्षमताओं को निखारने के अवसरों को सीमित कर देता है। उन्होंने स्पोर्टस्टार के इनसाइट एज पर बात करते हुए कहा, “जब कम प्रयास के लिए आसान पैसा और इनाम मिलने लगे, तो आपको उस मॉडल के बारे में चिंता करनी चाहिए—वह कभी भी दीर्घकालिक सफलता नहीं हो सकती।”

क्षेत्ररक्षण और दबाव झेलने की क्षमता का अभाव

मांजरेकर ने जोर देकर कहा कि वे खिलाड़ियों के तीनों आयामों (बल्लेबाजी, गेंदबाजी और फील्डिंग) को देखना चाहते हैं, भले ही वे किसी एक विभाग में थोड़े कमजोर ही क्यों न हों। उन्होंने इंजमाम-उल-हक का उदाहरण देते हुए समझाया कि कैसे उनकी बल्लेबाजी का सम्मान होता था, लेकिन फील्डर के रूप में उनकी कमियों ने भी उनके खेल के आकलन में मदद की।

उन्होंने कहा, “मैं चाहता हूं कि वैभव सूर्यवंशी मैदान पर रहें और देखें कि वहां क्या होता है। मैं उन्हें दबाव की स्थितियों में देखना चाहता हूं। अगर वह एक महान बल्लेबाज हैं, लेकिन फील्डिंग में थोड़े कमजोर हैं, तो मैं चाहता हूं कि उस कमजोरी का परीक्षण हो।” मांजरेकर का मानना है कि फील्डिंग के दौरान कैच छोड़ना और उसके बाद आने वाला तनाव एक खिलाड़ी को मानसिक रूप से मजबूत बनाता है, जिससे इम्पैक्ट प्लेयर नियम उन्हें वंचित कर रहा है।

“बल्लेबाजी और चिल”—खेल के गिरते स्तर पर चिंता

मांजरेकर ने ‘इम्पैक्ट सब’ नियम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे “बैटिंग और चिल” (सिर्फ बल्लेबाजी करो और आराम करो) वाला मॉडल बताया। उन्होंने तर्क दिया कि खेल के उच्चतम स्तर पर चीजें इतनी आसान नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार, क्रिकेट का असली मजा और चुनौती तभी है जब खिलाड़ी को खेल के हर पहलू में खुद को साबित करना पड़े।

उन्होंने स्पष्ट किया, “सिर्फ बल्लेबाजी करना और फिर आराम करना—आप नहीं चाहेंगे कि खेल का इतना ऊंचा स्तर इतना आसान हो जाए। फील्डर के रूप में जब आप तनाव महसूस करते हैं, तभी आपका चरित्र निखरता है।”

भारतीय ऑलराउंडर्स के भविष्य पर संकट?

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इम्पैक्ट प्लेयर नियम के कारण टीमों को अब ऑलराउंडर्स की उतनी जरूरत महसूस नहीं होती, क्योंकि वे एक अतिरिक्त विशेषज्ञ बल्लेबाज या गेंदबाज को कभी भी शामिल कर सकते हैं। इससे भविष्य में भारत को हार्दिक पांड्या या रवींद्र जडेजा जैसे ‘जेन्युइन ऑलराउंडर’ मिलने मुश्किल हो सकते हैं। संजय मांजरेकर के इन बयानों ने बीसीसीआई (BCCI) और आईपीएल गवर्नेंस काउंसिल के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मनोरंजन के चक्कर में खेल की गुणवत्ता और युवा प्रतिभाओं के विकास से समझौता किया जा रहा है?

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